UPI payment rules: सरकार ने यूपीआई पेमेंट्स पर शुल्क लगाने का फैसला कई वर्षों के दबाव और वित्तीय चुनौतियों के कारण लिया है।

UPI पेमेंट पर क्यों लगाया गया चार्ज।
HighLights
यूपीआई पर शुल्क का दबाव कई वर्षों से बढ़ रहा था।
यूपीआई संचालन की वार्षिक लागत लगभग 20,000 करोड़ रुपये।
₹2000 तक के यूपीआई लेनदेन ग्राहकों के लिए शुल्क मुक्त।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। यूपीआई पेमेंट्स (UPI payments) पर शुल्क या मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने का फैसला सरकार ने इस वर्ष अचानक नहीं लिया है। दरअसल सरकार पर यह शुल्क फिर शुरू करने का दबाव कई वर्षों से बढ़ रहा था। पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया ने प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर जीरो एमडीआर पर फिर से विचार करने को कहा था।
इसके सदस्यों में एयरटेल पेमेंट्स बैंक, अमेजन पे, गूगल पे, कैशफ्री और जियो पेमेंट्स बैंक शामिल हैं। बैंकों ने भी अलग से उन मर्चेंट्स पर फीस लगाने की मांग की थी जिनका वार्षिक टर्नओवर 40 लाख रुपये से अधिक है। भारतीय रिजर्व बैंक और एनपीसीआई भी पूर्व में सरकार से इस नीति पर पुनर्विचार करने का आग्रह कर चुके हैं।
रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने हाल ही में मुद्रा नीति की घोषणा के बाद इस मुद्दे पर बात करते हुए साफ कहा कि किसी न किसी को तो लागत उठानी ही होगी, साथ ही यह भी कहा कि एमडीआर पर अंतिम फैसला सरकार का होता है, न कि केंद्रीय बैंक का।
अगस्त 2026 में 29.9 लाख करोड़ रुपये के लेनदेन
जीरो-एमडीआर का दौर और यूपीआई का भारतीय रिटेल पेमेंट की रीढ़ बनना एक ही समय में हुआ। सरकार के अनुसार, अकेले अगस्त, 2026 में इस नेटवर्क ने 29.9 लाख करोड़ रुपये के 2,451 करोड़ लेनदेन किए, लेकिन इससे उन बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स और फिनटेक कंपनियों को उस सिस्टम से कोई राजस्व प्राप्त नहीं हुआ जिसे उन्होंने बनाया और बरकरार रखा।
सरकार ने 2021 से मर्चेंट फीस के बजाय बजटीय प्रोत्साहन योजना के जरिये उस कमी को पूरा किया है, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि वह मॉडल अब अपनी सीमा तक पहुंच चुका है।
'संचालन की वार्षिक लागत लगभग 20,000 करोड़ रुपये'
उद्योग जगत के अनुमानों के मुताबिक, यूपीआई के संचालन, सर्वर बैंडविड्थ, धोखाधड़ी रोकने की प्रणाली और बैंक टेक्निकल सपोर्ट को बनाए रखने की वार्षिक लागत लगभग 20,000 करोड़ रुपये है। यह एक ऐसा खर्च है जिसे सरकार के मुताबिक, अब सिर्फ वित्तीय आवंटन से भरोसेमंद तरीके से पूरा नहीं किया जा सकता।
संसद की वित्त मामलों की स्थायी समिति ने अपनी 32वीं रिपोर्ट में चेतावनी दी कि जीरो-एमडीआर व्यवस्था सरकारी खजाने पर दबाव डालती है और दीर्घकालिक बुनियादी ढांचे में निवेश करने के इकोसिस्टम की क्षमता को सीमित करती है।
समिति ने आग्रह किया, "यूपीआई ईकोसिस्टम के लिए एक व्यवहार्य राजस्व तंत्र स्थापित करना बहुत जरूरी है ताकि वह सरकारी खजाने पर लगातार बोझ डाले बिना वित्तीय निरंतरता हासिल कर सके।"
समिति ने इस बात की ओर भी इशारा किया था कि सरकार जीरो-एमडीआर नीति के तहत बनी प्रोत्साहन योजना में सहायता के लिए हर वर्ष लगभग 2,000 करोड़ रुपये दे रही थी।
डिजिटल इंडिया को पटरी से उतराने को फेक न्यूज फैला रही कांग्रेस : भाजपा
यूपीआई भुगतान पर शुल्क को लेकर कांग्रेस के आरोपों को भाजपा ने गलत करार दिया है। पार्टी ने मुख्य विपक्षा दल को झूठ की दुकान बताया और डिजिटल इंडिया को पटरी से उतारने के लिए फेक न्यूज फैलाने का आरोप लगाया।
भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने कांग्रेस को झूठ की दुकान बताते हुए कहा कि सरकार ने यह बिल्कुल साफ कर दिया है कि ग्राहकों पर एमडीआर चार्ज नहीं लगाया जाएगा। उन्होंने कहा कि 96 प्रतिशत यूपीआई मर्चेंट (पी2एम) ट्रांजैक्शन 2000 रुपये या उससे कम के होते हैं और वे 100 प्रतिशत शुल्क मुक्त हैं।
पार्टी ने बताया कि परिवार व दोस्तों को पैसे भेजना मुफ्त रहेगा और छोटे विक्रेताओं को प्रति माह एक लाख रुपये तक की छूट से सुरक्षा मिलेगी। हालांकि व्यापारी 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान पर 0.4 प्रतिशत शुल्क देंगे, लेकिन 75,000 रुपये और उससे अधिक के भुगतान के लिए अधिक शुल्क 300 रुपये निर्धारित किया गया है।