रांची35 मिनट पहलेलेखक: रितु लकड़ा
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अभिलाषा।
फैशन डिजाइनर अभिलाषा ने मल्टी नेशनल कंपनी की नौकरी छोड़ एक पहल की शुरुआत कीहरमू स्थित लूमंग क्राफ्ट झारखंड की पारंपरिक कला, संस्कृति और ग्रामीण आजीविका को नई पहचान देने वाला सफल मॉडल बनकर उभरा है। फैशन डिजाइनर अभिलाषा की पहल से वर्ष 2018 में शुरू हुई यह संस्था आज राज्य के 130 परिवारों को रोजगार से जोड़ चुकी है।

सोहराई पेंटिंग सहित विभिन्न लोक कलाओं से जुड़े हस्तशिल्प उत्पाद गांवों की महिलाओं के हाथों तैयार होकर देश-विदेश के बाजारों तक पहुंच रहे हैं। इससे एक ओर विलुप्तप्राय पारंपरिक शिल्प को नया जीवन मिला है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं। लूमंग क्राफ्ट यह साबित कर रहा है कि सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के साथ सतत रोजगार सृजन भी संभव है।

लूमंग क्राफ्ट
क्लस्टर डिजाइनर के तौर पर काम कर चुकी हैं अभिलाषा जमशेदपुर की रहने वाली अभिलाषा पिछले 15 साल से रांची में रह रही हैं। वर्ष 2012 में फैशन डिजाइनिंग का प्रशिक्षण लेने के बाद अभिलाषा ने हैंडलूम क्षेत्र में कार्य किया और बाहर नौकरी करने के बावजूद अपनी मिट्टी में कुछ नया करने के उद्देश्य से रांची लौट आईं। यहीं पर महिलाओं के साथ मिलकर अपने लूमंग क्राफ्ट की शुरुआत की। उनकी छोटी-सी पहल आज सैकड़ों लोगों की आजीविका का आधार बन गई है।
45-60 दिनों का प्रशिक्षण भी अभिलाषा कहती हैं कि गांवों में ऐसी बहुत-सी महिलाएं है जिन्हें सोहराई, जादोपटिया और पैतकर कला का ज्ञान है। हमने ऐसी ही महिलाओं के लिए 45-60 दिनों का प्रशिक्षण कार्यक्रम की शुरुआत की। शुरुआत कागज पर पेंटिंग से होती है।
72 वर्ष तक की महिलाएं निकाल रहीं रेशम से धागा : यहां महिलाएं टीम लीडर, टीम मेंबर और उत्पादन स्तर पर जिम्मेदारियां संभाल रही हैं। 20 से 72 वर्ष तक की महिलाएं रेशम के धागे निकालने से लेकर विभिन्न हस्तशिल्प उत्पादों के निर्माण तक में सक्रिय हैं।
स्पेन से जर्मनी तक जा रहे उत्पाद सोहराई, डोकरा, बांस, लेदरा, काथा और जरदोजी समेत 53 शिल्प श्रेणियों में कार्यरत संस्था के उत्पाद स्पेन और जर्मनी सहित विदेशों तक पहुंच चुके हैं। बची हुई कतरनों से बैग बनाकर अपशिष्ट को भी उपयोगी बनाया जा रहा है।
पीएम को शॉल और राष्ट्रपति को साड़ी दे चुकी है संस्था: अभिलाषा ने बताया कि द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने पर यहां की बनी तसर साड़ी से सम्मानित करने का अवसर मिला था। प्रधानमंत्री के धनबाद दौरा के दौरान उन्हें शॉल भेंट किया गया। शॉल में सोहराई का काम है।
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