भोपाल3 घंटे पहले
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निजी नर्सिंग कॉलेजों में अनियमितताओं के बाद अब शासकीय नर्सिंग कॉलेजों की व्यवस्थाओं को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। NSUI ने प्रदेश के सरकारी नर्सिंग कॉलेजों में प्राचार्य, उप प्राचार्य और शैक्षणिक फैकल्टी की कमी के साथ-साथ मान्यता के लिए जमा कराए गए दस्तावेजों में कथित गड़बड़ियों का आरोप लगाया है। संगठन ने मामले की उच्चस्तरीय जांच और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है। इस संबंध में हाईकोर्ट में याचिका भी दायर किए जाने की जानकारी दी गई है।
रविवार को आयोजित पत्रकारवार्ता में कांग्रेस प्रवक्ता विवेक त्रिपाठी, NSUI प्रदेश उपाध्यक्ष रवि परमार, अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय और अधिवक्ता अंशुल तिवारी ने शासकीय नर्सिंग कॉलेजों की व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए।
22 सरकारी कॉलेजों ने किया था मान्यता के लिए आवेदन
NSUI प्रदेश उपाध्यक्ष रवि परमार ने दावा किया कि सत्र 2026-27 की मान्यता के लिए प्रदेश के 22 शासकीय नर्सिंग कॉलेजों ने आवेदन किया था। इनमें से तीन कॉलेजों को मान्यता नहीं मिली। इनमें भोपाल स्थित केंद्र सरकार का बीएमएचआरसी नर्सिंग कॉलेज, अमरकंटक विश्वविद्यालय अनूपपुर का शासकीय नर्सिंग कॉलेज और दतिया का शासकीय नर्सिंग कॉलेज शामिल हैं।
परमार के मुताबिक, छह शासकीय नर्सिंग कॉलेजों में प्राचार्य नहीं हैं, जबकि 10 कॉलेजों में उप प्राचार्य का पद खाली है। उन्होंने दावा किया कि 15 शासकीय नर्सिंग कॉलेजों में प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर और ट्यूटर की संख्या मध्यप्रदेश शासन के मान्यता नियम-2018 के अनुरूप नहीं है।

कांग्रेस प्रवक्ता विवेक त्रिपाठी, NSUI प्रदेश उपाध्यक्ष रवि परमार, अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय और अधिवक्ता अंशुल तिवारी ने शासकीय नर्सिंग कॉलेजों की व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए।
बीएमएचआरसी और अमरकंटक कॉलेज के दस्तावेजों पर सवाल
परमार ने आरोप लगाया कि सत्र 2026-27 की मान्यता के लिए कुछ शासकीय नर्सिंग कॉलेजों की ओर से प्राचार्य, उप प्राचार्य और एसोसिएट प्रोफेसर के कथित फर्जी या कूटरचित अनुभव प्रमाण-पत्र प्रस्तुत किए गए।
उन्होंने भोपाल के बीएमएचआरसी नर्सिंग कॉलेज का उदाहरण देते हुए आरोप लगाया कि एक असिस्टेंट प्रोफेसर को सीधे उप प्राचार्य और उप प्राचार्य को एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर दर्शाया गया। वहीं, अमरकंटक विश्वविद्यालय के नर्सिंग कॉलेज को लेकर उन्होंने दावा किया कि कॉलेज शुरू होने से पहले ही प्राचार्य के नाम पर एक साल, छह महीने और उप प्राचार्य के नाम पर तीन साल का अनुभव दर्शाया गया।
नियमों में क्या है फैकल्टी की अनिवार्यता
अधिवक्ता अंशुल तिवारी ने बताया कि मध्यप्रदेश नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता के लिए शासन के वर्ष 2018 के नियमों में फैकल्टी के संबंध में स्पष्ट प्रावधान हैं। उनके अनुसार, 30 सीटों के लिए एक प्राचार्य, एक उप प्राचार्य, दो एसोसिएट प्रोफेसर तथा तीन असिस्टेंट प्रोफेसर अथवा तीन ट्यूटर होना जरूरी है। सीटों की संख्या बढ़ने पर निर्धारित अनुपात के अनुसार फैकल्टी की संख्या भी बढ़ाई जानी होती है।
'सीबीआई जांच में सामने आई कमियों के बाद भी सुधार नहीं'
अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय ने कहा कि मध्यप्रदेश में नर्सिंग कॉलेजों की दो बार सीबीआई जांच हो चुकी है। जांच के दौरान कई शासकीय नर्सिंग कॉलेजों में भी कमियां सामने आई थीं। उनका आरोप है कि इन कमियों को दूर किए बिना ही कॉलेजों में नर्सिंग विद्यार्थियों की पढ़ाई और प्रशिक्षण जारी है।
उन्होंने कहा कि पर्याप्त शैक्षणिक फैकल्टी के बिना विद्यार्थियों का प्रशिक्षण प्रभावित होगा। इसी को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर कर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और कार्रवाई की मांग की गई है।
सरकारी कॉलेजों में ही नियमों का पालन नहीं तो निजी कॉलेजों पर सवाल क्यों?
कांग्रेस प्रवक्ता विवेक त्रिपाठी ने कहा कि प्रदेश में सरकारी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की स्थिति लगातार कमजोर की जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि शिक्षा व्यवस्था को निजी हाथों में सौंपने की दिशा में काम हो रहा है। त्रिपाठी ने कहा कि जब सरकारी नर्सिंग कॉलेजों में ही नियमों के पालन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं, तो निजी नर्सिंग कॉलेजों की व्यवस्थाओं और मान्यता प्रक्रिया पर सवाल उठाना भी जरूरी है।
विद्यार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं
NSUI नेताओं ने कहा कि नर्सिंग शिक्षा सीधे स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ी है। ऐसे में सरकारी नर्सिंग कॉलेजों में पर्याप्त प्राचार्य, उप प्राचार्य और फैकल्टी नहीं होने का सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई और प्रशिक्षण पर पड़ सकता है।
संगठन ने मान्यता प्रक्रिया, अनुभव प्रमाण-पत्रों और फैकल्टी की उपलब्धता की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। NSUI ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने मामले में तत्काल संज्ञान लेकर जांच और सुधार की कार्रवाई नहीं की तो संगठन विद्यार्थियों के साथ चरणबद्ध आंदोलन करेगा। संगठन ने कहा कि जरूरत पड़ने पर मुद्दे को सड़क से लेकर न्यायालय तक उठाया जाएगा।
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