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Udta Teer: स्पाई में कॉमेडी का तड़का यानी एक और जॉनर ब्लेंडिंग... ये ट्रेंड क्या कहलाता है?

October 23, 2026

Udta Teer: स्पाई में कॉमेडी का तड़का यानी एक और जॉनर ब्लेंडिंग… ये ट्रेंड क्या कहलाता है?

‘उड़ता तीर’ में आयुष्मान खुराना और सारा अली खान

Udta Teer Spy Comedy: आयुष्मान खुराना ने कॉमेडी फिल्मों में अपनी सीरियस पहचान बनाई है. उनके निभाए किरदार महज हास्य पैदा करने के लिए नहीं होते. आयुष्मान हंसाते तो हैं लेकिन गंभीर मुद्दों के साथ जुड़ाव बनाए भी रखते हैं. विकी डोनर से लेकर उड़ता तीर तक उन्होंने अपनी एक्टिंग से यही छाप छोड़ी है. टाइप कास्ट में भी वह अपने टेम्परामेंट को बनाए रखते हैं और बतौर एक्टर अपने फैन्स को कभी निराश नहीं करते. शुक्रवार 23 अक्टूबर को जब उनकी फिल्म उड़ता तीर रिलीज हुई तो विक्रांत बनाम बिलाल के रोल में उन्होंने एक बार फिर वही कमाल कर दिखाया, जिसके लिए जाने जाते हैं.

वास्तव में जॉनर ब्लेंडिंग अब आयुष्मान खुराना की पर्सनाल्टी की भी पहचान बन गई है. कॉमिक करते हैं साथ ही इमोशन से भी भर देते हैं. एक किरदार के इतने भावों को पर्दे पर जीना आसान नहीं. उसमें भी उड़ता तीर जैसी फिल्म, जहां दो परस्पर विपरीत जॉनर गुंथा हो. स्पाई यानी जासूसी और उसके साथ कॉमेडी. यहां की जासूसी भी दो परंपरागत दुश्मन देशों के बीच की है. एक तरफ भारत, दूसरी तरफ पाकिस्तान. दोनों देशों के जासूस दोनों देशों में खुफिया मिशन को अंजाम देने में जुटे हैं. ऐसे में जाहिर है ये मामला केवल जासूसी तक सीमित नहीं रह जाती बल्कि देशभक्ति से भी जुड़ जाती है.

देशभक्ति की जासूसी के साथ कॉमेडी का प्रयोग

डायरेक्टर-राइटर आकाश कौशिक की फिल्म उड़ता तीर का एक खास संवाद है- मुल्क से बढ़कर कुछ नहीं. भारत हो या पाकिस्तान दोनों मुल्कों के जासूसों के लिए यह संवाद एक मंत्र समान है. ऐसे गंभीर मिशन के साथ कॉमेडी पिरोना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं. देश भक्ति के साथ हास्य प्रसंग बहुत ही अटपटा प्रयोग है. लेकिन उड़ता तीर की कहानी इसी मकसद को लेकर चलती है. आयुष्मान खुराना के किरदार के जरिए फिल्म में कई प्रसंग बड़े ही अटपटे हैं लेकिन कॉमेडी के नाम पर वे सारे सीन खप जाते हैं. दर्शक हंसते हैं और सीन भूल जाते हैं. बचपन के पाकिस्तानी दोस्त के रोल में बिलाल और अशफाक के इमोशनल सीन भारतीय दर्शकों के लिए बेतुके हैं.

फिल्म में ऐसे कई और सीन बेसिरपैर के हैं. उड़ता तीर में आयुष्मान खुराना बिलाल अहमद नामक एक पाकिस्तानी जासूस बने हैं, जिसका एक खास मिशन है. उसे बताया गया है कि उसके माता-पिता की मौत का जिम्मेदार भारत है. ऐसे में वह और उसके कुछ और साथी छद्म नाम से भारत में पाकिस्तान के लिए जासूसी करते हैं. भारत में रहने के दौरान वह पहचान छिपाकर यामिनी यानी सारा अली खान से शादी कर लेता है. कहानी तब खास मोड़ पर आती है जब एक दुर्घटना में उसकी याददाश्त चली जाती है और वह पाकिस्तानी मिशन को भूल जाता है. खुद को केवल विक्रांत समझता है.

क्या बिलाल अहमद अपने मंसूबे में कामयाब होता है? या फिल्म की कहानी में इसके बाद क्या-क्या होता है, पत्नी बनी सारा अली खान उसके साथ क्या सलूक करती हैं- ये सब जानने के लिए थिएटर का रुख करें. लेकिन उड़ता तीर दो विपरीत जॉनर को मिक्स करके जिस मकसद के लिए बनाई गई है- वह कई बार संभलते-संभलते लड़खड़ाती है और लड़खड़ाते-लड़खड़ाते संभलती भी है. इस लिहाज से आकाश कौशिक का डेब्यू डायरेक्शन कहीं सफल है और कहीं असफल भी.

फिल्म में आयुष्मान खुराना और सारा अली खान के अलावा राम कपूर, गुलशन ग्रोवर, मुकुल देव, सुहैल नैयर, सुप्रिया पिलगांवकर, बृजेन्द्र काला और राहुल बोस जैसे दिग्गज कलाकार भी हैं. राहुल बोस को लंबे समय तक कोमा में रखना भी थोड़ा अटपटा लगता है.

हिंदी फिल्मों में जॉनर ब्लेंडिंग क्या है?

गौरतलब है कि उड़ता तीर जॉनर ब्लेंडिंग की सबसे नायाब और नई पेशकश है. जॉनर ब्लेंडिंग का मतलब है दो अलग-अलग जॉनर का मिक्स्चर है. हाल के सालों में जॉनर ब्लेंडिंग की कई फिल्में आई हैं. बॉक्स ऑफिस पर अंजाम की परवाह किए बिना हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में यह ट्रेंड जोर पकड़ता जा रहा है. उड़ता तीर में देशभक्ति के लिए की जाने वाली जासूसी के साथ कॉमेडी का प्रयोग किया गया है. हिंदी फिल्मों में ऐसा शायद ही कभी देखा गया है.

उड़ता तीर से कुछ ही दिनों पहले यामी गौतम के मुख्य किरदार वाली फिल्म आई- नई-नवेली. निर्देशक बालाजी मोहन और राइटर हिमांशु शर्मा-दिव्यनिधि शर्मा की उस फिल्म में एक साथ चार जॉनर का प्रयोग किया गया था. अब तक हम हॉरर कॉमेडी की फिल्में देखते रहे हैं लेकिन नई नवेली में हॉरर कॉमेडी के साथ-साथ माइथो फैंटेसी जॉनर का भी इस्तेमाल किया गया था.

माइथो और फैंटेसी दोनों अलग-अलग जॉनर हैं लेकिन इनके प्रयोग से फिल्म अलग ही फ्लेवर में नजर आई. नई नवेली में भरपूर कलर था लेकिन कितनी कामयाबी मिली- कहानी कितने दर्शकों को पसंद आई या कि यामी गौतम का किरदार कितने लोगों को सटीक लगा- ये सबकुछ रिव्यूज और बॉक्स ऑफिस कलेक्शन की रिपोर्ट में है.

हॉरर कॉमेडी को मिल चुकी है कामयाबी

हालांकि हर बार जॉनर ब्लेंडिंग को दर्शकों से खारिज नहीं किया है. अनेक बार यह ब्लॉकबस्टर भी रही है. मैडोक फिल्म्स ने इस दिशा में सफल प्रयोग किए हैं. केवल हॉरर या केवल कॉमेडी देख देखकर दर्शक बोरियत महसूस कर रहे थे. वहीं हॉरर में आम तौर पर अंधविश्वास भी रहता है लेकिन हॉरर कॉमेडी में अंधविश्वास पर तंज भी होते हैं. इस लिहाज से स्त्री, मुंज्या, भेड़िया या फिर थाम्मा की हॉरर कॉमेडी को दर्शकों ने खूब पसंद किया है. तो वहीं भूल भुलैया सीरीज जैसी हॉरर कॉमेडी को भी दर्शकों ने खूब पसंद किया.

इन सभी फिल्मों में नयापन था. विषय नए, कहानी नई. हॉरर कॉमेडी सीरीज की सक्सेस को देखते हुए प्रियदर्शन जैसे डायरेक्टर ने भी अक्षय कुमार के साथ भूत बंगला बनाई तो अहमद खान निर्देशित फिल्म आई- वेलकम टू द जंगल-जिसमें भी अक्षय कुमार मुख्य रोल में थे. लेकिन इस बार हॉरर कॉमेडी को बॉक्स ऑफिस पर लॉटरी नहीं लगी.

जिसके बाद अब कॉमेडी में कुछ और प्रयोग करने की कोशिश की गई-इसी प्रयोग की देन है- नई नवेली और फिर उड़ता तीर. इसमें नई नवेली की तो बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट आ चुकी है और अब इंतजार रहेगा – उड़ता तीर निशाने पर लगा या नहीं.

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संजीव श्रीवास्तव

संजीव श्रीवास्तव

बेस्ट फिल्म क्रिटिक स्वर्ण कमल, 72वां नेशनल अवॉर्ड विजेता. महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु के हाथों नेशनल अवॉर्ड मिला तो यकीन हुआ कि एक दिन अंधेरा छंटता है और सूरज निकलता है. श्रद्धेय अटल जी यह लिखकर प्रेरणा शक्ति जगा गए थे. साहिर साहब ने भी लिखा था न- वो सुबह कभी तो आएगी. करीब तीन दशक की पत्रकारिता और लेखन के दौरान रोलर-कोस्टर का आरोह-अवरोह जैसे लाइफ पार्टनर ही बन गया. जीवन साथी को इस बात का गर्व है कि मुझे शराब की लत नहीं लेकिन सिनेमा का नशा ईर्ष्या की वजह बनता रहा. पैतृक गांव-घर बिहार के सीतामढ़ी जिले का रिखौली गांव-जहां तब बिजली नहीं थी- टीवी सीरियल शहर के रिश्तेदारों के घर जाकर देखता था. कहते हैं- गेंद पर जितना दबाव डालो वह उतनी उछलती है. अब आंखों के आगे रेड कार्पेट की चकाचौंध भी होती है. तमन्ना लेक्चरॉर बनने की थी लेकिन फिल्मों का प्रोफेसर प्यारेलाल बन गया. रिखौली से निकलकर पहले भोपाल, फिर दिल्ली और मुंबई तक मीडिया की मुख्यधारा में सक्रिय रहा. ब्रेकिंग न्यूज़ से लेकर क्रिएटिव राइटिंग तक में कलम को हथियार बनाकर चलाया- मानों मेरे भीतर रूस Vs यूक्रेन का युद्ध हो रहा हो. दफ्तर की जरूरतें और खुद की ख्वाहिशों का विस्तार- दोनों का तालमेल रूस बनाम यूक्रेन का युद्ध ही तो है. सिनेमा-संगीत समेत देश-विदेश की राजनीति, लिटरेचर, क्राइम आदि विविध विषयों (स्पोर्ट्स छोड़कर) पर बेबाकी से लिखा. आसानी से समझ आने वाली और दिल के रास्ते दिमाग तक पहुंचने वाली भाषा लिखना पसंद है. सही विचार वही जो समाज सापेक्ष, देश हित में वंचितों के न्याय का पक्षधर हो. फिल्मों पर अब तक तीन किताबें (कुछ पर काम जारी), दो उपन्यास और कुछ पटकथा-संवाद भी लिखे. शुरुआत प्रिंट मीडिया में सब-एडिटरी के बाद साल 2000 से टीवी न्यूज़ की दुनिया में प्रवेश. सबसे पहले जैन टीवी फिर सहारा समय में करीब चौदह साल गुजारा- जहां चुनाव-बजट, प्राइम टाइम स्पेशल/सिनेमा शोज प्रोड्यूस किए और मुंबई में एंटरटेंमेंट की रिपोर्टिंग भी की. अनेक फिल्मी हस्तियों के इंटरव्यूज़ हुए. लाइमलाइट को करीब से देखा. फिर दिल्ली- जहां सूर्या समाचार, कोविड के दौरान एबीपी न्यूज़ और न्यूज़ इंडिया के आउटपुट होते हुए अब डिजिटल मीडिया में TV9 भारतवर्ष से सम्बद्ध. नेशनल अवॉर्ड मानो जीवन का गेट-वे है, जो आगे कौन-सी दिशा दिखाता है, इसका इंतजार है.

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