डिजिटल लेनदेन में साइबर ठगी और फर्जीवाड़ा रोकने के लिए बैंकों ने भारतीय रिजर्व बैंक को एक नया सुरक्षा मॉडल प्रस्तावित किया है. इस व्यवस्था के तहत संदिग्ध या हाई-रिस्क यूपीआई ट्रांसफर के दौरान स्क्रीन पर 'YES/NO' का अलर्ट दिखाई देगा.
नई दिल्ली, 03 अगस्त, 2026 (दून हॉराइज़न)।
UPI : देशभर में यूपीआई के जरिए हर दिन करोड़ों लेनदेन हो रहे हैं. इसके साथ ही फर्जी रिफंड, कस्टमर केयर स्कैम और साइबर ठगी के मामले भी तेजी से बढ़े हैं. भारतीय बैंकों ने नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और भारतीय रिजर्व बैंक के सामने इस फर्जीवाड़े को रोकने के लिए एक नया सुरक्षा मॉडल रखा है.
इस नए सुरक्षा मॉडल के तहत किसी भी संदिग्ध या हाई-रिस्क यूपीआई पैसे के ट्रांसफर को पूरा करने से पहले यूजर की मोबाइल स्क्रीन पर एक ‘YES/NO’ का कंफर्मेशन अलर्ट दिखाई देगा.
पेमेंट ऐप में सॉफ्टवेयर बदलाव का सुझाव दिया गया है. इसके तहत पीयर-टू-पीयर लेनदेन में पैसे पाने वाले के खाते में रकम जमा होने से पहले भेजने वाले व्यक्ति से सीधी मंजूरी मांगी जाएगी.
अगर ग्राहक अपनी स्क्रीन पर ‘YES’ बटन दबाता है तो पेमेंट कुछ ही सेकंड में पूरा हो जाएगा. ‘NO’ चुनने की स्थिति में पूरा ट्रांजैक्शन तुरंत कैंसल कर दिया जाएगा.
अगर यूजर स्क्रीन पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देता है और शांत रहता है, तो पैसे ट्रांसफर तो हो जाएंगे लेकिन पाने वाले के बैंक अकाउंट में यह रकम एक घंटे के बाद जमा होगी.
यह पूरी कवायद रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की ओर से जारी किए गए एक डिस्कशन पेपर के जवाब में बैंकों द्वारा दिए गए सुझावों का हिस्सा है. आरबीआई ने बैंकों से डिजिटल पेमेंट फ्रॉड रोकने के उपायों पर राय मांगी थी.
आरबीआई के डिस्कशन पेपर में फर्जी कॉल, डीपफेक और जबरन कराए जाने वाले पेमेंट को रोकने के लिए तुरंत क्रेडिट देने के बजाय कुछ समय बाद पैसे खाते में डालने का विचार रखा गया था.
सभी तरह के पेमेंट में एक समान एक घंटे की देरी का बैंकों ने विरोध किया है. बैंकों का मानना है कि हर लेनदेन में एक घंटे की देरी से डिजिटल पेमेंट की रफ्तार सुस्त पड़ जाएगी और लोग दोबारा कैश का इस्तेमाल शुरू कर देंगे.
बैंकों ने सुझाव दिया है कि ‘YES/NO’ का यह अलर्ट हर 10,000 रुपये से ऊपर वाले ट्रांसफर पर दिखाने की जरूरत नहीं है. इसे सिर्फ असामान्य व्यवहार वाले ट्रांजैक्शन पर ही लागू किया जाना चाहिए.
असामान्य व्यवहार के तहत सुबह 2 बजे किया गया ट्रांसफर, किसी बिल्कुल नए अनजान व्यक्ति के खाते में भेजी जाने वाली रकम या हाल ही में खुले किसी बैंक अकाउंट में किया जाने वाला पेमेंट शामिल है.
शुरुआती चरण में इस सुरक्षा जांच को 10,000 रुपये के लेनदेन से जोड़ने की बात कही गई है. आने वाले समय में बैंकों ने इस लिमिट को बढ़ाकर 20,000 रुपये या 25,000 रुपये करने का प्रस्ताव दिया है.
ऑनलाइन लेनदेन में ज्यादातर मामले ऑथराइज्ड पुश-पेमेंट फ्रॉड के होते हैं. इसमें साइबर ठग पीड़ित को झांसे में लेकर खुद अपने हाथों से पेमेंट ट्रांसफर करवाते हैं.
मासिक स्तर पर देश में यूपीआई के जरिए करीब 23.66 अरब ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड किए जा रहे हैं. इसमें 10,000 रुपये से अधिक वाले ट्रांसफर की हिस्सेदारी भले ही 2 फीसदी हो, लेकिन संख्या के लिहाज से यह बहुत बड़ा आंकड़ा है.
नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने ट्रांजैक्शन में होने वाली किसी भी तरह की रुकावट और ‘लैग्ड क्रेडिट’ की व्यवस्था पर चिंता व्यक्त की है. एनपीसीआई का मानना है कि भारत को दूसरे देशों के धीमे मॉडल की नकल करने से बचना चाहिए.
‘डेफर्ड क्रेडिट’ यानी देरी से पैसे जमा होने वाली व्यवस्था म्यूचुअल फंड या निवेश से जुड़े फ्रॉड और ‘म्यूल अकाउंट’ के मामलों में ज्यादा असरदार साबित नहीं होगी. ऐसे मामलों में भेजने वाला और पाने वाला दोनों ही मिलीभगत में शामिल होते हैं.
प्रस्तावित नए सुरक्षा नियम केवल पीयर-टू-पीयर लेनदेन पर ही लागू होंगे. दुकानों या बड़े कारोबारियों को किए जाने वाले मर्चेंट पेमेंट को इस व्यवस्था से पूरी तरह बाहर रखा गया है.
देश में कई छोटे और सूक्ष्म कारोबारी अलग से करंट अकाउंट नहीं खुलवाते हैं. वे अपने निजी सेविंग्स अकाउंट के QR कोड से ही पेमेंट स्वीकार करते हैं, जिससे यह लेनदेन भी P2P की श्रेणी में आ जाता है और इन पर इस व्यवस्था का कुछ असर दिख सकता है.
डिजिटल फ्रॉड के आंकड़े लगातार डरा रहे हैं. वर्ष 2021 में दर्ज साइबर फ्रॉड के मामले 2.6 लाख थे, जो बढ़कर 2025 तक 28 लाख के पार पहुंच गए.
ठगी की कुल रकम भी 551 करोड़ रुपये से उछलकर सीधे 22,931 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है. इसी भारी आर्थिक नुकसान को देखते हुए रिजर्व बैंक जल्द ही नए नियमों का ड्राफ्ट जारी करने की तैयारी में है.