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श्रिया सरन की अलग पहल की कहानी
एक्ट्रेस श्रिया सरन जल्द ही अजय देवगन के साथ फिल्म ‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ में नजर आएंगी। फिल्म 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती के मौके पर रिलीज होने वाली है। लेकिन हाल ही में गोवा में फिल्म के ट्रेलर लॉन्च के दौरान हुई बातचीत में श्रिया की जिंदगी से जुड़ी एक ऐसी पहल सामने आई, जो उनकी एक्टिंग से बिल्कुल अलग है।
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2011 में खोला था ‘श्री स्पा’
श्रिया सरन ने बताया कि उन्होंने साल 2011 में लोखंडवाला में ‘श्री स्पा’ नाम से एक स्पा शुरू किया था। इस पहल की खास बात यह थी कि यहां नेत्रहीन और कम दृष्टि वाले लोगों को प्रशिक्षित करके थेरेपिस्ट और मसाजर के तौर पर रोजगार दिया जाता था। हालांकि, महामारी के बाद यह स्पा बंद हो गया।
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नेत्रहीन बच्चों को देखकर आया आइडिया
श्रिया ने बताया कि दिल्ली के उस स्कूल में वह काफी समय बिताती थीं, जो उनके अपने स्कूल डीपीएस मथुरा रोड के सामने था। वहां वह नेत्रहीन बच्चों को क्रिकेट खेलते देखा करती थीं। वक्त के साथ उन्हें और उनकी मां नीरजा को महसूस हुआ कि भारत में दृष्टिबाधित लोगों के लिए रोजगार के अवसर बेहद सीमित हैं।
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‘नेत्रहीन लोगों में स्पर्श की गजब क्षमता होती है’
श्रिया के मुताबिक, इसी सोच ने उन्हें स्पा शुरू करने की दिशा में प्रेरित किया। उन्होंने कहा, “वह लोखंडवाला में था और मैंने उसका नाम श्री स्पा रखा था। हमारे पास प्रशिक्षित थेरेपिस्ट और मसाजर थे। इनमें कुछ लोग पूरी तरह नेत्रहीन थे, जबकि कुछ की दृष्टि करीब 15 प्रतिशत थी।” उन्होंने आगे बताया कि नेत्रहीन लोगों में स्पर्श की बहुत अच्छी समझ होती है, जिसकी वजह से वे मसाज के काम में अपनी इस क्षमता का प्रभावी इस्तेमाल कर सकते थे।
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मां नीरजा के साथ मिलकर समझी रोजगार की जरूरत
श्रिया ने बताया कि बच्चों को देखने के अनुभव ने उन्हें और उनकी मां को यह समझने में मदद की कि सिर्फ शिक्षा ही नहीं, बल्कि रोजगार का मौका भी जरूरी है। इसी विचार से स्पा की योजना सामने आई। इसका उद्देश्य दृष्टिबाधित लोगों को उनकी क्षमता के मुताबिक काम देकर आत्मनिर्भर बनने का अवसर देना था।
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महामारी ने बंद कराया स्पा, लेकिन आइडिया आज भी खास
श्रिया के मुताबिक, कोरोना महामारी के दौरान ‘श्री स्पा’ का संचालन बंद हो गया। यानी एक दशक से ज्यादा पुरानी यह पहल अब सक्रिय नहीं है। फिर भी, नेत्रहीन लोगों की रोजगार क्षमता को लेकर उनका यह विचार आज भी चर्चा में है। खास तौर पर उनका यह नजरिया कि किसी व्यक्ति की दृष्टि उसकी काम करने की क्षमता को तय नहीं करती, इस कहानी का सबसे अहम पहलू बनकर सामने आता है।