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Dhanaura Assembly Caste Equations: धनौरा विधानसभा के जातिगत समीकरण 2027

July 31, 2026

अमरोहा जिले की धनौरा विधानसभा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की महत्वपूर्ण अनुसूचित जाति आरक्षित सीटों में शामिल है। Dhanaura Assembly Caste Equations की बात करें तो मुस्लिम और अनुसूचित जाति मतदाता यहां सबसे बड़े सामाजिक समूह माने जाते हैं, जबकि सैनी, जाट, प्रजापति, गुर्जर, ब्राह्मण, वैश्य, खड़गवंशी, त्यागी और चौहान मतदाता भी चुनावी गणित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 2026 की अंतिम मतदाता सूची में धनौरा विधानसभा के 3,09,099 मतदाता दर्ज हैं। क्षेत्र में 252 मतदान केंद्र और 426 मतदेय स्थल हैं।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 राज्य के राजनीतिक भविष्य का निर्धारण करने वाला एक निर्णायक स्तंभ माना जा रहा है।

धनौरा का हालिया चुनावी इतिहास भाजपा के पक्ष में रहा है। 2012 में समाजवादी पार्टी ने सीट जीती थी, लेकिन 2017 में भाजपा के राजीव तरारा ने 38,229 वोट के बड़े अंतर से जीत दर्ज की। 2022 में उन्होंने लगातार दूसरी बार सीट जीती, हालांकि सपा ने अंतर घटाकर 11,425 वोट कर दिया। 2024 लोकसभा चुनाव में धनौरा सेगमेंट में भाजपा ने फिर बड़ी बढ़त बनाते हुए कांग्रेस को 35,021 वोट से पीछे छोड़ा।

धनौरा विधानसभा एक नजर में

विवरणजानकारी
विधानसभाधनौरा
विधानसभा संख्या39
जिलाअमरोहा
लोकसभा क्षेत्रअमरोहा
आरक्षणअनुसूचित जाति (SC)
वर्तमान विधायकराजीव तरारा
पार्टीभारतीय जनता पार्टी
2022 विजेताराजीव तरारा
2022 जीत का अंतर11,425 वोट
2026 कुल मतदाता3,09,099
मतदान केंद्र252
मतदेय स्थल426
प्रमुख सामाजिक समूहमुस्लिम, SC, सैनी, जाट, प्रजापति, गुर्जर
क्षेत्रीय चरित्रमुख्य रूप से ग्रामीण
प्रमुख मुद्देकृषि, गन्ना, रोजगार, सड़क, उद्योग, बिजली और ग्रामीण विकास

धनौरा विधानसभा अमरोहा लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। 2008 के परिसीमन के बाद इसे विधानसभा संख्या 39 मिली और सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। मौजूदा विधायक राजीव तरारा 2017 से इस सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और 2022 में लगातार दूसरी बार विधायक चुने गए।

Dhanaura Assembly Caste Equations में पुराने चुनावी आकलनों के मुताबिक मुस्लिम और अनुसूचित जाति मतदाता सबसे बड़े सामाजिक समूह हैं। पुराने अनुमान में करीब एक लाख मुस्लिम और 70 हजार SC मतदाता बताए गए थे। इसके बाद करीब 40 हजार सैनी, 35 हजार जाट और 30 हजार प्रजापति मतदाताओं की मौजूदगी का अनुमान था।

इन आंकड़ों को 2026 की मौजूदा जातिवार मतदाता संख्या नहीं माना जाना चाहिए। ये पुराने चुनावी अनुमान हैं और उस समय धनौरा में कुल मतदाता संख्या भी आज से अधिक थी। SIR 2026 के बाद मतदाता आधार में बड़ा बदलाव हुआ है और जाति या धर्म के अनुसार नई आधिकारिक विधानसभा-स्तरीय संख्या उपलब्ध नहीं है।

धनौरा विधानसभा का पुराना अनुमानित जातीय समीकरण

सामाजिक समूहपुराना अनुमानित मतदाता आधार
मुस्लिमलगभग 1,00,000
अनुसूचित जातिलगभग 70,000
सैनीलगभग 40,000
जाटलगभग 35,000
प्रजापतिलगभग 30,000
गुर्जरलगभग 8,000
ब्राह्मणलगभग 8,000
वैश्यलगभग 7,000
खड़गवंशीलगभग 7,000
त्यागीलगभग 6,000
चौहानलगभग 5,000

पुराना सामाजिक अनुमान यह जरूर बताता है कि धनौरा में किसी एक समुदाय के बूते चुनाव जीतना आसान नहीं है। मुस्लिम और अनुसूचित जाति मतदाता बड़े ब्लॉक हैं, लेकिन सैनी, जाट और प्रजापति मतदाताओं को जोड़ने पर तीसरा बड़ा चुनावी आधार तैयार हो जाता है।

2026 में धनौरा विधानसभा में 3,09,099 मतदाता

2026 की अंतिम मतदाता सूची के मुताबिक धनौरा विधानसभा में कुल 3,09,099 मतदाता हैं। जिले की चार विधानसभा सीटों में SIR के दौरान सबसे बड़ी कमी धनौरा में दर्ज हुई। प्री-SIR आधार के मुकाबले 39,706 मतदाता कम हुए।

विवरणसंख्या
2026 अंतिम मतदाता3,09,099
मतदान केंद्र252
मतदेय स्थल426
प्री-SIR से कमी39,706

2024 लोकसभा चुनाव के समय धनौरा में 3,49,678 मतदाता दर्ज थे। इससे पहले 2017 में कुल मतदाता 3,21,055 और 2012 में 2,94,201 थे। यानी लंबे समय तक वोटर संख्या बढ़ी, लेकिन 2026 SIR के बाद इसमें बड़ा उलटाव आया।

यही बदलाव 2027 की रणनीति के लिए महत्वपूर्ण है। 2022 के बूथवार वोट या पुराने एक लाख मुस्लिम और 70 हजार SC जैसे अनुमान को सीधे नई मतदाता सूची पर लागू करना वास्तविक तस्वीर नहीं देगा।

मुस्लिम मतदाता धनौरा में कितना बड़ा फैक्टर?

पुराने जातीय आकलन में धनौरा विधानसभा में लगभग एक लाख मुस्लिम मतदाता बताए गए थे। यह उन्हें सीट का सबसे बड़ा अकेला सामाजिक समूह बनाता था।

लेकिन धनौरा की राजनीति अमरोहा विधानसभा से अलग है। मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी मौजूदगी के बावजूद भाजपा ने 2017 और 2022 दोनों विधानसभा चुनाव जीते हैं और 2024 लोकसभा चुनाव में भी भाजपा प्रत्याशी ने धनौरा से बड़ी बढ़त बनाई।

इससे साफ है कि मुस्लिम मतदाता महत्वपूर्ण होने के बावजूद सीट का परिणाम केवल उनके मतदान व्यवहार से तय नहीं होता। अनुसूचित जाति, सैनी, जाट, प्रजापति और दूसरे गैर-मुस्लिम समूहों का संयुक्त वोट उससे भी बड़ा राजनीतिक ब्लॉक तैयार कर सकता है।

सपा या किसी विपक्षी दल के लिए मुस्लिम वोटों की अधिकतम एकजुटता के साथ SC और OBC मतों का अतिरिक्त हिस्सा हासिल करना जरूरी होगा।

SC आरक्षित सीट होने से दलित वोट सबसे महत्वपूर्ण

धनौरा विधानसभा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। इसलिए यहां सभी प्रमुख दलों को SC समुदाय से प्रत्याशी उतारना होता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि दलित मतदाता किसी एक पार्टी का स्थायी वोट बैंक हैं।

पुराने चुनावी अनुमान में करीब 70 हजार SC मतदाता बताए गए थे। 2011 आधारित जनसांख्यिकीय प्रोफाइल में भी विधानसभा क्षेत्र में अनुसूचित जाति आबादी की हिस्सेदारी करीब 21.22 प्रतिशत बताई गई थी। ये दोनों अलग-अलग आधार के आंकड़े हैं, लेकिन दलित समुदाय की बड़ी सामाजिक मौजूदगी की ओर संकेत करते हैं।

मौजूदा विधायक राजीव तरारा स्वयं जाटव समाज से आते हैं। भाजपा ने 2017 और 2022 दोनों चुनाव उनके नेतृत्व में जीते। इससे दलित वोट के भीतर भाजपा की पहुंच इस सीट के चुनावी गणित का अहम हिस्सा बनती है।

2027 में जाटव और दूसरे अनुसूचित जाति समूहों का वोट भाजपा, सपा और बसपा में किस तरह बंटता है, यह सीट का सबसे महत्वपूर्ण स्विंग फैक्टर हो सकता है।

बसपा का 44 हजार वोट वाला आधार क्यों महत्वपूर्ण?

2022 में बसपा के हरपाल सिंह को 43,974 वोट, यानी करीब 18.04 प्रतिशत वोट मिले थे। भाजपा और सपा के बीच जीत का अंतर सिर्फ 11,425 वोट था। इसका मतलब है कि बसपा का वोट जीत के अंतर से लगभग चार गुना था।

2022 प्रमुख दलवोटवोट शेयर
भाजपा1,03,05442.29%
सपा91,62937.60%
बसपा43,97418.04%

SC आरक्षित सीट पर बसपा का प्रदर्शन इसलिए खास महत्व रखता है। अगर पार्टी दलित मतदाताओं का बड़ा हिस्सा अपने साथ बनाए रखती है तो मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है।

इसके उलट बसपा का वोट कमजोर होने पर यही सवाल सबसे महत्वपूर्ण होगा कि उसका वोट भाजपा या सपा में किस ओर ज्यादा जाता है। 2022 के 11 हजार के अंतर को देखते हुए कुछ हजार वोटों का ट्रांसफर भी परिणाम पलट सकता है।

सैनी मतदाता गैर-यादव OBC राजनीति की बड़ी ताकत

धनौरा के पुराने सामाजिक आकलन में करीब 40 हजार सैनी मतदाता बताए गए थे। मुस्लिम और SC मतदाताओं के बाद यह सीट के सबसे महत्वपूर्ण वोट बैंक में शामिल है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सैनी समाज गैर-यादव OBC राजनीति में महत्वपूर्ण है। भाजपा के लिए सैनी मतदाताओं को दलित, जाट, प्रजापति और दूसरे गैर-मुस्लिम समूहों के साथ जोड़ना उसके सामाजिक गठबंधन को मजबूत करता है।

सपा के लिए भी 2027 में मुस्लिम मतों के साथ सैनी और दूसरे गैर-यादव OBC समूहों में समर्थन बढ़ाना जरूरी होगा।

अगर पुराने करीब 40 हजार वाले प्रभाव में किसी एक दल को बड़ी बढ़त मिलती है तो 2022 के 11,425 वोट के अंतर वाली सीट पर उसका असर स्पष्ट होगा।

जाट वोट और किसान राजनीति

पुराने अनुमान में धनौरा विधानसभा में करीब 35 हजार जाट मतदाता बताए गए थे। यह क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है और पुराने जनसांख्यिकीय प्रोफाइल में लगभग 75.19 प्रतिशत आबादी ग्रामीण बताई गई है।

क्षेत्रीय स्वरूपपुराना अनुमान
ग्रामीण75.19%
शहरी24.81%

यही वजह है कि जाट वोट को केवल जातीय संख्या से नहीं देखा जा सकता। किसान संगठन, स्थानीय पंचायत नेटवर्क और कृषि संबंधी मुद्दे इसके राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाते हैं।

गन्ना मूल्य और भुगतान, गेहूं-धान खरीद, सिंचाई, बिजली, खाद-बीज, आवारा पशु और ग्रामीण सड़क जैसे मुद्दे जाटों के साथ मुस्लिम, सैनी, प्रजापति और दलित किसान परिवारों को भी प्रभावित करते हैं।

2027 में अगर किसान मुद्दे चुनाव के केंद्र में आते हैं तो जातीय गणित के भीतर भी बदलाव संभव है।

प्रजापति वोट भी करीब 30 हजार का पुराना अनुमान

धनौरा के पुराने जातीय समीकरण में प्रजापति मतदाताओं की संख्या लगभग 30 हजार आंकी गई थी। यह सीट के उन सामाजिक समूहों में है जिनकी चर्चा बड़े वोट बैंक की तुलना में कम होती है, लेकिन चुनावी संख्या काफी महत्वपूर्ण है।

सैनी और प्रजापति मतदाताओं के पुराने अनुमान को जोड़ें तो करीब 70 हजार का बड़ा गैर-यादव OBC आधार बनता था।

इसी कारण भाजपा और सपा दोनों के लिए केवल बड़े धार्मिक या दलित वोट बैंक पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। छोटे और मध्यम OBC समूहों में चुनावी बढ़त 2027 में निर्णायक हो सकती है।

गुर्जर, ब्राह्मण, वैश्य और त्यागी भी बदल सकते हैं करीबी मुकाबला

पुराने अनुमान में धनौरा में गुर्जर और ब्राह्मण करीब 8-8 हजार, वैश्य और खड़गवंशी करीब 7-7 हजार, त्यागी करीब 6 हजार तथा चौहान लगभग 5 हजार बताए गए थे।

अलग-अलग देखें तो इनमें कोई भी वोट बैंक मुस्लिम, SC या सैनी समाज जितना बड़ा नहीं है। लेकिन इन समूहों को मिलाकर संख्या 40 हजार से अधिक हो जाती है।

भाजपा के लिए इन समुदायों का व्यापक गठजोड़ उसकी ताकत रहा है। सपा के लिए इसी सामाजिक समूह में कुछ अतिरिक्त प्रतिशत वोट हासिल करना जीत के अंतर को तेजी से कम कर सकता है।

2022 में सिर्फ 11 हजार से थोड़ा अधिक के अंतर वाली सीट में ऐसे समूहों की भूमिका इसलिए और बढ़ जाती है।

2022 में भाजपा ने 11,425 वोट से जीती धनौरा सीट

2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा के राजीव तरारा ने 1,03,054 वोट हासिल किए। समाजवादी पार्टी के विवेक सिंह को 91,629 वोट मिले।

भाजपा ने चुनाव 11,425 वोट के अंतर से जीता। बसपा के हरपाल सिंह 43,974 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे।

उम्मीदवारपार्टीवोटवोट शेयर
राजीव तराराभाजपा1,03,05442.29%
विवेक सिंहसपा91,62937.60%
हरपाल सिंहबसपा43,97418.04%
अन्यविभिन्नशेष
जीत का अंतर11,4254.69%

2022 में 70.34 प्रतिशत मतदान हुआ था। भाजपा और सपा के बीच वोट शेयर का अंतर करीब 4.7 प्रतिशत रहा।

यह 2017 की तुलना में बहुत करीबी मुकाबला था।

2017 में भाजपा ने 38,229 वोट से दर्ज की थी बड़ी जीत

2017 विधानसभा चुनाव में राजीव तरारा पहली बार भाजपा के टिकट पर विधायक चुने गए। उन्हें 1,02,943 वोट और 45.72 प्रतिशत वोट शेयर मिला।

सपा के जगराम सिंह को 64,714 वोट और बसपा के संजीव लाल को 51,952 वोट मिले थे।

भाजपा की जीत का अंतर 38,229 वोट था।

उम्मीदवारपार्टीवोटवोट शेयर
राजीव तराराभाजपा1,02,94345.72%
जगराम सिंहसपा64,71428.74%
संजीव लालबसपा51,95223.07%
कपिल चंद्ररालोद3,7471.66%
जीत का अंतर38,229

2017 और 2022 की तुलना करें तो भाजपा का वोट लगभग स्थिर रहा—1,02,943 से बढ़कर 1,03,054 हुआ। लेकिन सपा का वोट 64,714 से बढ़कर 91,629 पहुंच गया।

यानी पांच साल में भाजपा का मूल आधार लगभग जस का तस रहा, जबकि सपा ने करीब 27 हजार अतिरिक्त वोट जोड़कर मुकाबले को काफी करीबी बना दिया।

2012 में सपा ने जीती थी धनौरा

2008 के परिसीमन के बाद धनौरा का मौजूदा स्वरूप अस्तित्व में आया और 2012 में यहां पहला विधानसभा चुनाव हुआ।

समाजवादी पार्टी के माइकल चंद्र ने 55,545 वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी। बसपा के हेम सिंह को 47,916 वोट मिले। जीत का अंतर सिर्फ 7,629 वोट रहा।

चुनावविजेतापार्टीविजेता के वोटजीत का अंतर
2012माइकल चंद्रसपा55,5457,629
2017राजीव तराराभाजपा1,02,94338,229
2022राजीव तराराभाजपा1,03,05411,425

इस इतिहास में दो बातें साफ दिखाई देती हैं। पहली, भाजपा ने 2017 के बाद एक लाख से अधिक वोट का मजबूत आधार बनाया। दूसरी, 2022 में सपा भाजपा के काफी करीब पहुंच गई।

इसलिए धनौरा को भाजपा की मजबूत सीट जरूर कहा जा सकता है, लेकिन 2022 का नतीजा इसे पूरी तरह सुरक्षित सीट नहीं बनाता।

2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा की बढ़त बढ़कर 35,021 वोट

2024 लोकसभा चुनाव में धनौरा विधानसभा सेगमेंट ने भाजपा को बड़ी बढ़त दी।

भाजपा उम्मीदवार को 1,02,402 वोट, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार को 67,381 वोट मिले। बसपा को 44,324 वोट मिले।

भाजपा की बढ़त 35,021 वोट रही।

2024 लोकसभा: धनौरा सेगमेंटवोटवोट शेयर
भाजपा1,02,40246.82%
कांग्रेस67,38130.80%
बसपा44,32420.26%
भाजपा की बढ़त35,021

यह नतीजा 2022 विधानसभा चुनाव से अलग तस्वीर दिखाता है।

2022 में सपा भाजपा से सिर्फ 11,425 वोट पीछे थी। 2024 में INDIA गठबंधन की कांग्रेस धनौरा सेगमेंट में भाजपा से 35 हजार से अधिक वोट पीछे रही।

यानी भाजपा ने 2014 से लगातार लोकसभा चुनावों में इस विधानसभा सेगमेंट में बढ़त बनाए रखी है। 2019 में उसकी बढ़त बहुत कम रह गई थी, लेकिन 2024 में फिर बड़ी हो गई।

2022 और 2024 के आंकड़े क्या बताते हैं?

चुनावभाजपाप्रमुख विपक्षअंतर
विधानसभा 20221,03,054सपा 91,629भाजपा +11,425
लोकसभा 20241,02,402कांग्रेस 67,381भाजपा +35,021

दोनों चुनावों में भाजपा का वोट लगभग 1.02 से 1.03 लाख के बीच स्थिर रहा। सबसे बड़ा बदलाव विपक्ष के वोट में दिखाई देता है।

इससे भाजपा के एक मजबूत कोर वोट बैंक का संकेत मिलता है। लेकिन विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी और स्थानीय सामाजिक समीकरण अलग होते हैं, इसलिए 2024 की 35 हजार की बढ़त को सीधे 2027 पर लागू नहीं किया जा सकता।

भाजपा का मजबूत सामाजिक गणित क्या है?

2017 से लगातार दो चुनावों में भाजपा की सफलता का आधार केवल किसी एक समुदाय में नहीं देखा जा सकता।

SC आरक्षित सीट पर दलित मतदाताओं के एक हिस्से के साथ सैनी, जाट, प्रजापति, गुर्जर, ब्राह्मण, वैश्य, त्यागी और दूसरे गैर-मुस्लिम समूहों का व्यापक गठजोड़ पार्टी को एक लाख के आसपास स्थिर वोट देता दिखाई देता है।

राजीव तरारा की लगातार दो जीत उनके व्यक्तिगत राजनीतिक नेटवर्क को भी इस समीकरण में जोड़ती है।

2027 में भाजपा के लिए चुनौती पुराने सामाजिक गठबंधन को 2026 की बदली हुई वोटर लिस्ट पर कायम रखने की होगी।

सपा के लिए सीट जीतने का रास्ता कहां से निकलता है?

सपा के लिए 2022 का परिणाम सबसे बड़ा सकारात्मक संकेत है। 2017 के 64,714 वोट से बढ़कर पार्टी 2022 में 91,629 वोट तक पहुंची।

यानी सपा ने भाजपा से अंतर 38,229 से घटाकर 11,425 कर दिया।

2027 में पार्टी के लिए पहला आधार मुस्लिम वोट होगा। लेकिन सिर्फ मुस्लिम वोट से चुनाव जीतना कठिन है।

सपा को अनुसूचित जाति मतदाताओं में बड़ा हिस्सा हासिल करने के साथ सैनी, जाट, प्रजापति और दूसरे OBC समूहों में भी अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी होगी।

बसपा का कमजोर या मजबूत होना सपा के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण रहेगा, क्योंकि SC आरक्षित सीट पर बसपा के 40 हजार से अधिक वोट चुनावी समीकरण बदलने की क्षमता रखते हैं।

बसपा की वापसी से मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है

बसपा ने 2017 में 51,952 और 2022 में 43,974 वोट हासिल किए। यानी पिछले दोनों विधानसभा चुनावों में पार्टी के पास बड़ा आधार रहा है।

यह वोट मुख्य रूप से दलित आधार के साथ दूसरे समुदायों से भी आता रहा है।

2027 में यदि बसपा मजबूत SC प्रत्याशी के साथ अपना पुराना वोट बनाए रखती है तो भाजपा-सपा दोनों के लिए मुकाबला कठिन होगा।

यदि उसका वोट गिरता है तो यही तय करेगा कि सीट किस तरफ जाती है। 2022 में भाजपा-सपा के बीच सिर्फ 11 हजार वोट का अंतर था, जबकि बसपा के पास करीब 44 हजार वोट थे।

2026 SIR ने सबसे ज्यादा धनौरा का ही गणित बदला

अमरोहा जिले में 2026 SIR का सबसे बड़ा विधानसभा-स्तरीय असर धनौरा में दर्ज हुआ। प्री-SIR आधार के मुकाबले 39,706 मतदाता कम हुए और अंतिम सूची 3,09,099 पर आ गई। जिले में हसनपुर में 33,760, अमरोहा में 26,223 और नौगावां सादात में 22,574 मतदाता कम हुए।

विधानसभाSIR के बाद कमी
धनौरा39,706
हसनपुर33,760
अमरोहा26,223
नौगावां सादात22,574

धनौरा का बूथवार गणित इसलिए जिले की बाकी सीटों से ज्यादा बदल सकता है।

हालांकि मतदाता संख्या में कमी को बिना बूथ और समुदायवार आधिकारिक डेटा के किसी जाति, धर्म या राजनीतिक दल से जोड़ना उचित नहीं होगा।

2027 में इन सात जातीय समीकरणों पर रहेगी नजर

2027 के विधानसभा चुनाव में धनौरा की लड़ाई कई सामाजिक और राजनीतिक फैक्टर पर निर्भर कर सकती है।

सबसे पहला सवाल अनुसूचित जाति वोट का होगा। SC आरक्षित सीट होने के कारण प्रत्याशी की दलित समाज के भीतर स्वीकार्यता हर दल के लिए महत्वपूर्ण होगी।

दूसरा, पुराने करीब एक लाख वाले मुस्लिम वोट का रुख होगा। यदि यह वोट बड़े स्तर पर एक विपक्षी उम्मीदवार के साथ जाता है तो मुकाबला भाजपा के लिए कठिन हो सकता है।

तीसरा सैनी वोट होगा। पुराने अनुमान का 40 हजार वाला सामाजिक आधार किसी भी दल को निर्णायक बढ़त दे सकता है।

चौथा जाट और व्यापक किसान वोट है। कृषि प्रधान सीट पर स्थानीय किसान मुद्दों का सामाजिक गठबंधन पर सीधा असर पड़ सकता है।

पांचवां प्रजापति और दूसरे गैर-यादव OBC समूह होंगे। पुराने अनुमान में अकेले प्रजापति करीब 30 हजार बताए गए थे।

छठा बसपा का प्रदर्शन रहेगा। पार्टी अपने दलित आधार को बचाती है या उसका वोट भाजपा-सपा की ओर जाता है, इससे मुख्य मुकाबला तय हो सकता है।

सातवां और सबसे नया फैक्टर 2026 की 3,09,099 मतदाताओं वाली नई सूची है। करीब 40 हजार के शुद्ध बदलाव के बाद 2022 के पुराने बूथ गणित की नई सूची पर दोबारा परीक्षा होगी।

2017 में भाजपा की 38,229 वोट की जीत, 2022 में घटकर 11,425 का अंतर और 2024 लोकसभा चुनाव में फिर 35,021 वोट की बढ़त—ये तीन आंकड़े बताते हैं कि फिलहाल भाजपा का धनौरा में मजबूत चुनावी आधार है। लेकिन 2022 का करीबी मुकाबला, बड़ा बसपा वोट और बदली हुई 2026 मतदाता सूची 2027 के चुनाव को खुला और प्रतिस्पर्धी बनाए रखते हैं।

उत्तर प्रदेश की सभी सीटों की सामाजिक संरचना और चुनावी गणित जानने के लिए उत्तर प्रदेश के 403 विधानसभा के जातिगत समीकरण की विस्तृत कवरेज पढ़ी जा सकती है।

प्रत्याशियों, टिकट वितरण, गठबंधन और सीटवार राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े अपडेट के लिए 2027 के विधानसभा चुनाव की विस्तृत कवरेज पढ़ें।

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