बाल टीकाकरण दर में मामूली वृद्धि, मगर लाखों अब भी असुरक्षित
WHO-UNICEF के राष्ट्रीय टीकाकरण कवरेज के वार्षिक अनुमान के अनुसार, पिछले वर्ष दुनियाभर में 90 प्रतिशत शिशुओं को डिप्थीरिया, टेटनस और काली खाँसी (DTP) के टीके की कम से कम एक ख़ुराक मिली. वहीं 85 प्रतिशत शिशुओं को इसकी सभी तीन अनुशंसित ख़ुराकें मिलीं.
दोनों दरों में 2024 की तुलना में एक प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई, मगर वैश्विक टीकाकरण कवरेज अब भी महामारी से पहले के स्तर से नीचे है.
जीवनरक्षक टीकों से वंचित बच्चे
अनुमान है कि 2025 में 1 करोड़ 35 लाख बच्चों को जीवन के पहले वर्ष में एक भी टीका नहीं मिला. हालाँकि पिछले वर्ष की तुलना में ऐसे ‘शून्य-ख़ुराक’बच्चों की संख्या लगभग 7 लाख 50 हज़ार घटी है, मगर लाखों बच्चे अब भी स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच से बाहर हैं.
इसके साथ ही, टीकाकरण शुरू करने के बावजूद सभी आवश्यक ख़ुराकें न ले पाने वाले बच्चों की संख्या बढ़ रही है, जिससे बीमारियों के प्रकोप का ख़तरा भी बढ़ गया है.
UNICEF की कार्यकारी निदेशक कैथरीन रसैल ने कहा, “सरकारों और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रयासों से कोविड-19 महामारी के दौरान आई बड़ी गिरावट के बाद वैश्विक टीकाकरण दर में फिर सुधार हुआ है.”
उन्होंने कहा, “लेकिन हिंसक टकराव, विस्थापन और निर्धनता के कारण लाखों संवेदनशील बच्चे अब भी टीकों से मिलने वाली सुरक्षा से वंचित हैं. हमें हर बच्चे तक पहुँचना होगा और जहाँ टीकों पर भरोसा कमज़ोर हो रहा है, वहाँ उसे फिर मज़बूत करना होगा.”
ख़सरे का प्रकोप जारी
रिपोर्ट में दुनिया की सबसे संक्रामक बीमारियों में शामिल ख़सरे को लेकर बढ़ती चिन्ता जताई गई है.
2025 में दुनियाभर में 84 प्रतिशत बच्चों को ख़सरे के टीके की पहली और 77 प्रतिशत को दूसरी ख़ुराक मिली. यह प्रकोपों को रोकने के लिए ज़रूरी 95 प्रतिशत कवरेज से काफ़ी कम है.
इसके परिणामस्वरूप, पिछले वर्ष 57 देशों में ख़सरे के बड़े या गम्भीर प्रकोप दर्ज किए गए.
हिंसक टकराव और टीकों पर अविश्वास से बढ़ती खाई
एक भी टीका न पाने वाले (zero-dose) आधे से अधिक बच्चे संकटग्रस्त या युद्ध प्रभावित देशों में रहते हैं. इन देशों में असुरक्षा, राजनैतिक अस्थिरता और धन की कमी के कारण टीकाकरण कार्यक्रम अक्सर बाधित होते हैं.
2025 में सीरिया में टीकाकरण कवरेज तेज़ी से घटा, जबकि सूडान में दुनिया के सबसे बड़े सुधारों में से एक दर्ज किया गया. इससे स्पष्ट है कि हिंसक टकराव वाले क्षेत्रों में भी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बढ़ने पर टीकाकरण दर में सुधार हो सकता है.
WHO ने यह भी कहा है कि आसानी से टीके उपलब्ध होने के बावजूद कुछ मध्यम और उच्च आय वाले देशों में टीकाकरण दर घट रही है. इसके प्रमुख कारण, टीकों को लेकर झिझक, कमज़ोर पड़ती राजनैतिक प्रतिबद्धता और स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ी अन्य चुनौतियाँ हैं.
वित्तीय सहायता में कटौती पर चिन्ता
WHO के महानिदेशक डॉक्टर टैड्रॉस ऐडहेनॉम घेबरेयेसस ने टीकों को जनस्वास्थ्य के सबसे प्रभावी और न्यायसंगत उपायों में से एक बताया.
उन्होंने कहा, “हर बच्चा, चाहे उसका जन्म समृद्धि में हुआ हो या निर्धनता में, शान्ति के माहौल में या युद्ध के बीच, टीकों से मिलने वाली जीवनरक्षक सुरक्षा का हक़दार है.”
WHO और UNICEF ने कहा कि अन्तरराष्ट्रीय स्वास्थ्य सहायता में वित्तीय कटौती से टीकाकरण में अब तक हुई प्रगति को झटका लग सकता है.
2025 में कम देशों ने राष्ट्रीय टीकाकरण सर्वेक्षण किए. इससे टीकों से वंचित बच्चों की पहचान और नए प्रकोपों पर तेज़ी से कार्रवाई करना कठिन हो गया.
दोनों एजेंसियों ने सरकारों और अन्तरराष्ट्रीय साझीदारों से संकटग्रस्त क्षेत्रों में टीकाकरण कार्यक्रम मज़बूत करने, ग़लत जानकारी का मुक़ाबला करने, वित्तीय सहायता बढ़ाने तथा बीमारियों की निगरानी प्रणालियों में अधिक निवेश करने का आग्रह किया, ताकि अब तक हुई प्रगति व्यर्थ न हो जाए.