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12 साल की पीहू पर सवार होंगी काछनदेवी: कांटों के झूले पर झूलकर देंगी बस्तर दशहरा मनाने की अनुमति; 618 साल पुरानी परंपरा निभाई जाएगी - Jagdalpur News

October 10, 2026

छत्तीसगढ़ में 75 दिनों तक चलने वाले प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की आज काछनगादी की रस्म निभाई जाएगी। शनिवार रात जगदलपुर के भंगाराम चौक स्थित काछनगुड़ी में पूरी होगी। इस दौरान पनका जाति की 12 साल की पीहू दास पर काछनदेवी सवार होंगी।

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देवी बेल के कांटों से बने खास झूले पर झूलकर बस्तर दशहरा मनाने की अनुमति देंगी। इसके बाद बस्तर दशहरा की दूसरी धार्मिक रस्में भी शुरू होंगी। मान्यता है कि यह परंपरा 618 साल पुरानी है। काछनगादी की रस्म निभाने वाली पीहू दास 5वीं कक्षा में पढ़ती हैं।

जगदलपुर के भंगाराम चौक स्थित काछनगुड़ी में पूरी होगी काछनगादी की रस्म।

जगदलपुर के भंगाराम चौक स्थित काछनगुड़ी में पूरी होगी काछनगादी की रस्म।

बेल के कांटों का खास झूला भी इस परंपरा का अहम हिस्सा है।

बेल के कांटों का खास झूला भी इस परंपरा का अहम हिस्सा है।

12 साल की पीहू दास पर काछनदेवी सवार होंगी।

12 साल की पीहू दास पर काछनदेवी सवार होंगी।

पनका समाज की कन्या निभाती है काछनगादी रस्म

पीहू दास ने इस रस्म से पहले करीब 9 दिनों तक देवी की पूजा की और उपवास रखा है। पीहू पांचवी बार इस परंपरा में शामिल होंगी। इससे पहले पनका समाज की अनुराधा ने करीब 5 से 6 साल तक यह जिम्मेदारी निभाई थी।

बस्तर दशहरा में अलग-अलग जातियों और गांवों के लोगों को खास जिम्मेदारियां दी गई हैं। झारउमर और बेड़ाउमर गांव के ग्रामीणों को रथ बनाने की जिम्मेदारी मिली है। वहीं, काछनगादी की रस्म पनका समाज की कन्या निभाती है। यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है।

22 पीढ़ियों से एक परिवार बना रहा कांटों का झूला

काछनगादी की रस्म में इस्तेमाल होने वाला बेल के कांटों से बना झूला भी इस परंपरा का अहम हिस्सा है। लामनी के रहने वाले जगत राम नेताम का परिवार करीब 22 पीढ़ियों से झूला बनाने की जिम्मेदारी निभा रहा है।

परिवार के सदस्य जंगल से बेल की कांटेदार डालियां लाकर झूला तैयार करते हैं। यह काम धार्मिक आस्था और परंपरा के प्रति समर्पण के साथ किया जाता है। रस्म के दौरान परिवार के घर में नौ दिनों तक अखंड दीपक भी जलाया जाता है।

पीढ़ियां बदलने के बाद भी परिवार अपनी जिम्मेदारी निभाता आ रहा है। परिवार के सदस्यों ने इस परंपरा को आगे भी जारी रखने का संकल्प लिया है।

नवरात्र से एक दिन पहले होती है रस्म

बस्तर दशहरा की प्रमुख रस्म मानी जाने वाली काछनगादी हर साल नवरात्र से ठीक एक दिन पहले आयोजित की जाती है। इस अवसर पर बस्तर राजपरिवार के सदस्य और दशहरा समिति के पदाधिकारी काछनगुड़ी पहुंचकर देवी से उत्सव मनाने की अनुमति मांगते हैं।

अनुमति मिलने पर आतिशबाजी भी की जाती है। काछनदेवी को रण की देवी के रूप में भी जाना जाता है। पनका समाज की महिलाएं इस परंपरा से जुड़े धार्मिक आयोजनों में धनकुल वादन के साथ गीत गाती हैं।

रैला देवी की पूजा का भी विशेष महत्व

बस्तर दशहरा की परंपराओं में रैला देवी की पूजा का भी खास महत्व है। काछनगादी की रस्म के बाद जगदलपुर के गोल बाजार में रैला देवी की पूजा का विधान रखा गया। इस परंपरा को देखने के लिए बस्तर संभाग के अलावा दूसरे राज्यों से भी लोग पहुंचेंगे।

12 अक्टूबर को होगी जोगी बिठाई रस्म

काछनदेवी से अनुमति मिलने के बाद रविवार को कलश स्थापना के साथ जोगी बिठाई की रस्म होगी। इसके साथ ही बस्तर दशहरा के अगले धार्मिक कार्यक्रम शुरू होंगे। यहां की परंपराएं अलग-अलग समुदायों, गांवों और परिवारों की आस्था से जुड़ी हैं। इन रस्मों की जिम्मेदारी पीढ़ियों से निभाई जा रही है।

12 अगस्त को पाट जात्रा की रस्म के साथ बस्तर दशहरा शुरू हुआ।

12 अगस्त को पाट जात्रा की रस्म के साथ बस्तर दशहरा शुरू हुआ।

पाट जात्रा से बस्तर दशहरा की शुरुआत

बस्तर दशहरा की शुरुआत पाट जात्रा की रस्म से हुई। इसमें पारंपरिक रूप से लकड़ी के पाट की पूजा की गई। इस रस्म के साथ 75 दिवसीय दशहरा पर्व का आगाज हुआ। इसमें मां दंतेश्वरी की आराधना की जाती है।

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