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जानिए क्या है UCC और संविधान का अनुच्छेद 44?: विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामलों से जुड़ा है देश में एक समान कानून का यह प्रावधान - Up18 News

September 16, 2026

​उत्तर प्रदेश। देश के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर ‘समान नागरिक संहिता’ यानी Uniform Civil Code (UCC) का मुद्दा चर्चा के केंद्र में आ गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा यह कहे जाने के बाद कि वर्ष 2029 से पहले देश के एनडीए-शासित राज्यों में यूसीसी लागू किया जाएगा, उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी हलचल तेज हो गई है। राज्य में भारतीय जनता पार्टी ने इसे अपनी प्रमुख प्रतिबद्धताओं में शामिल बताते हुए इस दिशा में आगे बढ़ने के संकेत दिए हैं।

आखिर क्या है UCC और इसका दायरा?

समान नागरिक संहिता का सीधा अर्थ यह है कि धर्म, जाति या समुदाय के आधार पर अलग-अलग पर्सनल लॉ (व्यक्तिगत कानूनों) के स्थान पर देश या राज्य के सभी नागरिकों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था हो। इसका मुख्य संबंध विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति के बंटवारे और गोद लेने जैसे नागरिक मामलों से होता है। पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में यूसीसी पहले ही लागू किया जा चुका है, जिसके नियम इन्हीं व्यक्तिगत मामलों को एक समान कानूनी ढांचे के अंतर्गत लाते हैं।

​संविधान का अनुच्छेद 44 और यूसीसी

भारतीय संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों (Directive Principles of State Policy) के अंतर्गत अनुच्छेद 44 में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख किया गया है कि राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। हालांकि, यह नीति-निर्देशक तत्वों का हिस्सा है, इसलिए यह संविधान लागू होने के समय से ही एक वैचारिक और संवैधानिक बहस का विषय रहा है।

उत्तर प्रदेश के संदर्भ में क्या है स्थिति?

फिलहाल उत्तर प्रदेश में यूसीसी लागू नहीं है, लेकिन सितंबर 2026 में केंद्र सरकार की ओर से आई नई समयसीमा वाली घोषणा के बाद राज्य के राजनीतिक गलियारों में इस पर मंथन शुरू हो गया है। जहां एक ओर सत्तारूढ़ दल इसे समानता, सामाजिक न्याय और महिलाओं के अधिकारों से जोड़कर देख रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक-धार्मिक संगठनों ने इसके प्रावधानों, व्यक्तिगत कानूनों पर इसके असर और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

चूंकि उत्तराखंड का यूसीसी मॉडल पहले से सामने है, इसलिए अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उत्तर प्रदेश सरकार इस दिशा में क्या कानूनी कदम उठाती है और प्रस्तावित कानून में किन प्रावधानों को जगह मिलती है। फिलहाल यूसीसी अब केवल एक कानूनी मसला नहीं, बल्कि नीति, व्यक्तिगत अधिकारों और तीखी राजनीतिक बहस का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है।