Updated: Wednesday, September 23, 2026, 20:29 [IST]
SIR Row 2026: मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद की रिपोर्ट के बाद सियासी घमासान तेज हो गया है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की। इनमें Form 6, मतदाता सूची के डेटा और चुनावी सॉफ्टवेयर से जुड़े मुद्दे शामिल बताए गए हैं।
अब BJP ने इन आरोपों को खारिज करते हुए चुनाव आयोग का बचाव किया है। BJP सांसद संबित पात्रा ने कहा कि चुनाव आयुक्तों के बीच बातचीत और असहमति को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा समझना चाहिए। उनके मुताबिक, 14 बार आधिकारिक पत्राचार होना इस बात का संकेत है कि आयोग के भीतर विचार-विमर्श हुआ।
संबित पात्रा बोले- '14 बार बातचीत हुई, यही स्वस्थ लोकतंत्र है'
संबित पात्रा ने कहा कि अगर तीनों चुनाव आयुक्त हर मुद्दे पर बिना चर्चा के एकमत हो जाएं तो विपक्ष इसे सरकार के दबाव का नतीजा बता सकता है। वहीं, जब उनके बीच पत्राचार और विचार-विमर्श की जानकारी सामने आई तो उस पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया रिपोर्टों के अनुसार तीनों आयुक्तों के बीच 14 मौकों पर आधिकारिक संवाद हुआ। पात्रा ने इसे 'स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी' बताया। उनके मुताबिक, चुनाव आयोग के दस्तावेज में यह स्पष्ट किया गया है कि आधिकारिक विचार-विमर्श के बाद SIR पर अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया।
विपक्ष के 'तानाशाही' वाले आरोप पर क्या बोले?
पात्रा ने कहा कि विपक्ष पहले चुनाव आयोग पर यह आरोप लगाता था कि तीनों चुनाव आयुक्त सरकार के साथ एकमत होकर फैसले लेते हैं। अब जब आयोग के भीतर पत्राचार की जानकारी सामने आई है, तो विपक्ष उसे भी विवाद का आधार बना रहा है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाएं लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत काम कर रही हैं। यह बयान BJP की राजनीतिक प्रतिक्रिया है। दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों को निर्णय प्रक्रिया और संस्थागत स्वतंत्रता से जुड़े सवालों के रूप में उठाया है।
पात्रा ने नवीन चावला का उदाहरण क्यों दिया?
संबित पात्रा ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और कांग्रेस के पुराने कार्यकाल का जिक्र करते हुए नवीन चावला का उदाहरण दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि चावला की नियुक्ति को लेकर उस समय कांग्रेस नेतृत्व के प्रभाव पर सवाल उठे थे। पात्रा ने 2009 के लोकसभा चुनाव और तत्कालीन चुनाव आयोग की भूमिका का भी जिक्र किया।
हालांकि, 'सोनिया गांधी ने नवीन चावला को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया' कहना संवैधानिक प्रक्रिया का पूरा विवरण नहीं देता। चावला को 2005 में चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था। नियुक्ति औपचारिक रूप से तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा की जाती थी। इसलिए पात्रा के बयान को उसी राजनीतिक संदर्भ में प्रस्तुत करना जरूरी है।
2023 के कानून का भी जिक्र
पात्रा ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था का भी बचाव किया। उन्होंने कहा कि पहले नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए जाते थे, जबकि अब चयन समिति में लोकसभा में विपक्ष के नेता को भी शामिल किया गया है। मौजूदा 2023 कानून के तहत CEC और EC की नियुक्ति के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल हैं। इसी कानून की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। 23 सितंबर को इस मामले में दो जजों की बेंच का बंटा हुआ फैसला भी आया, जिसके बाद मामला बड़ी बेंच के गठन के लिए CJI के सामने रखने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
सोनिया गांधी के मामले का भी किया जिक्र
BJP सांसद ने 2009 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की लोकसभा सदस्यता से जुड़े विवाद का भी जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि उस समय चुनाव आयोग के भीतर अलग-अलग राय सामने आई थी। पात्रा ने इसे मौजूदा विवाद से जोड़ते हुए कहा कि चुनाव आयोग में मतभेद होना कोई नई बात नहीं है और इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जाना चाहिए। यहां भी पात्रा द्वारा किए गए राजनीतिक दावों और उस समय के आधिकारिक रिकॉर्ड को अलग-अलग देखना जरूरी है।
SIR पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
संबित पात्रा ने 27 मई 2026 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में बिहार में चुनाव आयोग द्वारा कराई गई SIR प्रक्रिया की वैधता बरकरार रखी थी। अदालत ने माना था कि चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत SIR कराने का अधिकार है। कोर्ट ने यह भी माना कि बिहार में SIR का मकसद मतदाता सूची को अधिक सटीक और विश्वसनीय बनाना व स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना था।
'भरोसा नहीं है तो जनता पर भरोसा करना होगा'
SIR और चुनाव आयोग पर उठ रहे सवालों के बीच पात्रा ने कहा कि अगर किसी को चुनाव आयोग या EVM पर भरोसा नहीं है, तो अंततः जनता के फैसले पर भरोसा करना होगा। उन्होंने कहा कि चुनाव में अंतिम फैसला मतदाता करते हैं और BJP लोकतांत्रिक संस्थाओं का बचाव कर रही है।
राहुल गांधी पर 'देशद्रोह' का आरोप
संबित पात्रा ने राहुल गांधी पर भी तीखा हमला किया। उन्होंने विदेशों में भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर राहुल गांधी के बयानों का जिक्र करते हुए उन पर 'देशद्रोह' का आरोप लगाया। पात्रा ने कहा कि विदेश जाकर भारत के सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग, प्रधानमंत्री और अन्य संस्थाओं पर सवाल उठाना देश के हित के खिलाफ है।
'हम किसी व्यक्ति को नहीं, लोकतंत्र को बचा रहे'
पात्रा ने कहा कि BJP किसी एक व्यक्ति या चुनाव आयुक्त का बचाव नहीं कर रही, बल्कि उनका दावा है कि पार्टी संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ फैलाए जा रहे 'गलत प्रचार' का जवाब दे रही है। उन्होंने विपक्ष को संसद में CEC के खिलाफ कार्रवाई या महाभियोग जैसी प्रक्रिया आगे बढ़ाने की चुनौती भी दी। पात्रा ने कहा कि संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने पर विपक्ष के हंगामे की संभावना है।
SIR विवाद में अब दो पक्षों की तस्वीर
- विपक्ष का पक्ष: दो चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियों को विपक्ष चुनाव आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया और संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल मान रहा है। कई विपक्षी नेता CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई और SIR की समीक्षा की मांग कर रहे हैं।
- BJP का पक्ष: संबित पात्रा का कहना है कि चुनाव आयुक्तों के बीच पत्राचार और विचार-विमर्श लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। BJP का दावा है कि SIR पर अंतिम फैसला तीनों आयुक्तों की सहमति से हुआ।
- चुनाव आयोग का पक्ष: EC के सूत्रों ने कहा है कि SIR सहित आयोग के सभी फैसलों को तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी थी।