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मौत की सजा नहीं रहा फेफड़ों का कैंसर: मरीज की स्थिति के आधार पर बनी वैक्सीन; ट्यूमर को जड़ से खत्म कर देगी

October 23, 2026

सार

फेफड़ों के कैंसर के इलाज में टारगेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी और पर्सनलाइज्ड कैंसर वैक्सीन से नई उम्मीद जगी है। मरीज के ट्यूमर के डीएनए की जांच के आधार पर इलाज चुनने से कैंसर कोशिकाओं को निशाना बनाना आसान हो रहा है। वैक्सीन पर शोध का मकसद इम्यून सिस्टम को बची हुई कैंसर कोशिकाओं की पहचान कर उन पर हमला करने के लिए प्रशिक्षित करना है।

Lung Cancer Is No Longer a Death Sentence? Personalized Vaccines and Advanced Therapies Offer New Hope

लंग्स कैंसर का खतरा - फोटो : Amarujala.com/AI

विस्तार

दुनियाभर में हाल ही में उस समय चिंता की लहर दौड़ गई जब पोप लियो को फेफड़ों का कैंसर होने की पुष्टि हुई। लेकिन कुछ ही दिन बाद आई खबर ने चिकित्सा विज्ञान की उस नई ताकत का अहसास कराया जिसने पूरे परिदृश्य को बदलकर रख दिया है। पोप की सर्जरी सफल रही, ट्यूमर पूरी तरह निकाल दिया गया और अब उन्हें आगे किसी अतिरिक्त इलाज की आवश्यकता नहीं है।

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जाहिर है, यह खबर काफी उम्मीदें भी जगाती है। कुछ दशक पहले तक यही माना जाता कि फेफड़ों के कैंसर होने का मतलब है-मौत की सजा। इससे बचाव की संभावना नहीं के बराबर ही मानी जाती थीं। वैसे तो कैंसर आज भी एक गंभीर चुनौती बना हुआ है और दुनियाभर में औसतन 5 में से 1 व्यक्ति (विकसित देशों में 2 में एक) इसका शिकार बनता है। लेकिन एडवांस्ड स्क्रीन तकनीक, मरीज की स्थिति के आधार पर टारगेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी जैसी नई चिकित्सा पद्धतियों ने कैंसर से होने वाली मौतों की दर को काफी हद तक कम कर दिया है।

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अब शोधकर्ता पर्सनलाइज्ड कैंसर वैक्सीन पर काम कर रहे हैं। इसे सर्जरी के बाद मरीज के शरीर में बची-खुची कैंसर कोशिकाओं को पहचानकर उन पर हमला करने के लिए इम्यून सिस्टम को ट्रेनिंग देने के लिए तैयार किया जा रहा है। मेलानोमा पर इसके पहले बड़े ट्रायल के नतीजे बेहद उत्साहजनक रहे हैं।

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पर्सनलाइज्ड थेरेपी से इलाज में महाक्रांति

  • डॉक्टर अब मरीज के व्यक्तिगत ट्यूमर का डीएनए सीक्वेंस तैयार करते हैं। इससे सटीक म्यूटेशन का पता चलता है और सिर्फ वही दवा दी जाती है जिसकी जरूरत है। इससे मरीज बेवजह कीमोथेरेपी से दुष्प्रभावों से बच जाता है।
  • वैज्ञानिकों ने हमारे शरीर के अपने इम्यून सिस्टम को ही कैंसर से लड़ने का हथियार बना दिया है। नई दवाएं प्रतिरक्षा कोशिकाओं पर लगे प्राकृतिक बाधाओं को हटा देती हैं, जिससे शरीर खुद कैंसर सेल्स को पहचानकर  उन्हें खत्म कर देता है।
  • एक समय कैंसर वैक्सीन को केवल काल्पनिक विचार माना जाता था। लेकिन अब यह एक हकीकत बन चुकी है और वो दिन दूर नहीं जब बड़े पैमाने पर मरीजों को इसका लाभ मिलने लगेगा।

दो दशक में बदली सूरत

  • 15% ही होती थी पहले फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित व्यक्ति के पांच वर्ष जीने की संभावना, अब यह 30%
  • 10-12 साल तक सामान्य जीवन जी रहे चौथे स्टेज के मरीज, पहले सिर्फ 1-2 साल ही जी पाते थे।