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World Elephant Day Special: सिकुड़ते जंगल, बढ़ती बस्ती और बदलते रास्ते... सुरक्षित ठिकाने तलाश रहे गजराज!

August 12, 2026

Protecting Elephant Corridors in Uttarakhand: आज पूरी दुनिया में विश्व हाथी दिवस मनाया जा रहा है. 12 अगस्त का ये दिन हाथियों के संरक्षण, उनके प्राकृतिक आवास और पारंपरिक आवागमन मार्गों को सुरक्षित रखने के संकल्प का दिन है. उत्तराखंड का कॉर्बेट लैंडस्केप देश के महत्वपूर्ण हाथी आवासों में शामिल है. यहां हाथियों की संख्या बढ़ना संरक्षण के लिहाज से अच्छी खबर है, लेकिन दूसरी ओर सिकुड़ते जंगल, बढ़ता मानवीय दबाव, सड़कें और प्रभावित होते हाथी कॉरिडोर गजराजों के लिए नई चुनौती बनते जा रहे हैं.

वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में करीब 1792 जंगली हाथी हैं, जबकि कॉर्बेट क्षेत्र में इनकी संख्या करीब 1226 दर्ज की गई है. संख्या बढ़ने के बावजूद सवाल यह है कि क्या हाथियों के लिए उनके पुराने और पारंपरिक रास्ते अब भी सुरक्षित हैं? कॉर्बेट लैंडस्केप में हाथियों की मौजूदगी हमेशा से इस क्षेत्र की जैव विविधता की पहचान रही है. जंगलों में हाथियों के बड़े-बड़े झुंड विचरण करते हैं और एक वन क्षेत्र से दूसरे वन क्षेत्र तक लंबी दूरी तय करते हैं, लेकिन अब इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ भोजन की नहीं, बल्कि सुरक्षित आवागमन की भी है.

हाथी क्यों कर रहे हैं रास्तों और समय में बदलाव?

वन्यजीव फोटोग्राफर दीप रजवार के मुताबिक, कॉर्बेट लैंडस्केप के कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां पहले हाथियों के बड़े झुंड नियमित रूप से दिखाई देते थे, लेकिन अब उनकी मौजूदगी में बदलाव देखने को मिल रहा है. पर्यटन गतिविधियां, सड़कों पर बढ़ता ट्रैफिक और देर रात तक होने वाला शोर हाथियों के प्राकृतिक व्यवहार को प्रभावित कर सकता है. ऐसे में हाथी टकराव से बचने के लिए अपने पुराने रास्तों और समय में बदलाव कर रहे हैं.

दीप रजवार का कहना है कि हाथी बेहद संवेदनशील वन्यजीव है. जब उसे पुराने रास्ते में दखल और भोजन में कमी महसूस होती है, तो वह वैकल्पिक रास्ता तलाशता है. उनका कहना है कि यदि समय रहते कूरी यानी लेंटाना को नियंत्रित नहीं किया गया और हाथी कॉरिडोर सुरक्षित नहीं किए गए, तो आने वाले समय में मानव-हाथी संघर्ष की समस्या और बढ़ सकती है.

हाथियों के लिए घास भोजन का प्रमुख स्रोत

कॉर्बेट के घास के मैदान भी इस पूरी कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. हाथियों के लिए घास भोजन का प्रमुख स्रोत है. पहले कई घास के मैदानों में नियंत्रित तरीके से प्रबंधन किया जाता था, जिसके बाद नई और कोमल घास उगती थी. हाथियों के झुंड इन क्षेत्रों में भोजन के लिए पहुंचते थे, लेकिन अब कई स्थानों पर लेंटाना यानी कूरी का तेजी से फैलाव चिंता का विषय बना हुआ है. यह आक्रामक खरपतवार देशी वनस्पतियों और घास को प्रभावित करती है. घास के मैदानों में इसका बढ़ता फैलाव हाथियों के प्राकृतिक भोजन पर असर डाल सकता है.

वन्यजीव विशेषज्ञ संजय छिम्वाल के मुताबिक, तराई-भाबर क्षेत्र में बढ़ती आबादी और निर्माण गतिविधियों का असर हाथियों के माइग्रेशन रूट पर पड़ा है. उनके अनुसार कई पुराने गलियारे अब आबादी और कंक्रीट के विस्तार के बीच बाधित हो चुके हैं, गोला रिवर कॉरिडोर और काठगोदाम के आसपास के क्षेत्र इसका उदाहरण हैं. उनका कहना है कि यमुना से लेकर नेपाल सीमा तक हाथियों के कई पारंपरिक कॉरिडोर अलग-अलग स्तर पर दबाव में आए हैं.

मानव-हाथी संघर्ष को कौन सी स्थिति बढ़ा सकती है?

उनके मुताबिक हाथी एक वन क्षेत्र से दूसरे वन क्षेत्र तक लगातार आवाजाही करते हैं. यदि उनके पारंपरिक रास्तों पर मानवीय गतिविधियां बढ़ती हैं तो हाथियों को वैकल्पिक रास्ते तलाशने पड़ते हैं और यही स्थिति आगे चलकर मानव-हाथी संघर्ष को बढ़ा सकती है. वहीं वन्यजीव प्रेमी हिमांशु तिरुवा हाथियों की बढ़ती संख्या को संरक्षण की बड़ी उपलब्धि मानते हैं. उनका कहना है कि करीब 1200 से बढ़कर 1226 के आसपास हाथियों की संख्या दर्ज हुई है. वह कहते है कि इसके साथ साथ चुनौतियां भी लगातार बढ़ रहीं है.

एलिफेंट कॉरिडोर को प्रभावित कर रही ये गतिविधियां

हिमांशु तिरुवा कहते हैं कि जिस तरह जंगल कट व सिकुड़ रहे हैं और जानवर बढ़ रहे हैं. यह कहीं न कहीं मानव वन्यजीव संघर्ष की ओर इशारा कर रहा है. वन्यजीव जंगलों से निकलकर आबादी की ओर रुख कर रहे हैं. अगर विकास की बात करें तो सड़कों का निर्माण और दूसरी विकास गतिविधियां हाथियों के पारंपरिक माइग्रेशन रूट यानी एलिफेंट कॉरिडोर को प्रभावित कर रही हैं. सीताबनी इसका एक बड़ा उदाहरण है. गर्मियों के दौरान पहले सीताबनी क्षेत्र में हाथियों की आवाजाही और झुंड काफी अधिक दिखाई देते थे, लेकिन अब यहां हाथियों की मौजूदगी में कमी देखने को मिल रही है. यह निश्चित तौर पर चिंता का विषय है.

हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर बाधित होने का असर सिर्फ उनके प्राकृतिक आवागमन पर नहीं पड़ता, बल्कि इससे मानव-हाथी संघर्ष की आशंका भी बढ़ जाती है, इसलिए इस पूरे विषय पर गंभीरता से विचार करते हुए एक ठोस रोडमैप तैयार करने की जरूरत है. सबसे पहले यह वैज्ञानिक तरीके से चिन्हित किया जाना चाहिए कि कौन-कौन से क्षेत्र हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर हैं. इसके बाद वन विभाग और सड़क विकास से जुड़े विभागों को आपसी समन्वय के साथ समानांतर रूप से काम करना होगा, ताकि विकास कार्यों के दौरान हाथियों के इन प्राकृतिक गलियारों में बाधा न आए. हिमांशु तिरूवा कहते है अगर समय रहते इन कॉरिडोर को सुरक्षित नहीं किया गया तो हाथी अपने पारंपरिक माइग्रेशन रूट छोड़ने के लिए मजबूर हो सकते हैं और इंसानी आबादी की तरफ उनका रुख बढ़ सकता है, इसलिए हाथियों के सुरक्षित आवागमन और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए एलिफेंट कॉरिडोर का संरक्षण बेहद जरूरी है.

हाथी जंगल के लिए बेहद महत्वपूर्ण प्रजाति

वहीं वन्यजीव प्रेमी गणेश रावत हाथियों को जंगल के लिए बेहद महत्वपूर्ण प्रजाति मानते हैं, उनके मुताबिक हाथी केवल एक बड़ा वन्यजीव नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करने वाली प्रजाति है,जंगल में हाथियों की गतिविधियां वनस्पतियों के फैलाव और प्राकृतिक संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. उनका कहना है कि उत्तराखंड की पहचान सिर्फ बाघों से नहीं, बल्कि हाथियों समेत तमाम वन्यजीवों की समृद्ध जैव विविधता से भी है, इसलिए हाथियों के संरक्षण को व्यापक वन संरक्षण से जोड़कर देखना जरूरी है.

वहीं मामले में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डॉ. साकेत बडोला के मुताबिक कॉर्बेट सहित पूरा क्षेत्र शिवालिक एलिफेंट रिजर्व का हिस्सा है और हाथियों के व्यापक आवागमन क्षेत्र से जुड़ा हुआ है. डॉ. बडोला के मुताबिक हाथी कॉरिडोर की पहचान को लेकर पहले से काम किया जा रहा है. वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया यानी WTI ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के सहयोग से अलग-अलग हाथी कॉरिडोर को चिन्हित करने को लेकर रिपोर्ट तैयार की है. इसमें कई महत्वपूर्ण और अलग-थलग पड़ चुके कॉरिडोर की पहचान की गई है.

हाथी कॉरिडोर की मौजूदा स्थिति का आकलन

कॉर्बेट क्षेत्र में भी चिन्हित हाथी कॉरिडोर की मौजूदा स्थिति का आकलन किया जा रहा है, वन विभाग WTI और मंत्रालय के सहयोग से सर्वे और निगरानी का काम जारी है, ताकि जरूरत के अनुसार इनके सुधार और संरक्षण की दिशा में आगे कदम उठाए जा सकें. हाथी लंबी दूरी तक सफर करने वाला वन्यजीव है. अपने जीवनकाल में वह बड़े भू-भाग का इस्तेमाल करता है, इसलिए उसके लिए जंगल सिर्फ एक जगह नहीं बल्कि अलग-अलग वन क्षेत्रों को जोड़ने वाला पूरा प्राकृतिक परिदृश्य है.

ऐसे में विश्व हाथी दिवस सिर्फ हाथियों की बढ़ती संख्या का जश्न मनाने का दिन नहीं, बल्कि उनके सुरक्षित भविष्य पर सोचने का अवसर भी है. जंगल बचेंगे, भोजन के प्राकृतिक स्रोत सुरक्षित रहेंगे और हाथी कॉरिडोर खुले रहेंगे, तभी गजराज और इंसान के बीच संतुलन कायम रह सकेगा. कॉर्बेट में बढ़ते हाथियों के आंकड़े उम्मीद जगाते हैं, लेकिन बदलते रास्ते चेतावनी भी दे रहे हैं, अब जरूरत है कि विकास और संरक्षण के बीच ऐसा संतुलन बनाया जाए, जिसमें जंगल भी सुरक्षित रहें और सदियों पुराने हाथी गलियारे भी.

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नमित अग्रवाल

नमित अग्रवाल

नमित अग्रवाल उत्तराखंड के नैनीताल जिले में मौजूद रामनगर (जिम कॉर्बेट) के रहने वाले हैं. वो पिछले 6 वर्षों से इलेक्ट्रॉनिक एवं डिजिटल मीडिया में सक्रिय पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. इस दौरान उन्होंने जनसरोकार से जुड़े मुद्दों को निष्पक्षता, तथ्यपरकता और संवेदनशीलता के साथ प्रमुखता से उठाने का निरंतर प्रयास किया है. उन्होंने Live News 24, TV100, स्वदेश, खबरें अभी तक और News India सहित विभिन्न समाचार संस्थानों के साथ कार्य करने का अनुभव प्राप्त किया है. रामनगर, कालाढूंगी, सल्ट तथा आसपास के क्षेत्रों में राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक, पर्यावरण, वन्यजीव, पर्यटन, शिक्षा और अपराध जैसे विविध विषयों पर अनेक ग्राउंड रिपोर्ट, एक्सक्लूसिव कवरेज और विशेष समाचार रिपोर्ट पेश की हैं.

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