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हरियाणा का 1000 करोड़ रुपये का चावल होर्मुज स्ट्रेट में फंसा : जानिए, क्यों है 1 लाख टन बासमती के खराब होने का खतरा - Haribhoomi

July 26, 2026

मिडिल ईस्ट के प्रमुख समुद्री मार्ग पर व्यापार ठप होने से 25 दिनों से बीच समुद्र में अटका हुआ है चावल। एक्सपोर्टर्स ने केंद्र सरकार से ब्याज में छूट और डेमरेज शुल्क माफ करने की गुहार लगाई है।

 Basmati Rice Export Crisis

हरियाणा का बासमती चावल होर्मुज स्ट्रेट में फंसा।

  • Published: 26 Jul 2026, 05:40 PM IST
  • Last Updated: 26 Jul 2026, 05:40 PM IST

अमेरिका और ईरान के बीच गहराते राजनीतिक तनाव की सीधी गाज अब हरियाणा के कृषि और राइस एक्सपोर्ट कारोबार पर गिरी है। मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) के देशों में भारतीय बासमती चावल को पहुंचाने वाले प्रमुख समुद्री मार्ग होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) बाधित होने से व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इसके चलते बंदरगाहों और समुद्री जहाजों में हरियाणा का करोड़ों रुपये का बासमती चावल फंसा हुआ है, जिससे स्थानीय निर्यातकों के सामने भारी आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। 

25 दिन से ठप है सप्लाई
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और बोर्ड ऑफ ट्रेड के गैर-सरकारी सदस्य सतीश गोयल ने हालात पर चिंता जताते हुए बताया कि होर्मुज मार्ग बंद होने के कारण लगभग एक से डेढ़ लाख टन बासमती चावल की खेप बीते 25 दिनों से अटकी हुई है।

इस रुके हुए माल की अनुमानित कीमत 1,000 करोड़ रुपये से भी अधिक है। कुछ स्टॉक गुजरात के कांडला पोर्ट पर खुले आसमान के नीचे खड़ा है, तो कुछ माल समंदर के बीचों-बीच जहाजों में अटका है। मानसून के इस मौसम में पोर्ट पर रखे चावल के सड़ने और खराब होने का खतरा काफी बढ़ गया है।

किसानों पर पड़ सकता है बुरा असर
व्यापारियों की सबसे बड़ी चिंता आगामी धान सीजन को लेकर है। दो से तीन महीनों में नई फसल की आवक शुरू हो जाएगी। यदि पुराना माल विदेश नहीं पहुंचता और उसका भुगतान (पेमेंट) समय पर नहीं आता, तो राइस मिलर्स और व्यापारियों के पास तरलता (कैश फ्लो) की भारी कमी हो जाएगी।

इससे वे मंडियों से नई फसल खरीदने की स्थिति में नहीं होंगे, जिसका सीधा और नकारात्मक प्रभाव प्रदेश के किसानों पर पड़ेगा। साथ ही, गोदामों में रखे माल पर प्रति माह करीब 1 प्रतिशत की दर से ब्याज का बोझ लगातार बढ़ रहा है।

मध्य पूर्व के बाजार में अनिश्चितता, माल ढुलाई और इंश्योरेंस हुआ महंगा
भारत से हर साल ईरान, इराक और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों को लगभग 30 लाख टन बासमती चावल भेजा जाता है (प्रत्येक देश को करीब 10-10 लाख टन)। मौजूदा तनाव से पूरा मिडिल ईस्ट का बाजार डांवाडोल हो गया है।

युद्ध के बढ़ते जोखिम के चलते जहाजों का भाड़ा (फ्रेट) और समुद्री बीमा प्रीमियम (वार कवर इंश्योरेंस) काफी महंगा हो गया है, जिससे निर्यात की लागत में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है।

एक्सपोर्टर्स ने केंद्र सरकार से मांगी वित्तीय मदद
इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ने हाल ही में केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों से मुलाकात की है। निर्यातकों ने सरकार के सामने प्रमुख मांगे रखी हैं। 

  1. बंदरगाहों पर लगने वाले डेमरेज (विलंब) शुल्क को पूरी तरह माफ किया जाए। 
  2. परिवहन समस्याओं और बढ़े हुए बैंक ब्याज पर वित्तीय अनुदान या राहत दी जाए। 
  3. रास्ते में फंसे हुए माल के लिए विशेष 'वॉर कवर' (बीमा सुरक्षा) प्रदान की जाए। 

सरकार ने आश्वासन दिया है कि व्यापारियों के नुकसान को रोकने के लिए जल्द ही कोई व्यावहारिक समाधान तलाशा जाएगा और अगले हफ्ते समीक्षा बैठक की जाएगी। 

70 लाख टन रिकॉर्ड एक्सपोर्ट के लक्ष्य पर लगा ग्रहण
गौरतलब है कि वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान भारत ने 65 लाख टन बासमती चावल का रिकॉर्ड निर्यात किया था। इस साल देश ने 70 लाख टन चावल एक्सपोर्ट करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मोर्चे पर पैदा हुई इस अनिश्चितता ने इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अब सभी की निगाहें वैश्विक हालात में सुधार और होर्मुज मार्ग के जल्द खुलने पर टिकी हैं।