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सेवा संकल्प दिवस : डॉ. रमन सिंह बोले- मोदी का नेतृत्व देश के लिए वरदान, चौथी बार भी बनेंगे प्रधानमंत्री - Haribhoomi

September 17, 2026

रायपुर। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री व वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व, कार्यशैली और उनके साथ बिताए यादगार पलों को एक विशेष साक्षात्कार में खुलकर साझा किया। डॉ. सिंह ने कहा, 24 घंटे और 365 दिन देश सेवा में समर्पित रहने वाले नरेंद्र मोदी जैसा दूरदर्शी नेतृत्व सदी में एक बार मिलता है।

दंतेवाड़ा के आवासीय विद्यालय में बच्चों संग पीएम के ड्रम बजाने से लेकर, बीजापुर में महिला को अपने हाथों से चरण पादुका पहनाने और 104 वर्ष की वृद्धा कुंवर बाई के पैर छूने जैसे भावुक संस्मरणों का जिक्र करते हुए उन्होंने पीएम श्री मोदी की असीम संवेदनशीलता और विनम्रता को रेखांकित किया।   बस्तर से नक्सलवाद के समूल उन्मूलन में केंद्र सरकार के दृढ़ संकल्प को निर्णायक बताते हुए डॉ. रमन सिंह ने विश्वास जताया कि देश की जनता के अटूट भरोसे के दम पर नरेंद्र मोदी चौथी बार भी देश के प्रधानमंत्री के रूप में भारत का नेतृत्व करेंगे। विस अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह से हरिभूमि-आईएनएच न्यूज के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी के साथ विशेष बातचीत के प्रमुख अंश प्रस्तुत हैं। 

नरेंद्र मोदी से पहली मुलाकात आपकी कब हुई थी और कैसे हुई थी?
एक लंबा समय निकल गया है और मुझे लगता है कि नरेंद्र भाई को काम करते हुए अलग-अलग रूप में, कभी एक अच्छे संगठक के रूप में, कभी प्रदेश में मुखिया के नाते मुख्यमंत्री के रूप में, फिर प्रधानमंत्री के रूप में अलग-अलग भूमिकाओं में लंबे समय तक देखने का अवसर मिला। और मुझे लगता है कि मेरी पहली मुलाकात यदि मैं कहूं तो वो तो बहुत लंबा समय, जब मुरली मनोहर जोशी की यात्रा में प्रभारी थे। यह मुरली मनोहर जोशी की उस यात्रा का अनुभव मेरे साथ जुड़ा है, मगर मोदीजी के साथ जो परिचय बढ़ा, उस समय तो एक सामान्य कार्यकर्ता और मैं एक छोटा कार्यकर्ता था, वे हमारे राष्ट्रीय महामंत्री संगठन के रूप में काम करते जब छत्तीसगढ़ के प्रभार में भी थे, उस समय भी मिलने का अवसर मिला।

जब नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया, तब आपकी पहली प्रतिक्रिया आपके आसपास की क्या थी?
मैं उस समय तक संगठन के राष्ट्रीय दायित्व में नहीं था, मगर वह घटना पूरे देश में चर्चा का विषय रही कि पहली बार इस प्रकार का दायित्व सौंपा गया। कोई महामंत्री संगठन राजनीतिक दृष्टि से मुख्यमंत्री बन जाए, क्योंकि गुजरात की चुनौती बड़ी थी, और बड़ी चुनौती को संभालने के लिए एक मजबूत, दृढ़ निश्चयी व्यक्ति की जरूरत थी। उस समय संगठन ने सही व्यक्ति का चुनाव किया, जो उस झंझावातों से उस गुजरात को आगे निकालने और विकास की दिशा में ले जाए तो मुझे लगता है कि वह निर्णय उस समय के नेतृत्व ने जो किया, वह बड़ा निर्णय था और उसका नतीजा भी देखने को मिला देश को।

पर जब आप मुख्यमंत्री बने तो नरेंद्र मोदी के साथ आपका मिलना-जुलना शुरू हुआ होगा, क्या देखते थे आप उस समय?
उस समय से ही हमारी मुलाकात, बातचीत होती थी और कई बार उनसे लंबी चर्चा भी होती थी, और मुझे लगता है कि हमारे भारतीय जनता पार्टी के शासित राज्य कम थे। कांग्रेस सरकार और कांग्रेस की जो नीतियां थीं, उसका विरोध प्रधानमंत्री की बैठक में किस प्रकार किया जाना है, नीतियों में जो बीजेपी के साथ उपेक्षा का भाव हो रहा है, उसमें मोदीजी का नेतृत्व सामने झलकता था, और वे उस जवाबदारी को संभालते थे कि आज किस बिंदु पर मनमोहन सरकार पर हमको अटैक करना है, बैठक के दौरान हमको किस-किस बात पर चर्चा करनी है। इसमें सबसे तेजी के साथ वसुंधरा राजे थीं, नरेंद्र मोदी थे और हमारे वरिष्ठ मुख्यमंत्री थे, मगर मोदीजी की भूमिका निर्णायक होती थी।

नरेंद्र मोदी से नेता के तौर पर प्रभावित होने का अवसर कब आया? आपको लगा कि नेता हो तो नरेंद्र मोदी जैसा?
नहीं, देखिए, नरेंद्र मोदीजी के व्यक्तित्व का विकास उनकी संघर्षशीलता में ही दिखता था, और जब एक बड़ी चुनौती को स्वीकार किया, उस समय से डॉ. रमन को यह महसूस होने लगा कि आने वाले समय में वे पीएम होंगे। उसके बाद तो हम लोग मिलते रहे, कई बार उनको छत्तीसगढ़ हमने बुलाया, कई कार्यक्रमों में छत्तीसगढ़ आए, कई विषयों को लेकर हम गुजरात भी गए।

बड़ी त्रासदी थी भुज का भूकंप तो भुज में जिस तरीके से उन्होंने उस मामले को डील किया, उससे आप बड़े प्रभावित हुए?उस समय मोदीजी से कोई बातचीत होती थी आपकी?
बिल्कुल होती थी और बात करते थे। बड़ी घटनाएं होती थीं, उस समय वे हिम्मत दिलाते थे और बोलते थे कि यह लड़ाई का एक हिस्सा है, एक फेज है। इसमें पीछे नहीं हटना है, घबराने की जरूरत नहीं है, और वो तो ये भी बोलते थे कि देश की सबसे बड़ी लड़ाई आप लड़ रहे हो, हम सब आपके साथ हैं। नक्सलवाद उस समय देश की सबसे बड़ी समस्या थी, देश-दुनिया में एक समस्या के रूप में थी। उस समस्या से जूझने के लिए जब भी हम लोग बैठते थे और प्रधानमंत्री की बैठक में बैठते थे, हमारे मुख्यमंत्रियों की बैठक हमारे संगठन के लोग करते थे और विषय जब आता था तो नक्सल पर मुझे ही बोलना रहता था, पर वे उस विषय को लेकर हमेशा चिंतित रहते थे और छत्तीसगढ़ के योजनाओं का अध्ययन उनको था। जैसे ही हमने चावल की योजना शुरू की, मैंने फोन लगाया मोदीजी को, कि एक हम नई योजना शुरू कर रहे हैं, गरीबों के लिए चावल की योजना । तुरंत वे बोले कि बहुत अच्छी योजना है और उसका क्रियान्वयन कैसे होता है, यह देखना है और उनकी निगाह हमेशा रहती थी कि योजना तो आप बनाओ, मगर 100% उस योजना को फुलप्रूफ बनाओ।

आप 2003 में मुख्यमंत्री बने, 2004 में पार्टी हार गई लोकसभा का चुनाव। फिर 2009 आया, लालकृष्ण आडवाणीजी को चेहरा बनाया, बड़ी उम्मीद आप लोगों ने बांधी, फिर हार गए तो उसके बाद मोदीजी पर दांव लगाएं, यह पार्टी ने तय किया?
उस घटना का मैं गवाह हूं। जब राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक हो रही थी और उस बैठक में यह निर्णय किया जा रहा था कि चेहरा कौन होगा प्रधानमंत्री का या चुनाव का प्रभारी, संचालन कौन करेगा? अभियान समिति का प्रमुख कौन होगा, इस बात के लिए चर्चा हो रही थी, मगर एक चीज, मैं उस अभियान समिति में, कार्यसमिति में, बैठक में देखता था, सबसे मिलता रहता था, तो उस समय भी कोई वोटिंग हमारे यहां होती नहीं, मतदान होता नहीं कि किसी से वह किया है, राय ली जाती है, मगर जब मैं 80-90 प्रतिशत वरिष्ठ लोगों से और नए लोगों से, हमारे साथियों से पूछता था, एकमतेन सबके मुंह में, जुबान में यह बात रहती थी कि नेतृत्व चुनाव अभियान समिति में, मोदीजी को देने से बहुत अच्छा रिजल्ट आएगा और इनको दिया जाना चाहिए। विरले लोग ही थे, जो इनके विरोध में थे और एक प्रकार से वातावरण का निर्माण, राजनाथ सिंह शायद राष्ट्रीय अध्यक्ष थे।

जब रायशुमारी हो रही थी तो आपने कहा, मैं भी बात कर रहा था, पर आपसे भी तो राय ली गई होगी तो रमन सिंह की राय क्या थी?
मुझसे भी राय ली गई और स्पष्ट रूप से राय ली गई, तो मैंने कहा, यह बेहतर चेहरा है, इससे बेहतर चेहरा कोई हो नहीं सकता। और मैं ही नहीं सहमत था, बहुत लोग हमारे साथ, अधिकांश लोग इससे सहमत थे। इसके बाद फैसला लिया गया, प्रधानमंत्री के संदर्भ में चेहरा नरेंद्र मोदी होंगे, क्योंकि चुनाव अभियान समिति की कमान पार्टी ने उन्हें दे दी।

आपका सबसे कठिन चुनाव था 2013 विधानसभा का। झीरम जैसा हादसा हो गया था। उस चुनौती के बीच में आपने चुनाव लड़ा?
छत्तीसगढ़ के 2013 के चुनाव में जो भूमिका, जैसे हम चुनाव को अलग-अलग देखे, तीन का चुनाव हुए, आठ का चुनाव हुआ, 13 का चुनाव हुआ। इन चुनावों में अलग-अलग भूमिकाओं में, वो चाहे लोकसभा और विधानसभा, एक साथ आगे-पीछे ही चलते हैं। 6 महीने 7 महीने का फर्क आता है। उस समय से हम लगातार हर चुनाव में देख रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में लोगों को प्रभावित करने की दृष्टि से और किसे आमंत्रित किया जाए तो उस समय से हमको यह लगता था कि आम कार्यकर्ता और लोगों का निगाह में यदि कोई एक चेहरा सबसे प्रमुखता से आता है तो वो नरेंद्र मोदी का नाम आता था।

तो कितनी मशक्कत करनी पड़ती थी आपको नरेंद्र मोदी को बुलाने में? वे तो प्रधानमंत्री का चेहरा होगए थे।
बहुत आसान।

आपके मुख्यमंत्री रहते, नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री हुए। जब वे मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री हो गए, क्या बदलाव देखा आपने नरेंद्र मोदी में?
देखिए, मुख्यमंत्री थे तो बहुत समय रहता था, बातें बहुत होती थीं, चर्चा भी हम लोग काफी कर लेते थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी व्यस्तता को हम लोग देखते रहे कि किस प्रकार वे व्यस्त हैं, किस प्रकार पूरे देश में घूम रहे हैं, तो उनके स्वभाव में कोई फर्क तो नहीं आया, मगर उनकी व्यस्तता इतनी बढ़ गई कि वे इतनी जल्दी उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। यह बात समझ में आती है कि एक आदमी जब बड़े दायित्व में जाता है तो वैसा समय नहीं मिल पाता।

आपने दो भूमिकाओं में उन्हें देखा। एक संगठनकर्ता के तौर पर और एक प्रशासक के तौर पर। कौन-सी भूमिका में आपको मोदीजी ने ज्यादा प्रभावित किया?
बहुत ही सख्त और मेहनत करने वाले महामंत्री संगठन के रूप में देखा मैंने उनको, और प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके व्यक्तित्व में परिवर्तन भी आया। और वो परिवर्तन आया कि ज्यादा से ज्यादा लोगों से किस प्रकार हर दिशा से कुछ न कुछ बात आए, सबसे बात करें, युवा से भी बात करें, बुजुर्ग से भी बात करें, वैज्ञानिकों से भी बात करें और शिक्षकों से भी बात करें, और सबसे पूछकर फिर निर्णय लेने की प्रक्रिया।

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