लखनऊ/मेरठ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले दलित राजनीति के भीतर प्रतिनिधित्व और नेतृत्व को लेकर नई बहस तेज होती दिख रही है। स्विट्जरलैंड से भारत लौटीं सामाजिक कार्यकर्ता और पीएचडी स्कॉलर डॉ. रोहिणी घावरी ने वाल्मीकि समाज की राजनीतिक भागीदारी (Rohini Ghavari Valmiki Politics) का मुद्दा प्रमुखता से उठाते हुए कहा है कि समुदाय को केवल चुनावों में वोट बैंक या भीड़ के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उसे विधानसभा से लेकर शीर्ष राजनीतिक पदों तक नेतृत्व का अवसर मिलना चाहिए।
भारत लौटने के बाद मेरठ में अपनी पहली सामाजिक बैठक में रोहिणी ने साफ संकेत दिया कि आने वाले दिनों में उनकी सक्रियता केवल सामाजिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहने वाली। उन्होंने भाजपा, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बसपा समेत सभी प्रमुख राजनीतिक दलों से वाल्मीकि समाज को टिकट और नेतृत्व में हिस्सेदारी देने की मांग की। रोहिणी ने यहां तक सवाल उठाया कि जब समुदाय की आबादी लाखों में है तो उससे मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकता।
रोहिणी की सक्रियता ऐसे समय बढ़ी है जब उत्तर प्रदेश 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है और प्रमुख दल दलित मतदाताओं, खासकर गैर-जाटव अनुसूचित जातियों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। इससे पहले रोहिणी ने उत्तर प्रदेश में करीब 200 छोटी-बड़ी बैठकों की योजना और वाल्मीकि, पासी समेत अन्य गैर-जाटव समुदायों से संवाद की बात कही थी।
इसके साथ ही नगीना सांसद और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) प्रमुख चंद्रशेखर आजाद के साथ उनका पुराना व्यक्तिगत और कानूनी विवाद भी चर्चा के केंद्र में बना हुआ है। रोहिणी ने कई गंभीर आरोप लगाए हैं, जबकि चंद्रशेखर आजाद का सार्वजनिक रुख रहा है कि वह इन आरोपों का जवाब अदालत में देंगे। दिल्ली हाई कोर्ट के रिकॉर्ड से दोनों के बीच चल रहे दीवानी मुकदमे की पुष्टि होती है। इसलिए दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप को किसी न्यायिक निष्कर्ष की तरह नहीं देखा जा सकता।
दो दिन पहले स्विट्जरलैंड से लौटीं, मेरठ से शुरू की सामाजिक बैठक
13 सितंबर को मेरठ में आयोजित एक बैठक में रोहिणी घावरी ने कहा कि वह दो दिन पहले ही स्विट्जरलैंड से भारत लौटी हैं और यह उनकी पहली सामाजिक बैठक है। कार्यक्रम एक निजी कॉलेज में आयोजित किया गया था।
उन्होंने कहा कि वाल्मीकि समाज लंबे समय से दूसरे नेताओं और राजनीतिक दलों के समर्थन में खड़ा होता आया है, लेकिन अब समाज के अपने नेतृत्व की बात होनी चाहिए।
रोहिणी ने कहा कि राजनीतिक दल जब चुनावी समर्थन चाहते हैं तो वाल्मीकि समुदाय को साथ जोड़ते हैं, लेकिन टिकट और बड़े पदों की बात आने पर उसका प्रतिनिधित्व उसी अनुपात में दिखाई नहीं देता। उनका कहना था कि अब समाज को यह सवाल खुद राजनीतिक दलों के सामने रखना होगा।
Rohini Ghavari Valmiki Politics
| मुद्दा | रोहिणी घावरी का पक्ष |
|---|---|
| वाल्मीकि समाज का राजनीतिक प्रतिनिधित्व | विधानसभा में ज्यादा भागीदारी |
| चुनावी टिकट | सभी प्रमुख दलों से वाल्मीकि उम्मीदवार उतारने की मांग |
| नेतृत्व | समुदाय को केवल वोट बैंक नहीं, नेतृत्व का अवसर मिले |
| शीर्ष पद | वाल्मीकि समाज से मुख्यमंत्री बनने की संभावना पर भी चर्चा |
| आरक्षण | आरक्षण के लाभ में समुदाय की हिस्सेदारी पर जोर |
| जमीनी अभियान | घर-घर संपर्क और सामाजिक बैठकें |
| फोकस | वाल्मीकि, पासी और दूसरे गैर-जाटव दलित समूह |
| UP Election 2027 | राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने को प्रमुख अवसर के रूप में देख रही हैं |
‘हम हमेशा दूसरों के स्वागत में क्यों खड़े रहें?’
मेरठ की बैठक में रोहिणी ने अपने राजनीतिक संदेश को काफी सीधे शब्दों में रखा। उनका तर्क था कि समुदाय वर्षों से दूसरे नेताओं के स्वागत, रैली और मतदान में अपनी भूमिका निभाता आया है, लेकिन अब यह पूछने का समय है कि नेतृत्व के पद पर उसके अपने लोगों की संख्या कितनी है।
उन्होंने राजनीतिक हिस्सेदारी की मांग को छोटा न रखने की बात भी कही। उनका तर्क था कि यदि कोई समुदाय बहुत कम प्रतिनिधित्व मांगेगा तो वास्तविक राजनीतिक भागीदारी उससे भी कम मिल सकती है।
इसी संदर्भ में उन्होंने मुख्यमंत्री पद तक की बात उठाई। रोहिणी का कहना था कि लाखों की आबादी वाले समुदाय में ऐसा नेतृत्व क्यों नहीं तैयार होना चाहिए जो प्रदेश की सर्वोच्च राजनीतिक जिम्मेदारी तक पहुंचे।
यह बयान केवल किसी एक पार्टी को निशाना बनाकर नहीं दिया गया। उन्होंने भाजपा, सपा, कांग्रेस और बसपा सभी को राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने का संदेश दिया है।
वाल्मीकि आबादी पर रोहिणी का दावा और Census का रिकॉर्ड
रोहिणी ने मेरठ में उत्तर प्रदेश में वाल्मीकि समाज की आबादी करीब 20 लाख होने की बात कही। इसे फिलहाल उनका राजनीतिक दावा या मौजूदा अनुमान समझना चाहिए।
भारत की अंतिम पूरी जनगणना 2011 में हुई थी। Census of India की आधिकारिक अनुसूचित जाति तालिकाओं में Balmiki को उत्तर प्रदेश की अलग Scheduled Caste category के रूप में दर्ज किया गया है।
यानी किसी वर्तमान आबादी के दावे और आधिकारिक Census संख्या के बीच अंतर रखना जरूरी है। 2027 की नई जनगणना पूरी होने से पहले आज की वास्तविक आबादी के लिए राजनीतिक नेताओं द्वारा दिए जाने वाले अनुमान को अंतिम सरकारी संख्या नहीं माना जा सकता।
UP विधानसभा में आरक्षित सीटों का गणित भी महत्वपूर्ण
उत्तर प्रदेश में कुल 403 विधानसभा क्षेत्र हैं। यूपी विधानसभा की आधिकारिक वेबसाइट के ऐतिहासिक आंकड़ों के मुताबिक 2017 में इनमें 86 सीटें अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित श्रेणी में थीं।
यही कारण है कि दलित समुदायों के भीतर भी टिकट वितरण और अलग-अलग अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधित्व का सवाल चुनाव के समय राजनीतिक महत्व हासिल करता है।
रोहिणी का तर्क इसी बिंदु पर केंद्रित है कि आरक्षित सीट पर उम्मीदवार होना और अलग-अलग दलित उपजातियों को वास्तविक राजनीतिक नेतृत्व मिलना दो अलग बातें हैं।
उनकी मांग है कि राजनीतिक दल टिकट वितरण के समय यह भी देखें कि कौन से समुदाय लंबे समय से प्रतिनिधित्व से वंचित रहे हैं।
पहले 200 बैठकों का प्लान बता चुकी हैं रोहिणी
रोहिणी की मौजूदा सक्रियता अचानक सामने नहीं आई है।
अप्रैल 2026 में उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होने और प्रदेशभर में करीब 200 छोटी-बड़ी बैठकें करने की योजना का जिक्र किया था। उस समय उनका मुख्य फोकस गैर-जाटव दलित समुदायों, विशेष रूप से वाल्मीकि और पासी समाज पर बताया गया था।
उनका कहना था कि इन बैठकों के जरिए सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर प्रत्यक्ष संवाद किया जाएगा।
उस समय लखनऊ को इस अभियान के प्रमुख केंद्रों में रखने और बाद में बड़ी राजनीतिक-सामाजिक रैली आयोजित करने की योजना भी सामने आई थी।
हालांकि अप्रैल में बताई गई हर प्रस्तावित बैठक या राजनीतिक योजना जमीन पर उसी स्वरूप में लागू हुई है या नहीं, इसकी अलग-अलग पुष्टि जरूरी है। फिलहाल इतना साफ है कि सितंबर में भारत वापसी के बाद उन्होंने सामाजिक बैठकों का सिलसिला शुरू कर दिया है।
दिल्ली से मेरठ, फिर लखनऊ का कार्यक्रम
भारत आने से पहले रोहिणी ने दिल्ली, गुरुग्राम, मेरठ, लखनऊ और इंदौर में लोगों से मिलने और सामाजिक कार्यक्रम करने की बात कही थी।
सार्वजनिक कार्यक्रम के मुताबिक 13 सितंबर को मेरठ और 14-15 सितंबर को लखनऊ में रहने की योजना थी।
इस लिहाज से मेरठ की बैठक उनके घोषित कार्यक्रम का पहला बड़ा राजनीतिक-सामाजिक पड़ाव बन गई है।
आने वाले दिनों में लखनऊ की गतिविधियां इसलिए और महत्वपूर्ण हो सकती हैं क्योंकि राजधानी प्रदेश की राजनीति का केंद्रीय मंच है और 2027 चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के संगठनात्मक फैसले यहीं केंद्रित रहेंगे।
क्या किसी पार्टी में शामिल होंगी रोहिणी?
यही अब सबसे महत्वपूर्ण सवालों में से एक है।
अप्रैल 2026 में आई रिपोर्टों में रोहिणी ने समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के साथ बातचीत होने का दावा किया था और गैर-जाटव दलित समुदायों के बीच सपा के लिए काम करने की रणनीति की बात कही थी।
लेकिन मेरठ की ताजा बैठक में उनका संदेश केवल समाजवादी पार्टी तक सीमित नहीं रहा।
उन्होंने BJP, SP, Congress और BSP सभी से वाल्मीकि समाज को राजनीतिक टिकट और नेतृत्व देने की मांग की। यह मौजूदा चरण में उनके रुख को किसी एक पार्टी के बजाय समुदाय आधारित प्रतिनिधित्व की मांग के रूप में पेश करता है।
इसलिए उन्हें किसी पार्टी की औपचारिक नेता या घोषित उम्मीदवार मानना अभी जल्दबाजी होगी, जब तक संबंधित दल या स्वयं रोहिणी स्पष्ट सदस्यता अथवा पद की घोषणा न करें।
कौन हैं डॉ. रोहिणी घावरी?
रोहिणी मध्य प्रदेश के इंदौर से आती हैं और वाल्मीकि परिवार से संबंध रखती हैं। उनकी मां सफाई कर्मचारी रही हैं।
उन्होंने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से विदेश व्यापार प्रबंधन में ग्रेजुएशन और बाद में मार्केटिंग में MBA किया। इसके बाद वह उच्च शिक्षा के लिए स्विट्जरलैंड गईं और बिजनेस मैनेजमेंट में डॉक्टरेट की पढ़ाई की।
उनकी शिक्षा विदेश में भारत सरकार की National Overseas Scholarship से जुड़ी रही। रिपोर्टों के मुताबिक इस योजना के तहत उन्हें उच्च शिक्षा के लिए लगभग एक करोड़ रुपये तक की वित्तीय सहायता उपलब्ध हुई।
जेनेवा में रहते हुए वह दलित और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर सक्रिय रहीं और संयुक्त राष्ट्र से जुड़े मंचों पर भी बोल चुकी हैं।
यही पृष्ठभूमि उन्हें पारंपरिक स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता से अलग प्रोफाइल देती है—एक ऐसी महिला जो सफाई कर्मचारी परिवार से निकलकर विदेश में उच्च शिक्षा तक पहुंची और अब अपने समुदाय की राजनीतिक भागीदारी का सवाल उठा रही है।
चंद्रशेखर आजाद के साथ विवाद क्या है?
रोहिणी घावरी और नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद के बीच निजी संबंधों और कथित शोषण को लेकर लंबे समय से सार्वजनिक विवाद चल रहा है।
रोहिणी ने आरोप लगाया कि दोनों के बीच निजी संबंध थे और चंद्रशेखर ने अपनी वैवाहिक स्थिति समेत कई बातें उनसे छिपाईं। ये आरोप रोहिणी के हैं और अभी किसी अंतिम न्यायिक फैसले में सिद्ध नहीं हुए हैं।
चंद्रशेखर ने सार्वजनिक रूप से आरोपों के तथ्यात्मक विवरण पर बहस करने से बचते हुए कहा था कि यह महिला के सम्मान से जुड़ा निजी मामला है और वह अपना पक्ष अदालत में रखेंगे।
इसलिए इस विवाद को रिपोर्ट करते समय दोनों पक्षों के दावों को आरोप और जवाब के रूप में ही देखना आवश्यक है।
दिल्ली हाई कोर्ट में चल रहा मामला
दोनों के बीच विवाद का एक हिस्सा दिल्ली हाई कोर्ट तक पहुंच चुका है।
दिल्ली हाई कोर्ट के आधिकारिक cause list में CS(OS) 425/2025 — Chandra Shekhar v. Rohini Ghavari and Others दर्ज है। मामला 2026 में भी न्यायालय के समक्ष सूचीबद्ध रहा।
12 फरवरी 2026 के हाई कोर्ट आदेश में अदालत ने रोहिणी पक्ष को उन पोस्टों की प्रतियां पेश करने को कहा था जिन्हें वह वैध या ‘healthy criticism’ मानता है। चंद्रशेखर के वकील को भी उन पोस्टों की प्रतियां रखने की अनुमति दी गई जिन्हें वे मानहानिकारक मानते हैं।
अदालत ने अंतरिम तौर पर रोहिणी को चंद्रशेखर के बारे में defamatory nature की नई ऑनलाइन सामग्री प्रकाशित करने से रोका था। इस आदेश को आरोपों की सच्चाई या झूठ पर अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता; यह चल रहे civil defamation case में अंतरिम निर्देश था।
कानूनी विवाद की स्थिति
| मुद्दा | स्थिति |
|---|---|
| रोहिणी के निजी संबंध/शोषण संबंधी आरोप | रोहिणी के आरोप; अंतिम न्यायिक पुष्टि नहीं |
| चंद्रशेखर का रुख | जवाब अदालत में देने की बात |
| दिल्ली हाई कोर्ट मामला | CS(OS) 425/2025 |
| मुकदमे की प्रकृति | Civil defamation proceedings |
| फरवरी 2026 आदेश | कथित defamatory सामग्री पर अंतरिम रोक |
| क्या कोर्ट ने मूल आरोप सही या गलत घोषित किए? | उपलब्ध आदेश में ऐसा अंतिम फैसला नहीं |
मेरठ में चंद्रशेखर पर क्या बोलीं रोहिणी?
भारत वापसी के बाद उनके पहले बड़े सामाजिक कार्यक्रम में मीडिया ने चंद्रशेखर विवाद को लेकर भी सवाल किया।
इस बार रोहिणी ने मामले का फैसला सड़क या मीडिया में करने के बजाय अदालत पर छोड़ने की बात कही। उन्होंने कहा कि मामला कोर्ट पहुंच चुका है और वह अगली तारीख तथा न्यायिक प्रक्रिया का इंतजार करेंगी।
यह बयान महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले महीनों में दोनों पक्षों के बीच सोशल मीडिया पर काफी तीखे आरोप-प्रत्यारोप सामने आए थे।
मेरठ में रोहिणी ने कहा कि यदि मामला अदालत में है तो निर्णय भी कोर्ट को ही करने दिया जाना चाहिए।
महिला आयोग की भूमिका पर भी उठाया सवाल
रोहिणी ने बैठक के दौरान महिला आयोग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाया।
उन्होंने दावा किया कि वह करीब एक साल से अपनी शिकायत को लेकर कोशिश कर रही हैं, लेकिन आयोग से उन्हें अपेक्षित जवाब नहीं मिला। उन्होंने पूछा कि उनकी शिकायत को गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया।
जून 2025 में उनके राष्ट्रीय महिला आयोग में शिकायत करने की खबरें भी सामने आई थीं।
यह भी रोहिणी का पक्ष है। किसी आयोग ने शिकायत पर क्या अंतिम निर्णय लिया या मौजूदा स्थिति क्या है, इसके लिए आयोग का औपचारिक रिकॉर्ड निर्णायक होगा।
क्या UP की दलित राजनीति में जाटव बनाम गैर-जाटव नई लाइन बन रही?
रोहिणी की राजनीतिक सक्रियता का बड़ा संदर्भ उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति है।
प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की राजनीति लंबे समय तक जाटव समेत व्यापक दलित गठजोड़ पर आधारित रही है। हाल के वर्षों में भाजपा, सपा और आजाद समाज पार्टी भी विभिन्न दलित समूहों के बीच समर्थन बढ़ाने की कोशिश करती रही हैं।
रोहिणी खास तौर पर वाल्मीकि, पासी और अन्य गैर-जाटव समुदायों की भागीदारी का मुद्दा उठा रही हैं। अप्रैल के उनके बयानों में कोरी, धोबी, खटिक, धानुक और दूसरे समुदायों को साथ लाने का भी जिक्र हुआ था।
ऐसे में राजनीतिक बहस का सवाल यह है कि क्या 2027 में दलित वोट एक व्यापक पहचान के रूप में व्यवहार करेगा या अलग-अलग उपजातियों के प्रतिनिधित्व का मुद्दा ज्यादा प्रमुख होगा।
हालांकि किसी भी समुदाय के मतदाताओं को एक समान राजनीतिक ब्लॉक मान लेना उचित नहीं होगा। मतदान व्यवहार पर क्षेत्र, उम्मीदवार, पार्टी, सामाजिक गठबंधन और स्थानीय मुद्दों का भी प्रभाव पड़ता है।
चंद्रशेखर के लिए राजनीतिक चुनौती कितनी?
चंद्रशेखर आजाद नगीना से लोकसभा सांसद हैं और पिछले कुछ वर्षों में दलित युवाओं के बीच एक प्रमुख राजनीतिक चेहरा बनकर उभरे हैं।
रोहिणी की रणनीति सीधे तौर पर उस राजनीतिक क्षेत्र को छूती है जिसमें चंद्रशेखर अपनी पकड़ बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि रोहिणी की सक्रियता चंद्रशेखर के वोट बैंक को निर्णायक नुकसान पहुंचाएगी।
उनके पास फिलहाल कोई बड़ा स्थापित पार्टी संगठन या चुनावी जीत का रिकॉर्ड नहीं है। दूसरी ओर, चंद्रशेखर के पास संसद सदस्यता, आजाद समाज पार्टी और भीम आर्मी से जुड़ा संगठनात्मक नेटवर्क मौजूद है।
इसलिए राजनीतिक प्रभाव का वास्तविक आकलन तभी हो सकेगा जब रोहिणी अपनी प्रस्तावित बैठकों को कितने जिलों तक ले जाती हैं, किसी राजनीतिक दल से औपचारिक रूप से जुड़ती हैं या नहीं और वाल्मीकि व दूसरे गैर-जाटव समुदायों में उन्हें कितना समर्थन मिलता है।
क्यों अहम है ‘वोट बैंक नहीं, नेतृत्व’ का नारा?
रोहिणी का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश किसी व्यक्तिगत विवाद से अलग है—“वाल्मीकि समाज को वोट बैंक नहीं, नेतृत्व का मौका मिले।”
यही लाइन उनकी आगे की राजनीतिक पहचान का आधार बन सकती है।
अगर वह आने वाले महीनों में व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर शिक्षा, रोजगार, सफाई कर्मचारियों की स्थिति, आरक्षण, राजनीतिक टिकट और स्थानीय नेतृत्व जैसे मुद्दों पर अभियान खड़ा करती हैं, तो उनकी राजनीतिक भूमिका अलग दिशा ले सकती है।
दूसरी ओर, यदि पूरा अभियान चंद्रशेखर आजाद विरोध तक सीमित रहता है तो उनके लिए स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाना मुश्किल हो सकता है।
मेरठ में उनका ताजा भाषण इस दृष्टि से बदलाव का संकेत देता है, क्योंकि इसमें चंद्रशेखर विवाद से कहीं ज्यादा समय वाल्मीकि समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी को दिया गया।
2027 चुनाव से पहले बढ़ सकती है गैर-जाटव राजनीति की अहमियत
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दल सामाजिक समीकरणों पर काम शुरू कर चुके हैं।
राज्य की 403 सदस्यीय विधानसभा और बड़ी संख्या में आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के कारण अनुसूचित जातियों की राजनीतिक भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यूपी विधानसभा के आधिकारिक आंकड़े 2017 के चुनावी ढांचे में 86 SC/ST आरक्षित सीटें दर्ज करते हैं।
ऐसे में टिकट वितरण, जातीय प्रतिनिधित्व और नेतृत्व का प्रश्न अगले चुनाव में कई दलों के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।
रोहिणी इसी राजनीतिक खाली जगह को पहचानते हुए वाल्मीकि समाज को अपनी अलग राजनीतिक आवाज विकसित करने की बात कर रही हैं।
अब नजर लखनऊ पर
स्विट्जरलैंड से भारत लौटने के बाद मेरठ की बैठक ने रोहिणी घावरी की भविष्य की रणनीति की पहली स्पष्ट झलक दे दी है।
उन्होंने वाल्मीकि समाज को विधानसभा में टिकट, सरकार में नेतृत्व और यहां तक कि मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने की महत्वाकांक्षा रखने का संदेश दिया है। साथ ही भाजपा, सपा, कांग्रेस और बसपा—सभी के सामने प्रतिनिधित्व का सवाल रखा है।
उनके घोषित कार्यक्रम के मुताबिक मेरठ के बाद 14 और 15 सितंबर को लखनऊ उनकी गतिविधियों का अगला केंद्र है।
लखनऊ में वह किन राजनीतिक और सामाजिक चेहरों से मिलती हैं, क्या किसी दल के साथ औपचारिक राजनीतिक रास्ता चुनती हैं और 200 बैठकों के पुराने प्लान को किस स्वरूप में आगे बढ़ाती हैं—इन सवालों पर नजर रहेगी।
फिलहाल दो समानांतर कहानियां उनके साथ चल रही हैं। एक तरफ चंद्रशेखर आजाद के साथ व्यक्तिगत और कानूनी विवाद अदालत में है, जहां दोनों पक्षों की स्थिति न्यायिक प्रक्रिया से तय होगी। दूसरी तरफ रोहिणी खुद को उस विवाद से आगे बढ़ाकर वाल्मीकि और गैर-जाटव दलितों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की आवाज के रूप में स्थापित करने की कोशिश करती दिखाई दे रही हैं।
2027 के चुनाव तक यह अभियान वास्तविक राजनीतिक ताकत में बदलता है या केवल चर्चित सामाजिक मुहिम बना रहता है, इसका फैसला आने वाले महीनों की जमीनी सक्रियता करेगी।
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