राजगढ़ के प्रसिद्ध जालपा माता मंदिर में नवरात्रि के पहले दिन रविवार को सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। भक्तों ने माता के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना की। कई लोग परिवार के साथ पहुंचे, कुछ पैदल एक किलोमीटर पहाड़ी चढ़कर आए।
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घने जंगल में ऊंची पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर 1100 साल से ज्यादा पुराना है। यह विवाह की तारीख तय करने की अनोखी परंपरा 'पाती' के लिए भी जाना जाता है। पंचांग में मुहूर्त न मिलने पर पुजारी दानों की गणना कर विवाह की तारीख बताते हैं।
आचार्य धर्मेंद्र शास्त्री ने बताया कि इस साल मां गज यानी हाथी पर सवार होकर आ रही हैं, जो खुशहाली का प्रतीक है। नवरात्रि में भारी भीड़ की संभावना को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा और व्यवस्था के इंतजाम किए हैं। उज्जैन के महाकाल मंदिर की तर्ज पर यहां लड्डू प्रसाद के पैकेट बेचने के लिए काउंटर भी लगेगा। नवरात्रि के दौरान भक्तों की बढ़ती संख्या को देखते हुए प्रसाद वितरण और दर्शन व्यवस्था महत्वपूर्ण रहेगी।

घने जंगल में ऊंची पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर 1100 साल से ज्यादा पुराना है।
‘पाती’ से तय होती है शादी की तारीख जालपा माता मंदिर की सबसे खास परंपराओं में से एक विवाह की तारीख तय करने से जुड़ी है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, जिन परिवारों को पंचांग में विवाह के लिए शुभ मुहूर्त नहीं मिल पाता, वे ज्वार या गेहूं के दाने लेकर माता के दरबार पहुंचते हैं। यहां पुजारी पारंपरिक तरीके से दानों की गणना करते हैं और इसी आधार पर विवाह की तारीख बताते हैं। इस प्रक्रिया को स्थानीय स्तर पर ‘पाती’ कहा जाता है।
इस परंपरा के कारण मंदिर कई परिवारों की धार्मिक आस्था और वैवाहिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है। स्थानीय लोगों के अनुसार, शादी होने के बाद कई परिवार नवविवाहित जोड़े के साथ दोबारा माता के दर्शन करने पहुंचते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं। इस तरह मंदिर में दर्शन के साथ विवाह की तारीख तय करने की परंपरा भी पीढ़ियों से चली आ रही आस्था का हिस्सा बनी हुई है।

मनोकामना पूरी होने पर वे दोबारा माता के दरबार पहुंचकर सीधा स्वस्तिक बनाते हैं।
मन्नत पूरी होने पर सीधा स्वस्तिक बनाते हैं मंदिर में मनोकामना और मन्नत पूरी होने से जुड़ी एक और परंपरा प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, श्रद्धालु अपनी मनोकामना लेकर आते हैं तो मंदिर में उल्टा स्वस्तिक बनाते हैं। मनोकामना पूरी होने पर वे दोबारा माता के दरबार पहुंचकर सीधा स्वस्तिक बनाते हैं। श्रद्धालु इसे अपनी मन्नत पूरी होने के प्रतीक के रूप में देखते हैं। नवरात्रि में भी कई भक्त माता के दर्शन के साथ अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं।

नवरात्रि में जालपा माता मंदिर में दर्शन, प्रसाद व्यवस्था पर विशेष ध्यान रहेगा।
ऊंची टेकरी पर स्थित है प्राचीन मंदिर जालपा माता मंदिर घने जंगल के बीच ऊंची टेकरी पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को करीब एक किलोमीटर की चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। पहाड़ी रास्ते से होकर मंदिर तक पहुंचने वाले भक्तों के लिए दर्शन की यात्रा भी आस्था का हिस्सा है। नवरात्रि के दौरान राजगढ़ के अलावा राजस्थान और दूसरे क्षेत्रों से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, ज्वालानाथ नाम के एक भक्त ने यहां तपस्या की थी। इसी दौरान पीपल के पेड़ के नीचे माता की प्रतिमा मिलने की कथा प्रचलित है। प्रतिमा में माता को सिंह पर सवार बताया जाता है। मंदिर के निर्माण को लेकर भी स्थानीय लोगों के बीच पुरानी कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि पुराने समय में राजाओं ने यहां मंदिर बनवाने का प्रयास किया था। मंदिर की सेवा से स्थानीय भील परिवारों की परंपरा जुड़े होने की बात भी कही जाती है।
नवरात्रि के नौ दिनों में जालपा माता मंदिर में दर्शन, प्रसाद और सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान रहेगा। एक ओर श्रद्धालु माता के दर्शन कर अपनी मनोकामनाएं मांग रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विवाह की तारीख तय करने वाली ‘पाती’ परंपरा और मन्नत से जुड़े स्वस्तिक की मान्यता इस मंदिर को अलग पहचान देती है। प्राचीन प्रतिमा, पहाड़ी पर स्थित मंदिर और दूर-दराज से पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के कारण जालपा माता मंदिर राजगढ़ के प्रमुख आस्था केंद्रों में शामिल है।