नागपुर रेलवे स्टेशन पर यात्रियों के लिए नर्क जैसे हालात: अतिक्रमण, ऑटो चालकों की दबंगई से जनता त्रस्त
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Written By:
अंकिता पटेल
Updated On: Jul 27, 2026 | 02:50 PM IST
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सार
Railway Station Encroachment: नागपुर रेलवे स्टेशन के पूर्वी व पश्चिमी प्रवेश मार्ग अतिक्रमण से ट्रैफिक जाम से जूझ रहे हैं। यात्रियों को सामान के साथ सड़क पर जान जोखिम में डालकर चलना पड़ रहा है।

नागपुर रेलवे स्टेशन, अतिक्रमण, ट्रैफिक जाम,(सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
विस्तार
Nagpur Station Traffic Chaos: नागपुर रेलवे स्टेशन के पूर्वी या पश्चिमी छोर एंट्री-एग्जिट की हालत अब नर्क से भी बदतर नजर आने लगी है। अतिक्रमण, फुटपाथ पर कब्जे, बेतरतीब वाहन, ऑटो चालकों की मनमानी और हर समय रेंगता ट्रैफिक यात्रियों के लिए मुसीबत बन चुका है।
सड़क है या अतिक्रमण का अड्डा ?
स्टेशन पर टेकड़ी रोड की बात करें या बजरिया की और स्टेशन रोड की। हालत बद से बदतर हो चुकी है। हाथ में बैग, कंधे पर सामान और साथ में महिलाओं, बच्चे-बुजुर्ग लेकर निकलने वाले यात्रियों को वाहनों के बीच से रास्ता बनाना पड़ता है।
फुटपाथ का इस्तेमाल पैदल चलने के बजाय ठेले लगाने और दुकानें चलाने के लिए किया जा रहा है। दोनों सड़कें अतिक्रमण और बेतरतीब पार्किंग के कारण सिकुड़ गई हैं। यात्री सड़क पर चले तो वाहन का खतरा और किनारे चलें तो अतिक्रमण की बाधा, आखिर जाएं तो जाएं कहां?
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मेट्रो शहरों से आने वालों को क्या दिखता होगा?
स्टेशन पर देश के बड़े शहरों मुंबई, दिल्ली, पुणे, हैदराबाद, बेंगलुरु जैसे मेट्रो शहरों से रोजाना यात्री आते-जाते हैं, ट्रेन से उतरकर जब वे बाहर निकलते हैं और उन्हें अतिक्रमण से घिरीं सड़कें, बेतरतीब वाहन, जाम और ऑटो चालकों की मनमानी दिखाई देती है तो नागपुर शहर की पहली छवि उनके मन में कैसी बनती होगी, यह समझना मुश्किल नहीं है।
एक तरफ शहर को आधुनिक, विकसित और मेट्रो शहरों की कतार में खड़ा करने के दावे किए जाते हैं, दूसरी तरफ शहर के सबसे महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार पर यात्रियों को अव्यवस्था से जूझना पड़ता है। नागपुर की पहचान का पहला परिचय यदि जाम और अतिक्रमण से हो तो करोड़ों की परियोजनाओं की चमक कितनी देर टिकेगी?
जिम्मेदार कौन : रेलवे, ट्रैफिक पुलिस या प्रशासन ?
सवाल सीधा है, अतिक्रमण हटाने की जिम्मेदारी किसकी है? ऑटो की मनमानी रोकने की जिम्मेदारी किसकी है? सड़क पर ट्रैफिक व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी किसकी है? मनपा, यातायात पुलिस, आरटीओ और अन्य संबंधित एजेंसियां यदि अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं तो फिर स्टेशन के दोनों बाहरी हिस्सों में यह बदहाली क्यों दिखाई दे रही है?
कई ट्रैफिक डीसीपी आए और गए लेकिन स्टेशन के सामने ट्रैफिक व्यवस्था नहीं सुधर सकी। वहीं दबी जुबान में आरोप लगते रहे हैं कि रेलवे प्रशासन ट्रैफिक पुलिस के सुझावों को तवज्जो नहीं देता। इन आरोपों के बीच जरूरी है कि सभी संबंधित एजेंसियां आपसी समन्वय से स्टेशन तक पहुंचने और वहां से बाहर निकलने का रास्ता हमेशा व्यवस्थित रखें।
ऑटो चालक ही तय करते हैं ‘रेट’ और नियम !
- यात्रियों को घेरते ऑटो चालक दूसरी बड़ी समस्या है। मनमाना किराया, पसंद की सवारी के लिए इंतजार और सड़क पर जहां जगह मिली वहीं ऑटो खड़ा कर देना आम परेशानी बन गई है।
- ऐसे में सामान के साथ खड़े यात्री के सामने अक्सर ‘जो किराया बताया है, दो और निकली’ जैसी स्थिति बन जाती है।
- ऑटो को सड़क किनारे खड़ा करने के बजाय इस तरह रोक दिया जाता है कि पीछे वाहनों की कतार लग जाती है।
- एक ऑटो के रुकने से शुरू हुई परेशानी देखते ही देखते ट्रैफिक जाम में बदल जाती है।
यानी यात्री को स्टेशन से बाहर निकलते ही सुविधा नहीं, सौदेबाजी और जाम का स्वागत मिलता है। - बारिश में यह परेशानी कई गुना बढ़ जाती है। सड़क पर पानी जमा हो, आसपास अतिक्रमण हो और उसी बीच वाहनों की भीड़ हो तो पैदल यात्री के लिए निकलना किसी जोखिम भरे खेल से कम नहीं।
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- पिछले करीब 4 वर्षों से 479.77 करोड़ रुपये की लागत से पुनर्विकास कार्य जारी है। इसका उद्देश्य स्टेशन को आधुनिक सुविधाओं से लैस कर यात्रियों को बेहतर अनुभव देना है लेकिन स्टेशन के बाहर की मौजूदा स्थिति को देखकर यह पूरा निवेश भी कहीं न कहीं व्यर्थ नजर आ रहा है।
- करोड़ों रुपये खर्च कर स्टेशन को आधुनिक बनाया जाए और बाहर निकलते ही यात्री अतिक्रमण, जाम, अव्यवस्थित ट्रैफिक और ऑटो चालकों की मनमानी में फंस जाए तो विकास का असली लाभआखिर किसे मिलेगा?
