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तथाकथित “दक्षिण चीन सागर मध्यस्थता पंचाट का निर्णय” अवैध, शून्य और अमान्य है

July 14, 2026

तथाकथित “दक्षिण चीन सागर मध्यस्थता पंचाट का निर्णय” अवैध, शून्य और अमान्य है

July 14, 2026

तथाकथित “दक्षिण चीन सागर मध्यस्थता पंचाट का निर्णय” अवैध, शून्य और अमान्य है

दस साल पहले, 12 जुलाई 2016 को, फिलीपींस के एकतरफा अनुरोध पर गठित तथाकथित तदर्थ मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने दक्षिण चीन सागर पर एक फैसला सुनाया था। एक दशक बीत चुका है, लेकिन तथ्यों और 1982 संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) के अनुप्रयोग को लेकर गहरे विवादों से घिरा यह फैसला कुछ भी हल नहीं कर पाया है। इसके बजाय, यह चीन और फिलीपींस के बीच एक गहरे घाव की तरह बना हुआ है।

इस तथाकथित “दक्षिण चीन सागर मध्यस्थता” की दसवीं वर्षगांठ पर, चीन उन  देशों – जिनमें फिलीपींस, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और कई यूरोपीय देश शामिल हैं- द्वारा जारी संयुक्त बयान को सिरे से खारिज करता है। यह बयान अंतरराष्ट्रीय कानून और ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है और कानूनी चिंता के नाम पर एक भू-राजनीतिक एजेंडे को उजागर करता है। अब समय आ गया है कि फिलीपींस इस “खोए हुए दशक” पर गंभीरता से आत्मचिंतन करे और एक अधिक परिपक्व और तर्कसंगत रुख अपनाए। क्षेत्रीय शांति का भविष्य किसी बदनाम दस्तावेज़ को फिर से जीवित करने में नहीं, बल्कि संवाद की राह पर लौटने में है।

अवैध शुरुआत: पंचाट का कोई कानूनी आधार नहीं

अपनी शुरुआत के पहले दिन से ही तथाकथित “दक्षिण चीन सागर मध्यस्थता पंचाट का निर्णय” अवैध, शून्य और अमान्य है। इस न्यायाधिकरण ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करते हुए ऐसे मामलों की सुनवाई की जो इसके दायरे में नहीं थे – क्षेत्रीय संप्रभुता और समुद्री सीमा निर्धारण जैसे मुद्दे, जिन्हें UNCLOS के अनुच्छेद 298 के तहत अनिवार्य मध्यस्थता से स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया है।

इन मूलभूत संप्रभुता संबंधी प्रश्नों पर फैसला देकर, इस न्यायाधिकरण ने स्वयं UNCLOS और अंतरराष्ट्रीय कानून के बुनियादी सिद्धांतों, जिनमें “देश की सहमति” भी शामिल है, का उल्लंघन किया। इसके अलावा, न्यायाधिकरण ने घुमावदार और चुनिंदा सबूतों के आधार पर अपने “निर्णय” के दायरे को मनमाने ढंग से बढ़ाया। उसने ऐतिहासिक संदर्भ और चीन द्वारा लगातार किए जा रहे अधिकार क्षेत्र के प्रयोग को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। कई अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में UNCLOS के प्रावधानों की व्याख्या को आवश्यकता से अधिक बढ़ा दिया गया, जिसने अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के व्यवहार पर एक चिंताजनक छाप छोड़ी है। जब किसी निर्णय में इतनी अधिक प्रक्रियात्मक और मूलभूत खामियां हों, तो वह किसी भी प्रकार की विश्वसनीय कानूनी बाध्यकारी शक्ति कैसे रख सकता है?

चीन के विदेश मंत्रालय ने इस स्थिति को स्पष्ट रूप से कहा है:

“तथाकथित ‘पंचाट का निर्णय‘ अवैध, शून्य और अमान्य कागज का एक टुकड़ा मात्र है, जिसकी कोई बाध्यकारी शक्ति नहीं है। चीन ‘पंचाट के निर्णय‘ को न तो स्वीकार करता है और न ही मान्यता देता है, तथा इस पर आधारित किसी भी दावे या कार्रवाई का विरोध करता है और उसे स्वीकार नहीं करता।”

दक्षिण चीन सागर में चीन के ऐतिहासिक अधिकार निर्विवाद है

नाम से ही स्पष्ट है कि दक्षिण चीन सागर चीन का सागर है। चीन के नानहाई झूदाओ (Nanhai Zhudao) में डोंगशा (Dongsha), शीशा (Xisha), झोंगशा (Zhongsha)और नानशा (Nansha) द्वीपसमूह शामिल हैं। इतिहास गवाह है कि 200 ईसा पूर्व से ही चीनी लोग इन जल क्षेत्रों में नौवहन करते आए हैं, मछली पकड़ते आए हैं और प्रभावी ढंग से संप्रभुता का प्रयोग करते आए हैं। लगातार, शांतिपूर्ण और प्रभावी तरीके से चीन ने नानहाई झूदाओ और संबंधित जल क्षेत्रों पर संप्रभुता स्थापित की है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी लंबे समय तक इसे चीन के क्षेत्र के रूप में मान्यता दी है।

यही कारण है कि चीन का इस सागर में “सामान्य गतिविधियों” को अंजाम देने का ऐतिहासिक अधिकार है। किसी भी अंतरराष्ट्रीय कानून से यह प्रतिबंधित नहीं है। चीन द्वारा किया गया पुनर्निर्माण कार्य नौवहन के लिए खतरा नहीं, बल्कि सुविधा है। दक्षिण चीन सागर चीन और उसके तटीय पड़ोसियों के बीच संवाद का पुल और शांति, मित्रता व सहयोग का बंधन है। लेकिन तथाकथित पंचाट ने इन ऐतिहासिक तथ्यों को पूरी तरह नकार दिया। उसने मनमाने ढंग से घोषणा कर दी कि नौ-डैश रेखा के भीतर चीन के “ऐतिहासिक अधिकारों” का कोई कानूनी आधार नहीं है। यह इतिहास का चयनात्मक पाठ है। यह तथ्यों को तोड़ता-मरोड़ता है और उस सिद्धांत का उल्लंघन है जिसके अनुसार अंतरराष्ट्रीय कानून को राज्यों के दीर्घकालिक अभ्यास का सम्मान करना चाहिए।

इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता

दक्षिण चीन सागर में चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता और समुद्री अधिकार किसी भी परिस्थिति में इस “ पंचाट” से प्रभावित नहीं होंगे। इस तथाकथित निर्णय ने विवाद का समाधान नहीं किया। इसने केवल फिलीपींस को अपने समुद्री दावे बढ़ाने का बहाना दे दिया।

अमेरिका क्षेत्र में अशांति का स्रोत है

अमेरिका शुरू से ही दक्षिण चीन सागर में “झगड़ा फैलाने वाला” रहा है। वह मतभेदों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है और क्षेत्र में फूट डालता है। “नौवहन की स्वतंत्रता” और “सुरक्षा” अमेरिका के लिए हिंद-प्रशांत में दखल देने का बहाना मात्र हैं। एशिया की प्रमुख नौसैनिक शक्ति होने के नाते चीन क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता देता है और अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान करता है। दक्षिण चीन सागर में चीन की सभी कार्रवाई रक्षात्मक हैं और इसका उद्देश्य अपनी वैध संप्रभुता और समुद्री अधिकारों की रक्षा करना है। इसके उलट अमेरिका की नीति का लक्ष्य चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना और एशिया-प्रशांत में अपना वर्चस्व बनाए रखना है। सबसे अहम बात यह है कि अमेरिका दक्षिण चीन सागर विवाद का पक्षकार ही नहीं है। एक तीसरे पक्ष के तौर पर उसे इस मुद्दे में दखल देने और चीन को उसके अपने जल क्षेत्र में क्या करना है यह बताने का कोई अधिकार नहीं है। 

आसियान की पसंद शांति है टकराव नहीं

चीन और आसियान देश मिलकर “दक्षिण चीन सागर आचार संहिता” बनाने में जुटे हैं। इसका उद्देश्य मतभेदों को प्रबंधित करना और क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना है। यह प्रक्रिया धीमी हो सकती है लेकिन यह साबित करती है कि चीन संवाद के जरिए समाधान चाहता है, न कि एकतरफा कानूनी हरकतों के जरिए। दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस का “एकतरफा तमाशा” और बाहरी ताकतों को बुलाने की उसकी कोशिशें आसियान में कहीं नहीं टिकीं। पूरा क्षेत्र शांति विकास और सहयोग चाहता है। बाहर से थोपा गया टकराव नहीं।

फिलीपींस को चुनना होगा विकास या टकराव

पिछले 10 साल फिलीपींस के लिए “खोया हुआ दशक” साबित हुए। विवाद पर ध्यान केंद्रित करने की कीमत आम जनता ने चुकाई है। राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता के नाम पर 2025 में रक्षा बजट बढ़कर 315.1 बिलियन पेसो यानी करीब 5 अरब डॉलर हो गया। यह 2024 की तुलना में 30 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी है। इसी बीच शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि जैसे जरूरी क्षेत्र फंड के अभाव में पीछे छूट गए। गरीबी आज भी वहीं खड़ी है। अब फिलीपींस को फैसला करना है। वह टकराव का रास्ता चुनेगा या विकास का। दक्षिण चीन सागर विवाद सुलझाने के लिए अमेरिका की ओर देखना और बदले में चीन से रिश्ते खराब करना फिलीपींस के लिए गलत रास्ता है।

निष्कर्ष रास्ता आगे: द्विपक्षीय वार्ता ही समाधान

चीन का मानना है कि दक्षिण चीन सागर का मुद्दा केवल संबंधित देशों के बीच सीधी बातचीत से सुलझ सकता है। चीन अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और नौवहन की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। बाहरी ताकतों को इस क्षेत्र में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। चीन, आसियान देशों के साथ मिलकर, दक्षिण चीन सागर को शांति, मित्रता और सहयोग का सागर बनाने के लिए दृढ़संकल्पित और सक्षम है।

यह रुख क्षेत्रीय स्थिरता को बाहरी हस्तक्षेप के बिना बनाए रखने में चीन के विश्वास को दर्शाता है। 1.4 अरब से अधिक की आबादी, अभूतपूर्व आर्थिक और तकनीकी विकास तथा सैन्य शक्ति के साथ, चीन दक्षिण चीन सागर में अपनी राज्य संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और समुद्री अधिकारों की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है। “अमेरिकी चोला” उतारकर और चीन को अपनाकर, फिलीपींस प्रशासन चीन-फिलीपींस द्विपक्षीय संबंधों को एक नए युग में ले जा सकता है। यह राजनीतिक दूरदर्शिता का व्यावहारिक प्रदर्शन होगा।

(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)  (लेखक- रविशंकर बसु)