घने बाल, प्रिंटेड कमीजें, डेनिम जीन्स, चौड़े बॉर्डर वाली साड़ियां और बैकग्राउंड में एम्बेसडर कार या पुराने सिनेमा पोस्टर्स। आपने भी 1980's की तस्वीरों का ये वायरल ट्रेंड तो देख ही लिया होगा। पीयूष गोयल से राहुल गांधी तक, कियारा आडवाणी से पड़ोसी, दोस्
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क्या है इस 1980’s ट्रेंड की पूरी कहानी, आप कैसे शामिल हो सकते हैं और क्या AI को अपनी निजी तस्वीरें देना सुरक्षित है; आज के एक्सप्लेनर में जानिए…
सवाल-1: 1980’s की AI तस्वीरों का ट्रेंड क्या है? जवाब: मार्च 2023 की बात है। तस्वीरें बनाने वाले AI टूल मिडजर्नी पर कुछ नए अपडेट्स आए थे। इसके जरिए लोगों ने पहली बार 1990 के दशक जैसी दिखने वाली AI तस्वीरें बनाईं। खासकर बीजिंग में एक घर की छत पर बैठे कपल वाली तस्वीरों की सीरीज खूब वायरल हुईं। ये बिल्कुल असली जैसी दिखती थीं। हालांकि तब ये ट्रेंड चीन तक ही सीमित रहा।

चीनी कपल छत पर बैठे हैं और पीछे 1990s के बीजिंग जैसा माहौल है। इसे Midjourney V5 से बनाया गया था।
भारत में इस मिलते-जुलते ट्रेंड की एंट्री सितंबर 2026 में हुई है, वो भी ChatGPT के जरिए। लोग अपनी असली तस्वीरों को ChatGPT की मदद से 1980 के दशक जैसी विंटेज तस्वीरों में बदलने लगे।
बैकग्राउंड, लाइट, कपड़े और हेयरस्टाइल बिल्कुल 1980 के दशक के बॉलीवुड एक्टर्स की विंटेज तस्वीरों जैसा हो जाता है, जबकि चेहरा कमोबेश असली रहता है।
इंस्टाग्राम पर 'Add Yours' स्टिकर और रील्स के जरिए ये ट्रेंड तेजी से फैला। आम लोगों से लेकर एक्टर्स, नेता और सेलेब्रिटीज तक बॉलीवुड फ्लेवर वाली इन तस्वीरों का ट्रेंड फॉलो कर रहे हैं।


सवाल-2: लेकिन ये ट्रेंड इतना तेजी से क्यों वायरल हो रहा है? जवाब: ये ट्रेंड अपनाना बेहद आसान है। आपको सिर्फ ChatGPT जैसे AI टूल्स को अपनी तस्वीर और एक प्रॉम्प्ट, यानी निर्देश देना है। उसी हिसाब से ChatGPT पुरानी फैमिली फोटो, बॉलीवुड स्टूडियो स्टाइल वाली पोर्ट्रेट, वेडिंग इमेज या किसी विंटेज मैगजीन के शूट जैसी तस्वीर दे देगा।
हालांकि कोई काम आसान होने का मतलब ये जरूरी नहीं, कि सभी उसे करना शुरू कर देंगे। इस ट्रेंड के पीछे 3 मनोवैज्ञानिक वजहें भी हैं...
1. अपने से पहले के समय के लिए तरस रहे जेन-Z
- कुछ स्टडीज कहती हैं कि कुछ जेन-Z युवा पुरानी टेक्नोलॉजी, मीडिया और रेट्रो एस्थेटिक्स, यानी पुराने दौर के आर्ट, फैशन और मेकअप का रुख कर रहे हैं। वे इस फास्ट डिजिटल वर्ल्ड के बजाय एक असली स्लो-पेस दुनिया में जीना चाहते हैं।
- नॉस्टैल्जिया, यानी अतीत की यादों, जीवन के अर्थ जैसे मुद्दों पर रिसर्च करने वाले साइकोलॉजिस्ट क्ले राउटलेज के मुताबिक, 'करीब दो-तिहाई जेन-Z युवा उस युग की तरफ आकर्षित हो रहे हैं, जो उन्होंने नहीं देखा है। वे अपने जन्म से पहले के समय के लिए तरसते हैं। ये 'हिस्टोरिकल नॉस्टैल्जिया' है, जो इन युवाओं में उनके जीवन के अर्थ, सोशल कनेक्शन, क्रिएटिविटी और उम्मीद की फीलिंग को बढ़ाती है।'
2. आपसी मेल-जोल वाली बेहतर दुनिया की उम्मीद
- पुराने म्यूजिक या पुरानी एल्बम की तरह ये तस्वीरें एहसास दिलाती हैं कि आज के मुकाबले तब लोग एक-दूसरे के साथ ज्यादा वक्त बिताते थे।
- समाजशास्त्री ज्योति एस. नायर कहती हैं, ‘लोगों में अकेलापन बढ़ रहा है। वहीं इस ट्रेंड में एक-दूसरे से जुड़ाव वाली फीलिंग है। लोग ऐसे दौर की तरफ खिंच रहे हैं, जहां जीवन ज्यादा संवेदनशील और कनेक्टेड हुआ था।’
- 'ऐसे नॉस्टैल्जिया से लोग खुद को, एक समाज के तौर पर महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि वो किसी पुराने समय, किसी कम्युनिटी या किसी खास याद से जुड़े हैं। ये पुरानी यादें लोगों को आज के नीरस जीवन के खिलाफ प्रतिरोध की तरह भी लगती हैं।’
- राउटलेज भी कहते हैं, 'जरूरी नहीं है कि आप 1980 के दशक में रहना ही चाहते हों। हो सकता है कि आपको महज उस दौर से कुछ जुड़ी चीजें पसंद आ रही हों, जैसे- आपको लग रहा हो, कि तब लोगों का अपनी लाइफ पर कंट्रोल ज्यादा था और तब लोग बतौर कम्युनिटी ज्यादा जुड़े हुए थे।’
3. पुराना वक्त बेहतर मानने की सोच का असर
- कंसल्टेंट साइकोलॉजिस्ट डॉ. मिनी के पॉल कहती हैं, 'पुराने समय में जिम्मेदारियां कम थीं और अनुभव सुखद थे। हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो खुशी, सुरक्षा या आजादी का एहसास होता है। इससे सुकून और प्रेरणा मिलती है।
- अतीत को आज से बेहतर मानने की सोच के लिए एक टर्म है- 'Rosy Retrospection Bias'। लोगों को मुश्किल वक्त याद नहीं रहता, सुखद चीजें याद रह जाती हैं।
- साइकैट्रिस्ट अरुण बी नायर कहते हैं, ‘हर जनरेशन में लोग अतीत को बेहतर बताते हैं। लोग अपने बचपन को याद करके कहते हैं कि हमारे दौर में जिंदगी बेहतर थी। 1980 के दशक की इन AI इमेजेज के जरिए भी हम वही टेंडेंसी फॉलो कर रहे हैं।’
- अरुण के मुताबिक, 'मौजूदा समय की दिक्कतों से पलायन की सोच के चलते भी पुरानी यादें अच्छी लगती हैं। लोग नौकरी, बिजनेस, पैसा और एजुकेशन से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे हैं। एक खुशहाल दौर याद करने से उन्हें असलियत से एक अस्थायी राहत मिलती है।’
- ‘पुरानी यादों का जुनून 35 से 50 साल के लोगों में ज्यादा दिखाई देता है। इनमें सोशल मीडिया अपनी पुरानी यादों को शेयर करने की संभावना ज्यादा होती है।'
सवाल-3: आप अपनी 1980’s वाली तस्वीर कैसे बना सकते हैं? जवाब: 3 सिंपल स्टेप हैं…
- ChatGPT, Gemini, Grok जैसे किसी AI टूल में अपनी कोई तस्वीर अपलोड कीजिए।
- हिंदी या अंग्रेजी में सामान्य प्रॉम्ट दीजिए। मसलन- इस फोटो को वायरल 1980 के फोटो ट्रेंड की तरह बदलिए या Create 1980's Trend Image
- कुछ सेकेंड में तस्वीर बनकर सामने आ जाएगी। डाउनलोड कीजिए और जहां चाहे शेयर कीजिए।
तस्वीर में कोई खास चीज शामिल करना चाहते हैं, तो विस्तार से प्रॉम्प्ट दे सकते हैं। नीचे दिए गए स्पेसिफिक प्रॉम्प्ट को कॉपी करके भी आप अपनी तस्वीर बना सकते हैं।
'Transform this photo into an authentic 1980s studio portrait। Keep the facial identity, facial features, skin tone, face shape and natural appearance completely the same or unchanged. Style in an elegant 1980s outfit with a structured silhouette, vintage jewellery and a classic retro hairstyle with lots of volume inspired by the era। Use a sophisticated mid-century studio backdrop, soft directional lighting, gentle film grain, slightly muted colours and the look of an original 1960s analogue photograph. The image should feel timeless, polished and naturally photographed rather than digitally generated.'
सवाल-4: AI में अपलोड करने के बाद आपकी फोटो के साथ होता क्या है? जवाब: आपकी तस्वीर AI टूल में अपलोड होने के बाद बाद डेटा के स्तर पर उसके साथ कई चीजें होती हैं।
आपकी फोटो AI टूल की ट्रेनिंग के काम आती है। ChatGPT की पेरेंट कंपनी OpenAI की यूसेज पॉलिसी के मुताबिक, हमारे दिए इनपुट्स, यानी टेक्स्ट और इमेज का इस्तेमाल उनके मॉडल्स को ट्रेन करने में हो सकता है। AI मॉडल्स के लिए टेक्स्ट के बजाय फोटोज कहीं ज्यादा काम की होती हैं। इससे इन्हें फेशियल डेटा, जियोमेट्री के अलावा पहचान से जुड़ी कई जानकारियां मिलती हैं।
ChatGPT पर एक बार इमेज अपलोड होने के बाद तब तक चैट में सेव रहती है, जब तक यूजर उसे खुद डिलीट न कर दे। तस्वीर के साथ ही तस्वीर जिस मोबाइल से ली गई, उसका IP एड्रेस, तस्वीर की जगह, व्यक्ति की पसंद, आदतें, उसका प्रोफेशन, उसके चेहरे के फीचर्स, आंखों और बालों का रंग तक रिकॉर्ड होती हैं।
अगर आप अपनी चैट डिलीट कर भी दें, तो कुछ डेटा OpenAI के सिस्टम पर 30 दिनों तक रह सकता है। यूजर्स की कुछ जानकारी कानूनी या सिक्योरिटी से जुड़ी वजहों से भी कंपनी के डेटाबेस में लंबे समय तक रखी जा सकती है।
सवाल-5: आपको ये ट्रेंड जॉइन करना चाहिए या नहीं? जवाब: AI टूल्स पर तस्वीरें अपलोड करना आपकी मर्जी की बात है। हालांकि ऐसी तस्वीरें जिनमें संवेदनशील डिटेल्स हों, बच्चों की तस्वीरें हों, उन्हें अपलोड नहीं करना चाहिए। अगर संभव हो, तो मॉडल ट्रेनिंग मोड को ऑफ कर देना चाहिए। पुरानी चैट और फाइल्स को डिलीट कर देना चाहिए।
साइबर सिक्योरिटी और डेटा प्राइवेसी एक्सपर्ट्स इन फोटो-ट्रेंड को लेकर लगातार कई तरह के खतरों की चेतावनी देते रहे हैं। मार्केट एनालिस्ट फर्म काउंटरपॉइंट रिसर्च के रिसर्च डायरेक्टर तरुण पाठक कहते हैं…
- वायरल ट्रेंड्स AI सिस्टम्स के लिए 'गोल्डमाइन' की तरह हैं, क्योंकि इन्हें ट्रेनिंग के लिए लगातार डेटा चाहिए होता है।
- लोग अपनी मर्जी से अपनी फोटो देते हैं। ये कैजुअल सोशल मीडिया चैलेंज अक्सर डेटा प्रोटेक्शन से जुड़े नियमों को बायपास कर देते हैं। इससे प्राइवेसी बचाना मुश्किल होता है।
- ये फोटोज देना अपनी पूरी पर्सनल प्रोफाइल एक डिजिटल सर्विस को सौंप देने जैसा है। फेशियल डेटा, आपके फिंगरप्रिंट की तरह ही एक बायोमेट्रिक डिटेल है।
- पासवर्ड या फोन नंबर अगर लीक हो जाएं, तो बदले जा सकते हैं, लेकिन फिंगरप्रिंट या चेहरा बदले नहीं जा सकते।
- तस्वीर में गाड़ी का नंबर प्लेट, घर का पता, दफ्तर, स्कूल या कोई और डिटेल्स डेटा लीक के दायरे में आ जाती हैं। इस डेटा को एनालिटिक्स फर्मों या एडवर्टाइजिंग एजेंसियों को बेचा जा सकता है।
डिजिटल सिक्योरिटी फर्म प्रोटॉन के सीनियर ऑफिसर ईमॉन मैग्वायर कहते हैं कि ऐसे वायरल ट्रेंड्स बनाने के पीछे AI कंपनियों की एक सोची-समझी रणनीति भी हो सकती है, ताकि वो अपने ट्रेनिंग मॉडल को ज्यादा तादाद में नया डेटासेट मुहैया करा सकें।
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