
दूसरी शादी पर हाई कोर्ट का फैसला (MP high court Website/ Getty Image)
पहले सात फेरे लेकर जिंदगीभर साथ निभाने का वादा किया जाता है. लेकिन अगर मुश्किल वक्त में पति ही पत्नी का साथ छोड़ दे, उसकी मदद न करे और दूसरी शादी कर ले, तो क्या यह सिर्फ रिश्ते की अनबन मानी जाएगी या कानून भी इसे गंभीर मानता है? मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ कहा है कि पत्नी के साथ रेप होने के बाद उसका साथ न देना, उसका खर्च न उठाना और पहली शादी रहते दूसरी शादी कर लेना पति की क्रूरता है. अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे हालात पत्नी को छोड़ देने यानी ‘डेजर्शन’ (Desertion) की श्रेणी में भी आते हैं. इसी आधार पर कोर्ट ने पति की तलाक के आदेश के खिलाफ दायर अपील खारिज कर दी.
यह फैसला सिर्फ एक पति-पत्नी के विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बताता है कि शादी केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि मुश्किल समय में एक-दूसरे का सहारा बनने की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी भी है. अगर पति अपनी पत्नी को संकट में अकेला छोड़ देता है, उसके साथ हिंसा या अपराध होने पर उसका साथ नहीं देता और दूसरी शादी कर लेता है, तो अदालत इसे वैवाहिक क्रूरता मान सकती है. ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि भारतीय कानून में किन-किन परिस्थितियों में पति या पत्नी तलाक मांग सकते हैं और अदालत किन आधारों को तलाक के लिए पर्याप्त मानती है.
- पत्नी के रेप के बाद पति का साथ न देना मानसिक क्रूरता माना गया.
- पहली शादी रहते दूसरी शादी करना क्रूरता और परित्याग दोनों माना गया.
- हाई कोर्ट ने पति की अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट का तलाक का फैसला बरकरार रखा.
क्या था पूरा मामला?
मामले में पति-पत्नी की शादी 21 जून 2017 को आर्य समाज मंदिर में हुई थी. परिवारों के विरोध के कारण दोनों किराए के मकान में रहने लगे. पत्नी का आरोप था कि पति शराब पीकर मारपीट करता था और शादी करने का पछतावा जताता था. बाद में वह मायके लौट गई. इसी दौरान उसके साथ दूसरे व्यक्ति ने रेप किया. पत्नी का कहना था कि उसने पति से मदद मांगी, लेकिन उसने कोई साथ नहीं दिया. इतना ही नहीं, उसने पत्नी को छोड़ दिया और पहली शादी रहते दूसरी महिला से शादी कर ली.
तलाक कब-कब ले सकते हैं?
भारतीय कानून के तहत शादी टूटने का फैसला हर मामले की परिस्थितियों और सबूतों के आधार पर होता है. हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के अनुसार पति या पत्नी क्रूरता, परित्याग (बिना उचित कारण दो साल या उससे अधिक समय तक छोड़ देना), व्यभिचार, धर्म परिवर्तन, मानसिक बीमारी जैसी परिस्थितियों में तलाक की मांग कर सकते हैं. वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने समर घोष बनाम जया घोष (2007) मामले में कहा था कि मानसिक क्रूरता की कोई तय परिभाषा नहीं हो सकती.

तलाक कब कब ले सकते हैं? (Getty Image)
हर मामले में अदालत पति-पत्नी के व्यवहार, परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों को देखकर फैसला करती है. इसी सिद्धांत का हवाला देते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भी माना कि पत्नी के साथ रेप होने के बाद उसका साथ न देना, उसका खर्च न उठाना, पहली शादी रहते दूसरी शादी करना और वैवाहिक संबंध बहाल करने की कोशिश न करना मानसिक क्रूरता और परित्याग दोनों की श्रेणी में आता है.
कोर्ट ने क्या कहा?
हाई कोर्ट ने पाया कि पति ने जिरह के दौरान यह साबित नहीं किया कि उसने रेप के बाद पत्नी की मदद की थी. वह दूसरी शादी से जुड़े आरोपों का भी प्रभावी जवाब नहीं दे सका. अदालत ने कहा कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली का आदेश मिलने के बावजूद पति ने पत्नी के साथ रहने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की. इसलिए उसका व्यवहार क्रूरता और परित्याग दोनों साबित करता है.
क्या कहता है तलाक कानून?
भारत में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग वैवाहिक कानून हैं. हिंदुओं के लिए हिंदू विवाह अधिनियम, 1955, मुस्लिमों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ, ईसाइयों के लिए इंडियन डिवॉर्स लॉ एक्ट, 1869 और पारसी समुदाय के लिए पारसी मैरिज एंड डिवोर्स एक्ट लागू होता है. वहीं, अलग-अलग धर्म के लोगों या विशेष परिस्थितियों में शादी करने वालों पर स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 लागू हो सकता है. तलाक का फैसला संबंधित कानून और मामले के तथ्यों के आधार पर अदालत करती है.
तलाक से जुड़े 5 बड़े अधिकार
तलाक के दौरान पति या पत्नी को कई कानूनी अधिकार मिलते हैं. इनमें गुजारा भत्ता यानी एलिनमी, बच्चों की कस्टडी और उनसे मिलने का अधिकार, शेयर प्रॉपर्टी या आर्थिक हितों से जुड़े दावे (जहां कानून लागू हो), घरेलू हिंसा से सुरक्षा और अदालत के फैसले के खिलाफ अपील करने का अधिकार शामिल हैं. अदालत हर मामले में दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति, बच्चों के हित और उपलब्ध सबूतों को ध्यान में रखकर फैसला करती है.
आपसी सहमति से तलाक कैसे होता है?
अगर पति-पत्नी दोनों शादी खत्म करने पर सहमत हों, तो वे हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B के तहत आपसी सहमति से तलाक की संयुक्त याचिका दाखिल कर सकते हैं. अदालत यह सुनिश्चित करती है कि दोनों अपनी मर्जी से तलाक ले रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि यदि समझौते की पूरी संभावना खत्म हो चुकी हो, तो विशेष परिस्थितियों में छह महीने की ‘कूलिंग ऑफ’ अवधि भी माफ की जा सकती है.

मानसिक क्रूरता किसे माना जाता है (Getty Image)
क्या दूसरी शादी तलाक का आधार है?
यदि पहली शादी कानूनी रूप से खत्म हुए बिना पति या पत्नी दूसरी शादी कर लेते हैं, तो यह हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक का मजबूत आधार बन सकता है. पहली शादी रहते दूसरी शादी करना कानूनन अवैध माना जाता है और इससे वैवाहिक क्रूरता या अन्य कानूनी विवाद भी उत्पन्न हो सकते हैं. इसी वजह से मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में पहली शादी के दौरान दूसरी शादी को क्रूरता और परित्याग दोनों माना.

अंकिता
शिव की नगरी काशी से अपने करियर की शुरुआत करने वाली अंकिता पाण्डेय ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से पत्रकारिता में अपनी मास्टर्स की डिग्री पूरी की है. पत्रकारिता में आने के लिए उन्होंने बनारस के लोकल न्यूज पेपर "काशीवार्ता" से अपनी शुरुआत की, बाद में दिल्ली जैसे महानगरी का रुख करते हुए उन्होंने TV9 भारतवर्ष में अक्टूबर साल 2023 से जुड़ी. आज वह इस ऑर्गनाइजेशन में बतौर सब-एडिटर काम कर रही हैं. क्राइम, एंटरटेनमेंट और अन्य सभी को न्यूज के साथ विजुअल तरीके से पेश करने में रुचि है. पत्रकारिता के अलावा कविताएं लिखना, फोटोग्राफी करना और म्यूजिक का भी शौक रखती हैं.
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