
नौकरी मिली पर चैन नहीं! Image Credit source: Getty Images
बेंगलुरु का नाम सुनते ही दिमाग में दो तस्वीरें एक साथ आती हैं – चमचमाती बिल्डिंग्स, बड़ी-बड़ी टेक कंपनियां, स्टार्टअप्स का शोर और दूसरी तरफ जेब से तेजी से निकलता पैसा. आप इस शहर में कभी रहे हों या नहीं, एक बात तो आपने जरूर सुनी होगी कि ये शहर जितना कमाने का मौका देता है, उससे कहीं ज्यादा खर्च भी करवा देता है. यहां रहने का खर्च, खाने-पीने का खर्च और सबसे बड़ा, एक जगह से दूसरी जगह जाने का खर्च, सब कुछ जैसे लिमिट के बाहर चला गया है.
ऐसे में सवाल उठता है कि एक फ्रेशर, जिसकी सैलरी अभी शुरू ही हुई है, इस महंगे शहर में सुकून से कैसे जिए? इसी सवाल को एक सोशल मीडिया पोस्ट ने बड़े ही आसान तरीके से समझाया है, जो काफी वायरल भी हो रहा है. इस किस्से को शेयर किया है Kreative Kode के फाउंडर और CEO संकेत सेठ ने. उन्होंने 2024 का एक वाकया याद किया, जब उनकी कंपनी अभी नई-नई शुरू हुई थी. ऑफिस में एक फ्रेशर आया था, उम्र यही कोई 21-22 साल. बातों-बातों में जब आने-जाने के खर्च की बात निकली तो उसने जो बताया, उसने संकेत को भी हैरान कर दिया. उस लड़के ने कहा कि उसे रोज ऑफिस आने-जाने में 350 रुपये लग जाते हैं. और ये खर्च वो कोई कैब या बाइक से नहीं, बल्कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट से आकर करता था. बस, मेट्रो और आखिर में थोड़ा ऑटो, सब मिलाकर रोज का 350 रुपये.
बेंगलुरु को बदलनी होगी ये चीज?
संकेत ने हिसाब लगाया तो पता चला कि पहली नौकरी वाला एक लड़का अपनी पहली सैलरी में से 7,000 से 8,000 रुपये सिर्फ ऑफिस आने-जाने में ही फूंक दे रहा है. सोचिए, जिस सैलरी से उसने अपने लिए कुछ खरीदने, परिवार के लिए कुछ करने या थोड़ा घूमने-फिरने का सोचा होगा, उसका एक बड़ा हिस्सा तो सड़क पर ही खत्म हो जा रहा है. संकेत इस बात पर जोर देते हैं कि पहली सैलरी हर किसी के लिए एक इमोशन होती है. ये सिर्फ पैसे नहीं होते, ये आजादी होती है. पहली बार लगता है कि अब बिना किसी से पूछे अपनी पसंद की चीज खरीद सकते हैं, दोस्तों को ट्रीट दे सकते हैं, घर के लिए कुछ छोटा-मोटा ला सकते हैं, लेकिन जब उसी सैलरी का एक तिहाई हिस्सा सिर्फ इस सोच में निकल जाए कि कल ऑफिस कैसे जाऊंगा, तो वो आजादी वाली फीलिंग धीरे-धीरे बोझ बन जाती है और यही वजह है कि आज के कई युवा बेंगलुरु आने से पहले दस बार सोचते हैं. कई तो सीधे रिमोट जॉब ढूंढने लगते हैं या फिर हैदराबाद, पुणे, इंदौर जैसे थोड़े कम खर्चीले शहरों की तरफ देखने लगते हैं.
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इसमें कोई शक नहीं कि बेंगलुरु देश का सबसे तेजी से बढ़ता शहर है. यहां मौके हैं, ग्रोथ है, बड़े सपने हैं. पूरे देश से 21-22 साल के लड़के-लड़कियां इसी सपने को लेकर यहां आते हैं कि यहां करियर बनेगा, लेकिन अगर एक बेसिक चीज, जैसे ऑफिस तक पहुंचना ही इतना महंगा हो जाए कि आने से पहले सोचना पड़े, तो ये ग्रोथ किस काम की? संकेत की बात बिल्कुल सीधी है – अगर बेंगलुरु को टैलेंट का शहर बने रहना है, तो उसे अफोर्डेबल भी बनना पड़ेगा. पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बेहतर और सस्ता करना होगा, रहने की जगहों को फ्रेशर्स की पहुंच में लाना होगा.
यहां देखिए पोस्ट

आयुष कुमार
आयुष कुमार, टीवी9 डिजिटल में सीनियर सब एडिटर हैं. अशोक और चाणक्य की धरती बिहार से हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की तालीम हासिल की है. पत्रकारिता में तीन साल से तिल को बिना ताड़ बनाए किसी भी सोशल मुद्दे को 360 डिग्री समझाने की कोशिश करते हैं.<p></p> अमर उजाला, फिरकी डॉट इन से अपने पत्रकारीय सफर की शुरुआत की है. पाठकों तक सरल शब्दों में खबरें पहुंचाना उद्देश्य रहा है. लेखन की इस दुनिया में दिलचस्पी इसलिए बढ़ गई, क्योंकि बचपन से ही काफी ज्यादा बातूनी रहे हैं. <p></p>फिलहाल, टीवी9 में फीचर राइटिंग करते हुए सोशल मीडिया की नब्ज पकड़ने में माहिर हो गए है. अजीबोगरीब खबरों को गजब तरीके से लिखकर आप सबके सामने पेश करते हैं.
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