हनुमान जी की जन्म कथा: सूर्य को निगलने चला था बाल हनुमान, इंद्र के वज्र से हुए थे मूर्छित
भगवान हनुमान की रोचक जन्म कथा, कैसे बचपन में उन्होंने सूर्य को फल समझकर निगलने की कोशिश की और इंद्र के वज्र प्रहार से बेहोश हो गए। पढ़ें पूरी कथा।
हनुमान जी की जन्म कथा (Ai Image)
- Published: 07 Aug 2026, 04:37 PM IST
- Last Updated: 07 Aug 2026, 04:37 PM IST
Hanuman ji janam katha: हिंदू धर्म में भगवान हनुमान को शक्ति, भक्ति और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है। वे भगवान शिव के ग्यारहवें रुद्रावतार और पवनपुत्र के नाम से भी जाने जाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, हनुमान जी का जन्म माता अंजनी और वानरराज केसरी के घर हुआ था। माता अंजनी ने पुत्र प्राप्ति की कामना से भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी, जिसके फलस्वरूप उन्हें यह दिव्य पुत्र प्राप्त हुआ। इसी वजह से हनुमान जी को अंजनी पुत्र भी कहा जाता है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, वायुदेव ने भी हनुमान जी के जन्म में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिस कारण उन्हें पवनपुत्र भी कहा जाता है। यही वजह है कि हनुमान जी को असीम शक्ति, गति और बल का स्वामी माना जाता है।
सूर्य को फल समझकर निगलने चल पड़े बाल हनुमान
हनुमान जी के बचपन से जुड़ी एक बेहद रोचक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि बचपन में हनुमान जी बेहद चंचल और शक्तिशाली थे। एक दिन सुबह के समय जब सूर्य उदय हो रहे थे, तो बालक हनुमान ने आकाश में चमकते हुए लाल-सुनहरे सूर्य को देखा। उस समय उन्हें तेज भूख भी लगी हुई थी, और उन्होंने सूर्य को एक पका हुआ मीठा फल समझ लिया।
अपनी दिव्य शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए बाल हनुमान आकाश की ओर छलांग लगाकर उड़ चले, ताकि वे सूर्य को निगल सकें। उनकी यह छलांग इतनी तेज और शक्तिशाली थी कि वे कुछ ही क्षणों में सूर्य के करीब पहुंच गए।
इंद्र के वज्र प्रहार से हुए मूर्छित
बालक हनुमान को सूर्य की ओर बढ़ता देख संपूर्ण सृष्टि में हलचल मच गई। उसी समय राहु नामक ग्रह भी सूर्य को ग्रहण लगाने के लिए आगे बढ़ रहा था, लेकिन हनुमान जी को देखकर राहु घबरा गया और देवराज इंद्र के पास जाकर पूरी घटना बताई।
यह सुनकर देवराज इंद्र स्वयं अपने ऐरावत हाथी पर सवार होकर वहां पहुंचे। उन्होंने देखा कि एक बालक अपनी शक्ति से सूर्य को निगलने की कोशिश कर रहा है। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए इंद्र ने बालक हनुमान को रोकने के लिए अपने वज्र का प्रहार कर दिया।
वज्र की चोट हनुमान जी की ठुड्डी पर लगी, जिसके कारण वे बेहोश होकर सीधे धरती पर आ गिरे। इसी दिव्य घटना के कारण ही उन्हें "हनुमान" नाम मिला, क्योंकि संस्कृत में "हनु" का अर्थ ठुड्डी होता है और इसी अंग पर चोट लगने से उनका यह नाम पड़ा।
पुत्र को मूर्छित देख क्रोधित हुए वायुदेव
जब वायुदेव ने देखा कि उनके पुत्र को वज्र प्रहार से मूर्छित कर दिया गया है, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। क्रोध में आकर उन्होंने संपूर्ण सृष्टि से वायु का प्रवाह रोक दिया, जिससे स्वर्ग, धरती और पाताल तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। बिना वायु के प्राणियों का जीवित रहना असंभव होने लगा।
इस भयावह स्थिति को देखकर सभी देवतागण अत्यंत चिंतित हो उठे। वे सभी मिलकर वायुदेव के पास पहुंचे और उन्हें शांत करने का प्रयास करने लगे। सभी देवताओं ने मिलकर बालक हनुमान को पुनः जीवित करने और उन्हें विशेष शक्तियां व वरदान देने का निश्चय किया।
देवताओं ने दिए अनेक दिव्य वरदान
देवराज इंद्र ने स्वयं हनुमान जी को यह वरदान दिया कि उनका वज्र अब कभी भी उन्हें हानि नहीं पहुंचाएगा। इसके साथ ही अन्य देवताओं ने भी बालक हनुमान को अनेक अद्भुत शक्तियां प्रदान कीं, जिनमें अमरता, अपार बल, इच्छानुसार रूप बदलने की क्षमता और अग्नि से न जलने जैसी दिव्य शक्तियां शामिल थीं।
इन वरदानों के फलस्वरूप वायुदेव का क्रोध शांत हुआ और सृष्टि में वायु का प्रवाह पुनः सामान्य हो गया। इसी घटना के बाद से हनुमान जी को अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों का स्वामी भी माना जाने लगा।
भक्ति और शक्ति के प्रतीक बने हनुमान जी
हनुमान जी की यह बाल्यकाल की कथा उनकी असीम शक्ति, निडरता और दिव्यता को दर्शाती है। आगे चलकर यही बालक भगवान श्रीराम का परम भक्त बना और रामायण काल में अपनी अद्भुत शक्ति, बुद्धि और समर्पण के बल पर माता सीता की खोज से लेकर लंका दहन तक कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं।
आज भी हनुमान जी को संकटमोचन के रूप में पूजा जाता है, और उनकी भक्ति करने वाले श्रद्धालु मानते हैं कि सच्चे मन से हनुमान जी का स्मरण करने पर हर संकट दूर हो जाता है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और लोक-कथाओं पर आधारित है। Haribhoomi.com किसी भी तरह की मान्यता या तथ्य की पुष्टि नहीं करती है। इन्हें केवल सूचना के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। किसी भी उपाय, व्रत या धार्मिक कर्मकांड को अपनाने से पहले संबंधित विषय के विद्वान या पंडित से सलाह अवश्य लें।