
आपका सांसद आखिर करता क्या है?
हर साल बारिश आती है. आपकी गली पानी से भर जाती है. पानी घर के दरवाजे तक पहुंच जाता है. आप परेशान होकर कह देते हैं, ‘हमारा सांसद आखिर कर क्या रहा है? ऐसा कहना बिल्कुल स्वाभाविक है. लेकिन हो सकता है, आपका गुस्सा सही समस्या पर हो और सवाल गलत दफ्तर से पूछा जा रहा हो. सांसद, यानी Member of Parliament, को आपकी गली की नाली या सड़क ठीक कराने के लिए नहीं चुना जाता. यह काम आम तौर पर नगर निगम या पंचायत का होता है, जिनके बारे में हमने पिछले दो लेखों में बात की. सांसद का असली संवैधानिक काम इससे एक स्तर ऊपर है. उसका काम पूरे देश के स्तर पर होता है.
तो सांसद आखिर करता क्या है?
सबसे बड़ा काम है कानून बनाना. भारत में जो भी विधेयक कानून बनता है, उसे संसद से होकर गुजरना पड़ता है. सांसद उस पर बहस करते हैं, सवाल पूछते हैं और वोट देते है. कुछ दिन पहले हमने देखा था कि एक संविधान संशोधन को ज्यादा वोट मिलने के बावजूद वह पास नहीं हो पाया था. उस समय जो वोट पड़े थे, वे सांसदों ने ही डाले थे. यही उनके काम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.
सांसद सरकार से सीधे सवाल भी पूछते हैं. हर दिन जब संसद चलती है, तो Question Hour यानी प्रश्नकाल होता है. इसमें सांसद मंत्रियों से सीधे और खास सवाल पूछ सकते हैं. ये सवाल रिकॉर्ड में आते हैं और उनके जवाब पूरे देश के सामने होते हैं. इसके बाद Zero Hour यानी शून्यकाल आता है. इसमें सांसद ऐसे जरूरी स्थानीय या राष्ट्रीय मुद्दे उठा सकते हैं जो उस दिन की आधिकारिक सूची में पहले से शामिल नहीं थे.
यहीं सांसद अपने क्षेत्र की आवाज को सच में दिल्ली तक पहुंचाता है. वह खुद आपकी गली का गड्ढा नहीं भरता, लेकिन वह यह जरूर सुनिश्चित कर सकता है कि आपके इलाके की समस्या दिल्ली में बैठे मंत्री तक पहुंचे.
सरकार के काम की गंभीर जांच
सांसद के काम का एक शांत हिस्सा भी है. सांसद Parliamentary Committees यानी संसदीय समितियों में बैठते हैं. ये छोटी-छोटी समितियां होती हैं, जो किसी कानून या किसी मंत्रालय के बजट को बहुत ध्यान से देखती हैं. लाइन दर लाइन. कई बार उस समय, जब देश के ज्यादातर लोगों को उस विषय के बारे में पता भी नहीं होता. सरकार के काम की बहुत सी गंभीर जांच इन्हीं समितियों में होती है. वहां कैमरे नहीं होते. शाम की खबरों में दिखने वाले भाषण भी नहीं होते. फिर भी सरकार के काम को ध्यान से देखने का बड़ा हिस्सा वहीं होता है.
हर साल 5 करोड़ रुपये का फंड
अब सांसद के काम की एक ऐसी बात है, जिसे बहुत से लोग पूरी तरह नहीं जानते. हर सांसद को अपने क्षेत्र के स्थानीय विकास के लिए हर साल 5 करोड़ रुपये MPLADS नाम की व्यवस्था के तहत मिलते हैं. लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात है. वह पैसा सांसद के हाथ में नहीं आता. सांसद केवल यह सिफारिश कर सकता है कि पैसा कहां लगाया जाए. यहां सड़क बने, वहां स्कूल की इमारत बने, कहीं पीने के पानी की व्यवस्था हो.
इसके बाद स्थानीय जिला प्रशासन उस काम को मंजूरी देता है और उसे पूरा करवाता है. इसलिए जब कोई सांसद अपने क्षेत्र की किसी स्थानीय समस्या को ठीक करवाना चाहता है, तब भी उसकी भूमिका सिफारिश करने की होती है, खुद काम बनाने की नहीं.
यहीं से एक अजीब लेकिन आम स्थिति पैदा होती है. मतदाता सोचता है कि उसकी गली आज भी हर बारिश में डूब रही है, इसलिए उसका सांसद उसकी बात नहीं सुन रहा. दूसरी तरफ सांसद को लगता है कि उसे ऐसी चीज के लिए दोष दिया जा रहा है, जिसे बनाने या संभालने की जिम्मेदारी उसके पास कभी थी ही नहीं. और हो सकता है, दोनों एक ही समय पर अपनी-अपनी जगह सही बात कह रहे हों.
सांसदों को अपने काम का हिसाब देने की जरूरत
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि सांसदों को अपने काम का हिसाब देने की जरूरत नहीं है. कुछ सांसद नियमित रूप से संसद में आते हैं, अच्छे और जरूरी सवाल पूछते हैं, समितियों में गंभीरता से काम करते हैं और अपने क्षेत्र के लिए उपलब्ध MPLADS का सही इस्तेमाल करवाते हैं. कुछ सांसद बहुत कम संसद आते हैं. दोनों के बीच फर्क सच में मौजूद है और इसे देखा भी जा सकता है.
सांसद का काम, या नगर निगम या पंचायत का?
PRS Legislative Research जैसी स्वतंत्र संस्थाएं हर सांसद के काम का रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से रखती हैं. कितने दिन वे संसद में आए. कितने सवाल पूछे. कितनी बहसों में बोले. उनके क्षेत्र के MPLADS के कितने पैसे इस्तेमाल हुए. इन सब जानकारियों के लिए किसी खास पहचान या अंदर की जानकारी की जरूरत नहीं है. यह जानकारी सार्वजनिक है. जो व्यक्ति जानना चाहता है, वह इसे देख सकता है. इसलिए अगली बार जब आपकी गली बारिश में डूब जाए और आपका गुस्सा सांसद की तरफ जाए, तो एक गुस्से वाले सवाल की जगह दो अलग सवाल पूछिए.
क्या यह मेरे सांसद का काम है, या नगर निगम या पंचायत का? और उसके बाद दूसरा सवाल पूछिए. जिस कार्यालय का यह काम है, क्या वहां का जिम्मेदार व्यक्ति अपना काम ठीक से कर रहा है? दो अलग सवाल. दो अलग जिम्मेदार लोग. जब हम दोनों को एक समझ लेते हैं, तो केवल गलत व्यक्ति पर दोष नहीं जाता. असली जिम्मेदार कार्यालय भी चुपचाप अपनी जिम्मेदारी से बच जाता है.

संतोष नायर
संतोष नायर TV9 के एडिटर, नेटवर्क कोऑर्डिनेशन (MD Office) हैं. मीडिया में दो दशकों से ज्यादा का अनुभव रखने वाले संतोष नायर ने देश के कुछ बेहतरीन न्यूज़रूम में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं. वह एक उत्साही पाठक हैं जो विषय वस्तु में गहराई से उतरकर अपने विचार लिखते हैं.
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