Vikram 1 Space Mission: विक्रम-1 की सफलता से भारत का स्पेस सेक्टर प्राइवेट भागीदारी की ओर बढ़ा है. इन-स्पेस और नीतिगत सुधारों से स्टार्टअप्स व निवेश बढ़ा है. 2030 तक ग्लोबल स्पेस इकॉनमी में भारत की हिस्सेदारी 8% और 2047 तक 15% करने का लक्ष्य है.
Vikram 1 Space Mission: विक्रम-1 की सफलता से भारत का स्पेस सेक्टर प्राइवेट भागीदारी की ओर बढ़ा है. इन-स्पेस और नीतिगत सुधारों से स्टार्टअप्स व निवेश बढ़ा है. 2030 तक ग्लोबल स्पेस इकॉनमी में भारत की हिस्सेदारी 8% और 2047 तक 15% करने का लक्ष्य है.
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Photo: (IANS)
Vikram 1 Space Mission: एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के पहले प्राइवेट तौर पर विकसित ऑर्बिटल रॉकेट 'विक्रम-1' के ऑर्बिट तक पहुंचने से भारत के स्पेस सेक्टर में एक बड़ा बदलाव आया है; यह सरकारी एकाधिकार से हटकर 'मल्टी-एक्टर स्पेस इकोसिस्टम' की ओर बढ़ने का संकेत है. 'इंडिया नैरेटिव' की रिपोर्ट में कहा गया है, "भारत अब सिर्फ इसरो का कम लागत वाला विस्तार नहीं रह गया है, बल्कि एक ऐसा देश बन गया है जो कई तरह के खिलाड़ियों वाला स्पेस इकोसिस्टम बना रहा है. इसके पास अपने रॉकेट, सैटेलाइट और भविष्य में अपने क्रू वाले मिशन और स्पेस स्टेशन भी होंगे."
'इन-स्पेस' और नीतिगत सुधारों की मुख्य भूमिका
रिपोर्ट में कहा गया है कि विक्रम-1 उस कहानी को आगे बढ़ाता है जो चंद्रयान-3 की लैंडिंग और आदित्य-एल1 के सोलर मिशन से शुरू हुई थी. इसमें यह भी बताया गया है कि 2020 के आसपास शुरू हुए सुधारों और इन-स्पेस के गठन ने इस मिशन की सफलता में बड़ी भूमिका निभाई. रिपोर्ट के अनुसार, इन-स्पेस ने स्काईरूट को अपना हार्डवेयर टेस्ट करने और श्रीहरिकोटा में इसरो की अपनी रेंज से लॉन्च करने में मदद की. इन-स्पेस प्राइवेट लॉन्चर बनाने वालों, सैटेलाइट बनाने वालों और डाउनस्ट्रीम सर्विस प्रोवाइडर्स को एक ही नेशनल इकोसिस्टम में जोड़ता है, न कि उन्हें अलग-अलग और स्वतंत्र क्षमताएं विकसित करने के लिए छोड़ देता है.
एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग तकनीक का उपयोग
हैदराबाद स्थित स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस ने इस मिशन में एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग तकनीकों का इस्तेमाल किया, जिसमें रॉकेट के लिए ऑल-कार्बन कम्पोजिट मोटर केसिंग, हाई-परफॉर्मेंस सॉलिड मोटर्स और 3डी-प्रिंटेड प्रोपल्शन कंपोनेंट्स शामिल थे. रिपोर्ट में बताया गया है कि हाल तक ये मैन्युफैक्चरिंग तकनीकें सिर्फ इसरो और दुनिया की कुछ बड़ी एयरोस्पेस कंपनियों के पास ही थीं.
वैश्विक ग्राहकों का बढ़ता विश्वास
रिपोर्ट में कहा गया, "इसमें भारत की ग्रहा स्पेस, कॉस्मोसर्व, जर्मनी की डीक्यूबेड और खुद स्काईरूट के टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेशन पेलोड शामिल थे. यह इस बात का सबूत है कि भारत की प्राइवेट लॉन्च क्षमता को ऐसे ग्राहक भी परख रहे हैं, जिनके पास दुनिया में कहीं भी जाने का विकल्प था."
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स्पेस स्टार्टअप्स की संख्या और निवेश में भारी वृद्धि
भारत के स्पेस सेक्टर में पॉलिसी सुधारों की वजह से देश में स्पेस स्टार्टअप्स की संख्या 2022 में एक से बढ़कर 2024 तक लगभग 200 हो गई. रिपोर्ट के अनुसार, इस सेक्टर ने 2023 के सिर्फ आठ महीनों में लगभग 1,000 करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित किया.
2047 तक वैश्विक स्पेस इकॉनमी में बड़ी भागीदारी का लक्ष्य
मीडिया हाउस ने बताया कि पॉलिसी बनाने वाले 2021 में ग्लोबल स्पेस इकॉनमी में भारत की हिस्सेदारी को लगभग 2 प्रतिशत से बढ़ाकर 2030 तक 8 प्रतिशत और 2047 तक 15 प्रतिशत करने की योजना बना रहे हैं, और विक्रम-1 यह साबित करता है कि इसके लिए जरूरी इंडस्ट्रियल बेस असल में मौजूद है.
स्रोत--आईएएनएस
डिस्कलेमर- हेडिंग, सबहेड और समरी को छोड़कर पूरी स्टोरी न्यूज एजेंसी IANS की है.