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महाराष्ट्र UCC कमेटी में फूट, जस्टिस आरसी चव्हाण ने दिया इस्तीफा, उठाए सवाल

September 22, 2026

महाराष्ट्र की यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) समिति की बैठक के बाद समिति के सदस्य जस्टिस (रिटायर्ड) आरसी चव्हाण ने इस्तीफा दे दिया. समिति के काम करने के तरीके को लेकर असहमति के बाद उन्होंने यह कदम उठाया. सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस रंजना देसाई की अध्यक्षता में सात सदस्यीय समिति का गठन इसी साल जुलाई में महाराष्ट्र में UCC लागू करने के लिए नियम और सिफारिशों का मसौदा तैयार करने के लिए किया गया था.

बॉम्बे हाई कोर्ट के जज के पद से 2013 में रिटायर हुए आरसी चव्हाण ने 19 सितंबर को ईमेल के जरिए समिति की अध्यक्ष जस्टिस रंजना देसाई को अपना इस्तीफा भेजा. यह इस्तीफा उस बैठक के बाद दिया गया, जिसे जल्दबाजी में आयोजित किया गया प्रतीत होता था. अपने ईमेल में उन्होंने लिखा, 'अब तक गंवाए गए समय को देखते हुए आज की बैठक जल्दी खत्म करना अच्छा रहा, बिना मुद्दे को घुमाए.'

ईमेल में समिति की बैठक में ऑनलाइन माध्यम से चर्चा के लिए रखे गए विभिन्न एजेंडे का भी जिक्र किया गया. बैठक में एक गैर-सदस्य भी शामिल हुआ था, जिसका जिक्र पिछली बैठक में समिति की अध्यक्ष ने किया था. बैठक में उस गैर-सदस्य ने कहा कि वेबसाइट में बदलाव की जरूरत है. इसके बाद अध्यक्ष ने अधिकारियों को एक सप्ताह के भीतर उनके निर्देशों के अनुसार जरूरी काम करने का निर्देश दिया.

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हालांकि, बैठक का मुख्य मुद्दा प्रश्नावली को अंतिम रूप देना था, जो समिति के एजेंडे में शामिल था. आरसी चव्हाण ने अपने पत्र में लिखा कि तीन सदस्यों ने अपने विचार रखने की कोशिश की. इनमें जवाब देने वालों से केवल हां या ना में जवाब लेने और समिति की सदस्य डॉ. सुवर्णा रावल की निगरानी में प्रोफेसरों से प्रश्नावली की पेशेवर तरीके से जल्द जांच कराने जैसे सुझाव शामिल थे. उन्होंने लिखा कि अध्यक्ष पहले ही अपनी ओर से अंतिम प्रश्नावली प्रसारित कर चुकी थीं और वेबसाइट तैयार होने के बाद इसे अपलोड करने की बात कही गई थी. इसके बाद बैठक का तीसरा और अंतिम एजेंडा भी पूरा हो गया, इसलिए उन्होंने समय और इंटरनेट बचाने के लिए लॉग आउट कर दिया.

उद्देश्य हट गया

जस्टिस आरसी चव्हाण ने लिखा कि प्रश्नावली को लेकर अपने विचार रखने की उनकी कोशिश इस गलतफहमी की वजह से थी कि समिति का उद्देश्य महाराष्ट्र के लोगों की राय जानना और देर से होने वाली शादियों, विकृतियों, बांझपन, अस्थिर विवाह और विवादों के समाधान में लगने वाले समय जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए सहमति बनाना था. उन्होंने कहा कि अब यह उद्देश्य हट गया है और उन्हें लगता है कि इसका उद्देश्य केवल लोगों को हां या ना में सवालों के जवाब देने का अवसर देना है, ताकि आंकड़ों का विश्लेषण आसानी से किया जा सके.

जस्टिस चव्हाण ने कहा कि अगर बैठक में शामिल हुए गैर-सदस्य को समिति में शामिल किया जाना है, तो वह अपनी सीट खाली कर रहे हैं, ताकि सरकार उनकी जगह जल्द भर सके. उन्होंने अपने इस्तीफे पर जल्द जवाब की उम्मीद जताते हुए लिखा, 'अब एक स्वतंत्र नागरिक के रूप में मैं अपने विचार रखने के लिए स्वतंत्र रहूंगा.'

युवाओं की अपेक्षा को लेकर भी राय साझा की

UCC को लेकर जस्टिस चव्हाण ने युवाओं की अपेक्षाओं को लेकर अपनी समझ भी साझा की. उन्होंने कहा कि UCC का उद्देश्य परिवार को समाज की एक इकाई के रूप में बनाए रखना, सुरक्षा देना और मजबूत व स्वस्थ मानव समाज के लिए आने वाली पीढ़ियों तक स्वस्थ DNA पहुंचाने को बढ़ावा देना होना चाहिए. उन्होंने स्वस्थ अंतरंग संबंधों की जरूरतों को पूरा करने के सुरक्षित तरीकों की बात भी कही.

उन्होंने कहा कि सभी वयस्कों के बीच व्यक्तिगत अंतरंग संबंधों की अनुमति होनी चाहिए और उन्हें किसी तरह के कलंक से नहीं जोड़ा जाना चाहिए. ऐसे संबंधों को लेकर पहचान का लेबल समाज की पसंद पर छोड़ा जाना चाहिए. उन्होंने UCC को जेंडर न्यूट्रल रखने की बात कही, जिसमें पति-पत्नी की जगह केवल ‘स्पाउस’ और बेटा-बेटी की जगह केवल ‘बच्चे’ हों. उन्होंने इसे ‘अधार्मिक’ रखने की बात भी कही, जिसमें किसी धार्मिक प्रथा को कुचले बिना उसे निजी स्थान तक सीमित रखा जाए. उन्होंने विरासत में सभी वारिसों को समान रूप से संपत्ति मिलने और प्रथम या द्वितीय श्रेणी के वारिस जैसी व्यवस्था को नजरअंदाज करने की बात कही.

इन चीजों में होनी चाहिए स्वतंत्रता

जस्टिस चव्हाण ने कहा कि वयस्कों को अपने व्यक्तिगत इंटिमेट रिलेशन की शर्तें और सीमाएं तय करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए. इसमें संबंध की अवधि, अलग होने या समाप्त करने का तरीका, संपत्ति का बंटवारा, विरासत और बच्चों व माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी जैसे मुद्दे उचित समझौतों के जरिए तय किए जा सकें. उन्होंने धार्मिक आवश्यकताओं के तहत होने वाले सप्तपदी, निकाहनामा या विवाह को भी समझौते के रूप में बताया और कहा कि ऐसे समझौतों में अलगाव, बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारी जैसी शर्तें शामिल होनी चाहिए.

उन्होंने निजता के अधिकार के अधीन व्यक्तिगत अंतरंग संबंधों के आसान और स्वैच्छिक पंजीकरण की सुविधा देने की बात कही. साथ ही कहा कि अपंजीकृत संबंधों में रहने वाले लोगों को राज्य की सहायता या साथी की मृत्यु अथवा अक्षमता की स्थिति में अनुकंपा नियुक्ति और बीमा दावों जैसी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलना चाहिए. विरासत के मामले में ऐसे अपंजीकृत संबंधों को नजरअंदाज करने की बात भी उन्होंने कही. उन्होंने कहा कि सभी बच्चों को वैध माना जाना चाहिए और जैविक या दत्तक माता-पिता की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वे 18 वर्ष की आयु तक बच्चों की शिक्षा और देखभाल करें.
 

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