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लीला चिटनिस : दिलीप-राज की ऑनस्क्रीन मां से ग्लैमरस सुपरस्टार तक का सफर | Leela Chitnis: The journey from Dilip and Raj's on-screen mother to glamorous superstar.

July 13, 2026

नई दिल्ली, हिंदी सिनेमा के 1930 के दशक की सबसे चर्चित हस्तियों में लीला चिटनिस का नाम भी शामिल था। अपनी खूबसूरती, शानदार स्टाइल और दमदार अदाकारी से उन्होंने उस दौर में खूब शोहरत हासिल की। कभी पर्दे की ग्लैमरस नायिका रहीं लीला चिटनिस ने बाद में मां के किरदारों में ऐसी अमिट छाप छोड़ी कि वह हमेशा के लिए दर्शकों के दिलों और जहन में बस गईं। उनकी सादगी, ममता और भावनात्मक अभिनय ने हर किरदार को खास बना दिया।

लीला चिटनिस का जन्म 9 सितंबर 1909 को कर्नाटक के धारवाड़ में एक मराठी भाषी परिवार में हुआ था। उनके पिता अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर थे, इसलिए घर में पढ़ाई-लिखाई का माहौल था। उस दौर में जब महिलाओं की शिक्षा को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था, लीला ने बीए की डिग्री हासिल की। उन्हें हिंदी सिनेमा की शुरुआती पढ़ी-लिखी अभिनेत्रियों में गिना जाता है।

अभिनय की शुरुआत उन्होंने फिल्मों से नहीं बल्कि रंगमंच से की थी। वह मराठी के प्रगतिशील नाट्य समूह 'नाट्यमन्वंतर' से जुड़ीं और कई नाटकों में मुख्य भूमिकाएं निभाईं। अभिनय के प्रति उनका जुनून धीरे-धीरे उन्हें फिल्मों की दुनिया तक ले गया।

लीला की निजी जिंदगी भी काफी संघर्षों से भरी रही। कम उम्र में ही उनकी शादी डॉ. गजानन यशवंत चिटनिस से हो गई थी। वह चार बच्चों की मां बनीं लेकिन वैवाहिक जीवन ज्यादा समय तक नहीं चल पाया। पति से अलग होने के बाद बच्चों की जिम्मेदारी पूरी तरह लीला पर आ गई। परिवार चलाने के लिए उन्होंने स्कूल में अध्यापिका की नौकरी की और साथ ही रंगमंच से जुड़ी रहीं।

फिल्मों में उनका शुरुआती सफर आसान नहीं था। उन्होंने छोटे किरदारों और एक्स्ट्रा कलाकार के रूप में काम करना शुरू किया। इसके बाद उन्हें स्टंट फिल्मों में भी मौके मिले। साल 1937 में आई फिल्म 'जेंटलमैन डाकू' ने उनके करियर को नई दिशा दी। इस फिल्म में उन्होंने पुरुषों के कपड़े पहनकर एक अलग तरह का किरदार निभाया था, जिसे काफी सराहा गया।

इसके बाद लीला चिटनिस की प्रतिभा पर फिल्म इंडस्ट्री की नजर पड़ी। उन्हें बॉम्बे टॉकीज से जुड़ने का मौका मिला और साल 1939 में आई फिल्म 'कंगन' ने उन्हें बड़ा स्टार बना दिया। इस फिल्म में उन्होंने अशोक कुमार के साथ मुख्य भूमिका निभाई थी। फिल्म की सफलता के साथ ही अशोक कुमार और लीला चिटनिस की जोड़ी भी दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हो गई।

'कंगन' के बाद लीला ने अशोक कुमार के साथ 'बंधन', 'आजाद' और 'झूला' जैसी कई सफल फिल्मों में काम किया। अशोक कुमार उनकी अभिनय क्षमता से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने कहा था कि बिना बोले सिर्फ आंखों से भाव व्यक्त करना उन्होंने लीला चिटनिस से सीखा था।

अपने करियर के सुनहरे दौर में लीला चिटनिस ने एक और इतिहास रचा। साल 1941 में वह लोकप्रिय साबुन ब्रांड लक्स के विज्ञापन में नजर आईं और ऐसा करने वाली पहली भारतीय फिल्म स्टार बनीं। उस समय इस तरह के विज्ञापन में केवल हॉलीवुड की बड़ी अभिनेत्रियां ही दिखाई देती थीं।

समय के साथ फिल्मों में नई अभिनेत्रियों का दौर आया और लीला ने अपने करियर की दिशा बदल ली। साल 1948 में आई फिल्म 'शहीद' में उन्होंने पहली बार मां का ऐसा किरदार निभाया, जिसने उनकी पहचान हमेशा के लिए बदल दी। इसके बाद वह हिंदी फिल्मों की सबसे यादगार मांओं में शामिल हो गईं।

लीला चिटनिस ने दिलीप कुमार, राज कपूर और कई बड़े सितारों की मां की भूमिका निभाई। 'आवारा', 'गंगा जमुना' और 'गाइड' जैसी फिल्मों में उनके निभाए गए मां के किरदारों को खूब सराहा गया। उन्होंने पर्दे पर त्याग, ममता और संघर्ष से भरी मां की ऐसी छवि बनाई, जिसे बाद की कई अभिनेत्रियों ने आगे बढ़ाया।

1985 में आई फिल्म 'दिल तुझको दिया' उनकी आखिरी फिल्म रही। इसके बाद वह अमेरिका चली गईं और अपने बच्चों के साथ रहने लगीं। 14 जुलाई 2003 को 94 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।