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SC/ST-OBC आरक्षण पर बड़ा फैसला, मां की जाति-आवास के आधार पर भी ठोक सकते हैं दावा; भले ही पिता...

September 1, 2026

Sep 01, 2026 08:43 pm ISTलाइव हिन्दुस्तान, चेन्नई

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हाई कोर्ट ने कहा कि आरक्षण का आधार केवल सामाजिक पिछड़ापन और बच्चे से जुड़ी परेशानियां और कलंक है; लाभ देने के लिए यही मुख्य कारक है। चाहे वह पितृसत्तात्मक हो या मातृसत्तात्मक, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

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आरक्षण को लेकर मद्रास हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। (AI Image)

मद्रास हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि पुडुचेरी में पैदा हुए और पले-बढ़े उम्मीदवार अपनी मां के मूल निवासी दर्जे (स्थानीय निवास और जाति) के आधार पर भी अनुसूचित जाति (SC), अत्यंत पिछड़ा वर्ग (MBC) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण के लाभ का दावा कर सकते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही उनके पिता संघ शासित प्रदेश से बाहर के प्रवासी हों, तो भी उम्मीदवारों को इस संवैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है। जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती की पीठ ने पुडुचेरी प्रशासन के उस रुख को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि चूंकि भारतीय समाज पितृसत्तात्मक है, इसलिए जाति की स्थिति केवल पिता के माध्यम से ही तय की जानी चाहिए।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के तहत इस तरह के तर्क को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता, विशेष रूप से 2004 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में किए गए संशोधन के बाद, जिसने महिलाओं को समान संपत्ति अधिकार दिए हैं। हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि लिंग (sex) एक जैविक सच्चाई है, लेकिन समाज में व्याप्त लैंगिक रूढ़ियाँ केवल कहानियों और धारणाओं पर आधारित हैं जो आवश्यक रूप से सच नहीं हैं।

समानता और सामाजिक नुकसान ही आरक्षण का मुख्य आधार

अदालत ने पुडुचेरी सरकार की वर्तमान नीति में एक स्पष्ट विसंगति को भी उजागर किया। प्रशासन की नीति के अनुसार, यदि पुडुचेरी का कोई पुरुष किसी प्रवासी महिला से शादी करता है, तो उनके बच्चे को पुडुचेरी में आरक्षण का लाभ दिया जाता है। लेकिन जब पुडुचेरी की कोई महिला किसी प्रवासी पुरुष से विवाह करती है, तो उसी समुदाय में जन्मे और पले-बढ़े बच्चे को इस लाभ से वंचित कर दिया जाता था। इस विसंगति को दूर करते हुए अदालत ने स्पष्ट कहा, “आरक्षण का आधार केवल सामाजिक पिछड़ापन और बच्चे से जुड़ी परेशानियां और कलंक है; लाभ देने के लिए यही मुख्य कारक है। चाहे वह पितृसत्तात्मक हो या मातृसत्तात्मक, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।”

28 याचिकाकर्ताओं के पक्ष में आया फैसला

हाई कोर्ट ने 27 अगस्त को दिए अपने आदेश में 28 याचिकाओं को स्वीकार करते हुए पुडुचेरी प्रशासन के उन फैसलों को रद्द कर दिया, जिन्होंने याचिकाकर्ताओं के जाति प्रमाणपत्रों को केवल इसलिए 'प्रवासी' श्रेणी में बदल दिया था क्योंकि उनके पिता अन्य राज्यों से आकर बसे थे। सुप्रीम कोर्ट के रमेशभाई दाभाई नायक बनाम गुजरात राज्य मामले के परीक्षण का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता अपनी मां के समुदाय में पैदा हुए, वहीं शिक्षित हुए और लगातार वहीं रहे, इसलिए उन्होंने अपनी मां के समुदाय की तरह ही समान कठिनाइयां झेली हैं।

किन मामलों में नहीं मिलेगा आरक्षण

अदालत ने यह भी साफ किया कि 2000 के जिस सरकारी ज्ञापन पर प्रशासन भरोसा कर रहा था, उसे पहले ही पी. जया बनाम भारत संघ मामले में असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है और यह मामला 2023 में सुप्रीम कोर्ट से भी अंतिम निर्णय पा चुका है। इसके अतिरिक्त, केंद्रीय मंत्रालय का 2025 का पत्र केवल एक आंतरिक परामर्श था, जो प्रशासन को हाई कोर्ट के बाध्यकारी फैसलों की अनदेखी करने का अधिकार नहीं देता है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यह फैसला झूठे दावों या उन मामलों को सुरक्षा प्रदान नहीं करेगा जहां स्वयं मां की मूल निवास स्थिति विवादित हो।