जंगल की राह से शिक्षा और यूट्यूब वीडियो तक का सफर
October 9, 2026 31 बार देखा गया
बबिता ने जंगल से पढ़ाई तक एक छोटी सी सफर को तय किया है। ये छोटी से सफर बबिता के लिए जीवन भर का याद बन गया है। जिसे उसने एक अनुभव के रूप में अपने लिखा है। एक छोटे से गांव से यूट्यूब में बनाने तक का सफर इस अनुभव में शामिल है।

बबिता का सफर (फोटो साभार: बबिता)
जंगल से शहर तक का मेरा सफर खट्टा-मीठा और मेरा रास्ता यादगार रहा। बताती हुं कैसे? मेरा बचपन मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के छोटे से गांव अमझिरिया में बीता। हमारा गांव जंगल के करीब था और जंगल हमारे जीवन से अलग कोई जगह नहीं थी। वह हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा था।
मुझे आज भी अपनी दादी के साथ जंगल जाना याद है। हम महुआ बीनने जाते थे। जंगल में घूमते हुए महुआ इकट्ठा करना मेरे बचपन की यादों का एक हिस्सा है। हमारे गांव के बहुत से लोगों की जिंदगी भी जंगल से जुड़ी हुई है। लोग महुआ, तेंदूपत्ता, चिरौंजी और दूसरी वन उपज इकट्ठा करते हैं। इनसे मिलने वाली आमदनी कई परिवारों के लिए जरूरी होती है।
लेकिन जंगल से जुड़ी मेरी सबसे गहरी याद कुछ और है।
जब मैं छोटी थी तो एक बार जंगल में रास्ता भटक गई थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि घर किस तरफ है। मैं डर गई थी। उस समय एक लकड़हारे ने मुझे देखा और मुझे सुरक्षित घर तक पहुंचाया। आज इतने साल बाद भी वह घटना मुझे याद है। उस दिन जंगल मेरे लिए सिर्फ पेड़-पौधों और रास्तों की जगह नहीं रहा। वह मेरी जिंदगी की एक ऐसी याद बन गया, जिसे मैं आज भी अपने साथ लेकर चलती हूं।
गांव में पढ़ाई की और आगे बढ़ने की कोशिश भी
इसी गांव और जंगल के बीच मैंने पढ़ाई शुरू की। कक्षा एक से आठ तक की पढ़ाई मैंने अमझिरिया में ही की। आगे पढ़ने के लिए मुझे पन्ना जाना पड़ा। गांव से बाहर जाकर पढ़ाई करना मेरे लिए एक नया अनुभव था। रास्ता आसान नहीं था, लेकिन मैंने पढ़ाई जारी रखी।
मेरे लिए ये सिर्फ स्कूल जाने तक की बात नहीं थी। गांव से बाहर जाकर आगे पढ़ना अपने आप में एक अलग कदम था। आसपास के माहौल में रहते हुए पढ़ाई जारी रखना और अपने लिए आगे का रास्ता बनाना आसान नहीं था। फिर भी मैने पढ़ाई नहीं छोड़ी।
दसवीं में मुझे 84 प्रतिशत अंक मिले और बारहवीं में 81 प्रतिशत। मैं अपने गांव की पहली लड़की थी जिसने पढ़ाई में अच्छे अंक हासिल किए और अपने परिवार में बारहवीं तक पढ़ने वाली पहली लड़की भी बनी। जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है कि पढ़ाई ने मेरे सामने एक नई दुनिया खोली। मुझे यह भरोसा मिला कि गांव में रहते हुए भी मैं अपने लिए कुछ अलग सोच सकती हूं और अपने सपनों को लेकर आगे बढ़ सकती हूं।
जैसे-जैसे मैं पढ़ाई के लिए बाहर निकली वैसे-वैसे अपने गांव और जंगल से जुड़े जीवन को भी एक अलग नजर से देखने लगी।
जंगल से हुई अपने बात कहनी की शुरुआत
जंगल और पढ़ाई मेरे जीवन के दो अलग हिस्से नहीं रहे। जंगल ने मुझे अपने आसपास की जिंदगी को करीब से देखने का मौका दिया। मैंने देखा कि गांव के लोगों का जीवन जंगल से कितना जुड़ा हुआ है। महुआ बीनना हो या दूसरी वन उपज इकट्ठा करना, जंगल लोगों के लिए सिर्फ प्रकृति नहीं, बल्कि जीवन और आजीविका का हिस्सा है।
शायद इसी आसपास को देखने और समझने की आदत ने मुझे अपनी बात कहने की ओर भी बढ़ाया।
बाद में मैंने YouTube पर वीडियो बनाना शुरू किया। शुरुआत में मेरे पास बहुत ज्यादा साधन नहीं तो थे लेकिन मेरे पास जो उपलब्ध था उसी से शुरुआत की। मैं शिक्षा, समाज, प्रेरणा और अपने आसपास के मुद्दों पर वीडियो बनाती हूं। जिसे YouTube पर अपलोड करती हूं।

यूट्यूब के लिए वीडियो बनाते हुए बबिता (फोटो साभार: बबिता)
गांव में रहते हुए मैने अपने आसपास की बहुत से चीजों को करीब से देखा है। पढ़ाई के दौरान मुझे गांव की बाहर की दुनिया को समझने का मौका मिला। शायद इसी वजह से मुझे लगा कि जो बातें मैं देखती और समझती हूं, उन्हें अपने तरीके से दूसरों तक भी पहुँचाना चाहिए।
आज कैमरे के सामने बोलना मेरे लिए सिर्फ वीडियो बनाने का काम नहीं है। यह अपनी बात कहने और अपने आसपास की चीज़ों को दूसरों तक पहुंचाने का एक तरीका है।
जंगल से कैमरे के सामने तक
कभी मैं अमझिरिया के जंगल में दादी के साथ महुआ बीनने जाती थी। कभी उसी जंगल में रास्ता भटक गई थी और एक अनजान व्यक्ति ने मुझे घर पहुंचाया था। फिर उसी गांव से निकलकर मैंने पढ़ाई की और आज अपनी बात कैमरे के सामने रखती हूं।
जब मैं अपनी इस यात्रा को देखती हूं तो मुझे लगता है कि मेरी कहानी में जंगल, शिक्षा और मेरी आवाज़ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
जंगल ने मुझे मेरी जड़ों से जोड़ा। शिक्षा ने मुझे आगे बढ़ने का रास्ता दिया। आज अपनी आवाज़ के माध्यम से मैं अपने आसपास की दुनिया को देखने और उसकी कहानियां दूसरों तक पहुंचाने की कोशिश कर रही हूं।
मेरी यात्रा अमझिरिया के उस जंगल से शुरू हुई थी। शायद मेरी आवाज़ की जड़ें भी वहीं कहीं हैं।
चम्बल एकेडमी फेलो – बबिता/ लेखन
एडिट – रचना
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