राजस्थान में रोजगार का कड़वा सच! राजस्थान का आधा युवा वर्ग खेतों में मजदूरी को मजबूर, रिपोर्ट से खुली पोल
Published: Monday, September 14, 2026, 12:01 [IST]
Youth Employment Crisis in Rajasthan: राजस्थान के युवाओं में काम करने और रोजगार तलाशने की इच्छा तेजी से बढ़ी है, लेकिन उन्हें किस तरह का काम मिल रहा है, यह तस्वीर चिंता बढ़ाने वाली है। 15 से 29 साल के युवाओं की लेबर फोर्स में हिस्सेदारी 2017-18 में 38% थी, जो 2025 में बढ़कर 51% हो गई। यानी ज्यादा युवा अब काम या नौकरी की तलाश में आगे आ रहे हैं। लेकिन नई Rajasthan Handbook of Youth Opportunity के आंकडे बताते हैं कि इस बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा खेती और बिना वेतन परिवार के काम में गया है।
राज्य में काम करने वाले हर 100 युवाओं में 47 कृषि क्षेत्र से जुड़े हैं और उनकी मीडियन मासिक कमाई 7,110 रुपये है। वहीं 39% युवा बिना अलग वेतन के परिवार के खेत या कारोबार में काम कर रहे हैं। युवा महिलाओं में यह आंकड़ा 61% है। राजस्थान के लगभग आधे युवा कामगार खेतों में काम करते हैं, यह संख्या भारत में सबसे ज्यादा है।
ज्यादा युवा काम में आए, लेकिन अच्छी नौकरी कहां है?
रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान में करीब 2.27 करोड़ युवा हैं। इनमें 51.1% लेबर फोर्स का हिस्सा हैं। युवा बेरोजगारी दर 12.3% है, जबकि 20.9% युवा ऐसे हैं जो न काम कर रहे हैं, न पढ़ाई और न ही किसी ट्रेनिंग से जुड़े हैं। यानी राज्य में युवाओं की काम में भागीदारी बढ़ी है, लेकिन रोजगार का बड़ा हिस्सा ऐसी जगहों पर है जहां कमाई कम और नौकरी की सुरक्षा कमजोर है।
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2017-18 से 2025 के बीच लेबर फोर्स में युवाओं की हिस्सेदारी 38% से बढ़कर 51% हुई। इस बढ़ोतरी में युवा महिलाओं की भागीदारी भी बड़ी रही। लेकिन नियमित वेतन वाली नौकरियों का हिस्सा बढ़ने के बजाय घटा है।
47% युवा खेती में, कमाई 7,110 रुपये
राजस्थान के युवाओं के रोजगार की सबसे बड़ी हिस्सेदारी कृषि में है। करीब आठ साल पहले 39.3% युवा कामगार खेती से जुड़े थे। अब यह आंकड़ा 47% हो गया है। यानी हर 100 युवा कामगारों में लगभग आधे खेती कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार इसी अवधि में कृषि से होने वाली वास्तविक कमाई में गिरावट आई है।
100 एम्प्लॉयड युवाओं में रोजगार का बंटवारा
| क्षेत्र | युवा कामगार | मीडियन मासिक कमाई |
|---|---|---|
| कृषि | 47% | 7,110 रुपये |
| निर्माण | 14% | 12,720 रुपये |
| मैन्युफैक्चरिंग | 12% | 10,670 रुपये |
| व्यापार और हॉस्पिटैलिटी | 12% | 12,390 रुपये |
| सर्विस सेक्टर | 11% | 14,270 रुपये |
| ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स | 3% | 15,330 रुपये |
इस आंकड़े से एक बात साफ है कि जिन क्षेत्रों में युवा कम संख्या में हैं, उनमें कई जगह कमाई खेती के मुकाबले काफी ज्यादा है।
खेती में युवाओं की हिस्सेदारी क्यों बढ़ी?
रिपोर्ट का एक अहम संकेत यह है कि राजस्थान में युवाओं की रोजगार बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा कृषि में गया, जबकि लगभग सभी दूसरे राज्यों में इस अवधि में कृषि में युवा कामगारों की हिस्सेदारी घटी। इसका मतलब यह हो सकता है कि राज्य में युवाओं के लिए खेती के बाहर पर्याप्त संख्या में नई नौकरियां नहीं बन पाईं। दूसरी तरफ परिवार के खेत और छोटे कारोबार युवाओं को तुरंत काम देने का विकल्प बने रहे। यही वजह है कि रोजगार के आंकड़े बढ़ने के बावजूद कमाई और नौकरी की गुणवत्ता का सवाल बना हुआ है।
61% युवा सेल्फ-एम्प्लॉयड
राजस्थान में काम करने वाले हर 100 युवाओं में 61 सेल्फ-एम्प्लॉयड हैं। यह आंकड़ा बताता है कि युवाओं का बड़ा हिस्सा किसी कंपनी या संस्थान की नियमित नौकरी के बजाय खुद के काम, छोटे कारोबार या पारिवारिक रोजगार से जुड़ा है। राज्य में 30 लाख से ज्यादा रजिस्टर्ड एंटरप्राइजेज हैं और इनमें करीब 99% माइक्रो एंटरप्राइजेज हैं। लगभग 10 में से 9 कारोबारों में अधिकतम दो कर्मचारी हैं। इस तरह छोटे कारोबार बड़ी संख्या में होने के बावजूद बड़े स्तर पर नई नौकरियां पैदा करने की उनकी क्षमता सीमित है।

39% युवा बिना वेतन परिवार के काम में
रोजगार के आंकड़ों में सबसे बड़ा सवाल अनपेड फैमिली वर्क को लेकर है। काम करने वाले हर 100 युवाओं में करीब 39 युवा परिवार के खेत या कारोबार में बिना अपनी अलग मजदूरी के काम करते हैं। यह आंकड़ा देश में तीसरा सबसे ज्यादा है। युवा महिलाओं की स्थिति और ज्यादा अलग है। काम करने वाली हर 100 युवा महिलाओं में करीब 61 बिना वेतन परिवार के काम में लगी हैं। यानी कई युवाओं को काम तो मिल रहा है, लेकिन उसके बदले उन्हें अपनी अलग कमाई नहीं हो रही।
नियमित नौकरी का हिस्सा घटा
राजस्थान में सिर्फ 23% युवा पारिश्रमिक नियमित वेतन वाली नौकरी में हैं। सामान्य राज्य स्तर पर यह आंकड़ा करीब 29% है। इसके अलावा करीब 84% युवा पारिश्रमिकों को नियोक्ता की तरफ से सोशल सिक्योरिटी की सुविधा नहीं मिलती। इनमें PF, ग्रेच्युटी और हेल्थ कवर जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इसलिए राजस्थान में रोजगार की चुनौती सिर्फ बेरोजगारी तक सीमित नहीं है। बड़ी समस्या यह भी है कि युवाओं को जो काम मिल रहा है, वह कितना स्थायी और अच्छी कमाई वाला है।
फैक्ट्री में रोजगार सिर्फ 2%
रिपोर्ट के अनुसार 2017-18 से 2023-24 के बीच फैक्ट्री रोजगार में एक तिहाई से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई। इसके बावजूद राज्य के कुल रोजगार में फैक्ट्री से मिलने वाली नौकरियों की हिस्सेदारी सिर्फ 2% है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वेतन वाली नौकरियां कम हैं और सर्विस सेक्टर में भी रोजगार का बड़ा हिस्सा सरकारी नौकरी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में केंद्रित है। इससे यह सवाल उठता है कि निजी क्षेत्र में ऐसे कितने बड़े और मध्यम कारोबार हैं जो हर साल बड़ी संख्या में युवाओं को नियमित नौकरी दे सकें।
पढ़ाई बढ़ी, लेकिन नौकरी मिलना आसान नहीं
युवाओं की शिक्षा और रोजगार के बीच भी बड़ा अंतर सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार ग्रेजुएट या उससे ज्यादा पढ़े युवाओं में बेरोजगारी करीब 33% है। वहीं सेकेंडरी स्तर तक पढ़े युवाओं में यह करीब 3% है। युवा महिलाओं में ग्रेजुएट स्तर पर बेरोजगारी करीब 44% है। इससे पता चलता है कि डिग्री हासिल करने के बाद युवाओं की उम्मीदें और नौकरी बाजार में उपलब्ध अवसर एक-दूसरे से मेल नहीं खा रहे हैं। इसलिए सिर्फ ज्यादा पढ़ाई कराना काफी नहीं है, बल्कि पढ़ाई को रोजगार से जोड़ना भी जरूरी है।

रुचि गुप्ता ने रोजगार नीति पर दिया जोर
Future of India Foundation की Executive Director रुचि गुप्ता ने रिपोर्ट जारी होने के दौरान राजस्थान के सांसदों और विधायकों की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि राज्य के 25 सांसद अपने-अपने जिलों की DISHA समितियों की अध्यक्षता करते हैं और 200 विधायक भी इन समितियों का हिस्सा हैं। उनके मुताबिक, सांसदों और विधायकों को अपने राजनीतिक प्रभाव और संस्थागत भूमिका का इस्तेमाल अपने जिले और पूरे राज्य में युवाओं के बेहतर परिणामों के लिए करना चाहिए।
वहीं Seva Mandir के CEO रोनक शाह ने कहा कि रिपोर्ट के जिला स्तर के स्कोरकार्ड से हर जिले की अलग जरूरत को समझने में मदद मिलेगी। उनके मुताबिक, राजस्थान के युवाओं के लिए सेल्फ-एम्प्लॉयमेंट को ज्यादा मजबूत और टिकाऊ विकल्प बनाने की जरूरत है।
हर जिले की कहानी अलग
इस रिपोर्ट में राजस्थान के सभी 41 जिलों के लिए अलग-अलग स्कोरकार्ड तैयार किए गए हैं। इसमें YouthPOWER प्लेटफॉर्म के जरिए करीब 180 संकेतकों को देखा गया है। इनमें युवाओं की भागीदारी, अवसर, काम, शिक्षा और स्किल से जुड़े आंकड़े शामिल हैं।
राजस्थान का कुल YouthPOWER स्कोर 45.7 है। जिलों में जयपुर 55.9 स्कोर के साथ सबसे ऊपर है। इसके बाद झुंझुनूं और उदयपुर जैसे जिले बेहतर स्थिति में हैं। दूसरी ओर डूंगरपुर 41.6 स्कोर के साथ सबसे नीचे है। बारां और प्रतापगढ़ भी निचले स्तर पर हैं।
इसका मतलब है कि राज्य के सभी जिलों के लिए रोजगार का एक जैसा मॉडल काम नहीं करेगा। कहीं स्किल ट्रेनिंग की जरूरत ज्यादा है, तो कहीं छोटे कारोबार और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देना जरूरी हो सकता है।

रिपोर्ट ने सुझाए रोजगार बढ़ाने के तरीके
रिपोर्ट में राजस्थान के लिए एक ऐसी रोजगार नीति बनाने की जरूरत बताई गई है, जिसमें सिर्फ नई नौकरियों की संख्या नहीं बल्कि नियमित रोजगार, वेतन में बढ़ोतरी और सोशल सिक्योरिटी को भी देखा जाए। छोटे कारोबारों को बड़ा करने और उनमें ज्यादा लोगों को रोजगार देने, मौजूदा कामों में कमाई और काम की स्थिति सुधारने, स्थानीय जरूरत के हिसाब से स्किल ट्रेनिंग देने और युवाओं के लिए अप्रेंटिसशिप बढ़ाने की सिफारिश की गई है। खास तौर पर युवा महिलाओं के लिए पेड वर्क और अप्रेंटिसशिप के अवसर बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
रिपोर्ट में पुराने रोजगार एक्सचेंज को District Youth Resource Centres में बदलने का सुझाव भी दिया गया है। ऐसे केंद्रों पर युवाओं को नौकरी, ट्रेनिंग, अप्रेंटिसशिप, मेंटरिंग और अपना कारोबार शुरू करने से जुड़ी मदद एक ही जगह मिल सकेगी।
युवाओं की सेहत भी चिंता का विषय
रिपोर्ट में रोजगार के साथ युवाओं की सेहत से जुड़े आंकड़े भी चिंता पैदा करते हैं। 2021 से 2024 के बीच सामान्य से कम वजन वाली युवा महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 8 प्रतिशत अंक बढ़कर 27% हो गई। युवा पुरुषों में यह करीब 11 प्रतिशत अंक बढ़कर 25% हो गई। रिपोर्ट के अनुसार दोनों मामलों में बढ़ोतरी सर्वे किए गए राज्यों में सबसे ज्यादा थी। वहीं कक्षा 9 से 12 की उम्र वाले बच्चों में करीब 73% स्कूल में पढ़ रहे हैं।
राजस्थान के लिए अब चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि ज्यादा युवा काम करें। असली सवाल यह है कि उन्हें ऐसा काम मिले जिससे उनकी कमाई बढ़े, नौकरी सुरक्षित हो और भविष्य बेहतर बने।
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