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जब महिलाएं उतरीं सड़क पर, NEET आंदोलन से किसान आंदोलन, केन बेतवा आंदोलन और शाहीन बाग तक की लड़ाई

August 1, 2026

दिल्ली के जंतर-मंतर पर 6 जून से लेकर 26 जुलाई 2026 को NEET परीक्षा को लेकर छात्रों का बड़ा आंदोलन हुआ। इस आंदोलन को सिर्फ हजारों छात्रों की भीड़ के लिए याद नहीं किया जाएगा इस आंदोलन को उन महिलाओं और लड़कियों के लिए भी याद रखा जाएगा जिन्होंने यह साबित किया है कि किसी भी जन आंदोलन की असली ताकत उसकी भागीदारी होती है। और जब उसमें महिलाएं बराबरी से खड़ी होती हैं तो वह आंदोलन सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं रह जाता वह एक इतिहास बन जाता है।

जंतर-मंतर पर यह साफ दिखाई दिया। पुलिस की लाठियां चलीं, छात्रों को हिरासत में लिया गया, आंसू गैस छोड़ी गई लेकिन सबसे आगे खड़ी कई लड़कियां और महिलाएं पीछे नहीं हटीं। किसी ने चोट खाई, किसी ने साथियों को बचाने की कोशिश की और किसी ने गिरफ्तारी के बावजूद अपना हौसला नहीं खोया। कई छात्राएं ऐसी थीं जो अपने घर वालों को बिना बताए दिल्ली पहुंची थीं। उन्हें मालूम था कि रास्ता आसान नहीं होगा फिर भी वे आईं क्योंकि उन्हें लगा कि अपनी आवाज उठाना जरूरी है। 

इसी तरह बिहार से आई सीमा भी इस आंदोलन की उन अनगिनत महिलाओं में शामिल थीं जो बिना किसी पहचान या चर्चा की चाह के आंदोलन का हिस्सा बनीं। वह घर से बिना बताए दिल्ली पहुंचीं और पूरे आंदोलन के दौरान डटी रहीं। ऐसे कई चेहरे थे जिनके नाम शायद इतिहास की किताबों में दर्ज न हों लेकिन किसी भी आंदोलन की असली ताकत वही लोग होते हैं जो बिना किसी स्वार्थ सिर्फ अपने अधिकार के लिए संघर्ष में शामिल होते हैं। इस आंदोलन की सबसे बड़ी बात यह रही कि यहां उम्र की कोई सीमा नहीं थी। कॉलेज की छात्राओं से लेकर बड़ी उम्र की महिलाएं तक हर पीढ़ी की महिलाएं से इस आंदोलन में शामिल थीं। यही वजह है कि यह आंदोलन सिर्फ छात्रों का आंदोलन नहीं रहा और महिलाओं की भागीदारी का भी एक मजबूत उदाहरण बन गया।

इसी आंदोलन से एक नाम पूरे देश में उभरकर सामने आया नेहा बोरा। 26 जुलाई 2026 का जंतर-मंतर आंदोलन जब भी याद किया जाएगा नेहा बोरा का नाम भी उसके साथ लिया जाएगा। AISA की अध्यक्ष नेहा बोरा ने अपने भाषणों, लगातार संघर्ष और 23 दिनों की भूख हड़ताल के जरिए लाखों युवाओं का ध्यान अपनी ओर खींचा। जंतर-मंतर पर हजारों छात्र मौजूद थे लेकिन एक जगह ऐसी थी जहां हर दिन छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता, कलाकार और कई सार्वजनिक हस्तियां पहुंच रही थीं। वह जगह थी जहां नेहा बोरा अनशन पर बैठी थीं।

नेहा बोरा फोटो साभार:ANI                                    

20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुए पुलिस लाठीचार्ज के बाद उनका भाषण सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। मंच से उन्होंने कहा था “हमारी चोटें हिंसा की गवाही देंगी, सब याद रखा जाएगा।” यह उन छात्रों की पीड़ा को सामने लाने की कोशिश थी जो पुलिस कार्रवाई में घायल हुए थे। नेहा ने आरोप लगाया कि भूख हड़ताल पर बैठे कई छात्र ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे फिर भी उन पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए। उनका कहना था कि छात्रों के शरीर पर पड़े घाव इस संघर्ष की कहानी हमेशा सुनाते रहेंगे। उनका एक और बयान “दिल्ली पुलिस की दहशतगर्दी हम याद रखेंगे” भी पूरे देश में चर्चा का विषय बना।

आज नेहा बोरा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स में पीएचडी कर रही हैं। पढ़ाई के साथ-साथ वह लंबे समय से छात्र आंदोलनों और सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय रही हैं। लेकिन जंतर-मंतर के इस आंदोलन ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान दी।

और भारत का इतिहास गवाह है कि यह पहली बार नहीं होगा जब महिलाओं ने विरोध की लौ को जलता रखने में मदद की हो।

केन बेतवा लिंक परियोजना और महिलाओं की लड़ाई 

मध्य प्रदेश बुंदेलखंड के छतरपुर जिले के ढोढन क्षेत्र में केन–बेतवा परियोजना के तहत बनने वाले बांध से दर्जनों गांवों के उजड़ने का खतरा है। अपने घर, खेत, जंगल और पुश्तैनी जमीन को बचाने के लिए यहां के लोग लंबे समय से आंदोलन कर रहे हैं। इस आंदोलन की सबसे मजबूत तस्वीर यहां की महिलाएं हैं। सुबह घर और बच्चों की जिम्मेदारी निभाने के बाद वे आंदोलन स्थल पर पहुंचती हैं। कभी धरने पर बैठती हैं, कभी पानी में उतरकर विरोध करती हैं तो कभी अनशन पर बैठ जाती हैं। कई महिलाएं अपने छोटे-छोटे बच्चों को गोद में लेकर आंदोलन में शामिल होती हैं। उनके लिए यह सिर्फ जमीन बचाने की लड़ाई नहीं रही अब ये लड़ाई उनके आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने की लड़ाई है। इन्हीं महिलाओं के बीच 24 वर्षीय दिव्या अहिरवार भी इस आंदोलन की एक मजबूत आवाज बनकर उभरी हैं। दिव्या कहती हैं कि यहां का जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं आदिवासी समुदाय की जिंदगी और रोजी-रोटी का आधार है। जंगल से ही लोगों को भोजन, ईंधन, चारा और रोजगार मिलता है। इसलिए जब जंगल और जमीन पर संकट आता है तो सबसे पहले महिलाओं की जिंदगी प्रभावित होती है। 

केन बेतवा आंदोलन में महिलाएं फोटो साभार: खबर लहरिया                                    

दिव्या बताती हैं कि उन्होंने अपनी आंखों के सामने गांव की महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए डटकर लड़ते देखा है। वे कहती हैं “हमारी महिलाएं अब सिर्फ घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं हैं। वे अपने हक की लड़ाई खुद लड़ रही हैं। चाहे धरना हो अनशन हो या पानी में खड़े होकर विरोध करना वे हर मोर्चे पर बराबरी से खड़ी हैं।” दिव्या का मानना है कि इन महिलाओं का संघर्ष सिर्फ विस्थापन तक सीमित नहीं है। वे रोजमर्रा की जिंदगी में आर्थिक तंगी, घरेलू हिंसा और सामाजिक दबाव जैसी कई मुश्किलों का सामना करती हैं। इसके बावजूद वे जंगल से मिलने वाले संसाधनों के सहारे अपने परिवार को संभालती हैं और हर चुनौती का सामना करती हैं।

पंजाब किसान आंदोलन में महिलाएं 

किसान आंदोलन (2020–21) में महिलाओं की भागीदारी ने यह दिखाया कि खेती और किसानों के संघर्ष में उनकी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों से हजारों महिलाएं दिल्ली की सीमाओं तक पहुंचीं और करीब एक साल तक आंदोलन में डटी रहीं। उन्होंने धरनों में हिस्सा लिया ट्रैक्टर रैलियों में शामिल हुईं मंच से अपनी बात रखी और कृषि कानूनों के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई। आंदोलन के दौरान महिलाओं ने भोजन, चिकित्सा और अन्य व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी संभालने के साथ-साथ नेतृत्व की भूमिका भी निभाई। इस आंदोलन में उनकी सक्रिय मौजूदगी ने यह साबित किया कि खेती में महिलाओं का योगदान केवल खेतों तक सीमित नहीं है वे अपने अधिकारों और किसानों के भविष्य के लिए भी मजबूती से लड़ सकती हैं। इसी संघर्ष और एकजुटता को आगे बढ़ाते हुए पंजाब में महिला किसान यूनियन (MKU) का गठन किया गया। महिला दिवस के अवसर पर बनी इस यूनियन की पहली प्रदेश अध्यक्ष राजविंदर कौर राजू बनीं। इस संगठन का उद्देश्य महिला किसानों को एक मंच देना और खेती, जमीन, मुआवजे तथा उनके अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर उनकी आवाज को और मजबूत करना है।

पंजाब किसान आंदोलन में महिलाएं फोटो साभार: न्यूज़ क्लिक                                                   

सीएए एनआरसी (CAA NRC) में महिलाएं 

साल 2020 में दिल्ली का शाहीन बाग आंदोलन महिलाओं के नेतृत्व वाले सबसे चर्चित आंदोलनों में शामिल रहा। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के विरोध में सैकड़ों महिलाएं 15 दिसंबर 2019 से लगातार शाहीन बाग में धरने पर बैठीं और कई महीनों तक अपना प्रदर्शन जारी रखा। कड़ाके की ठंड, बारिश और तमाम मुश्किलों के बावजूद उनका हौसला नहीं डगमगाया। छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्ग महिलाओं तक, हर उम्र की महिलाएं इस आंदोलन का हिस्सा बनीं। कई महिलाएं पहली बार अपने घरों से निकलकर किसी जन आंदोलन में शामिल हुई थीं। उनका कहना था कि वे अपने और आने वाली पीढ़ियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए सड़क पर उतरी हैं। शाहीन बाग का यह आंदोलन देशभर में महिलाओं की लोकतांत्रिक भागीदारी का प्रतीक बन गया और इसके बाद कई राज्यों में भी महिलाओं ने इसी तरह शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए। यह आंदोलन आज भी इस बात की मिसाल माना जाता है कि जब महिलाएं किसी मुद्दे को अपना संघर्ष मान लेती हैं तो उनका धैर्य, एकजुटता और शांतिपूर्ण प्रतिरोध के साथ उन्हें आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। इस आंदोलन में एक बार फिर महिलाओं ने अपना नाम इतिहास में दर्ज करवा लिया था। 

CAA NRC में महिलाएं फोटो साभार: खबर लहरिया                                                

6 साल तक अनशन पर रहीं इरोम शर्मिला

भारत में महिलाओं के आंदोलनों की बात हो और इरोम शर्मिला का नाम न आए ऐसा संभव नहीं। वो अलग बात है कि कई लोग इनके बारे में इनके आंदोलन के बारे में जानते ही नहीं। मणिपुर की रहने वाली इरोम शर्मिला ने साल 2000 में मालोम में सुरक्षाबलों की गोलीबारी में 10 आम नागरिकों की मौत के बाद सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम (AFSPA) के खिलाफ ऐसा शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू किया जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। मणिपुर की रहने वाली इरोम शर्मिला एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जिन्हें उनके अडिग हौसले के कारण ‘आयरन लेडी ऑफ मणिपुर’ कहा जाता है। उनका नाम दुनिया की सबसे लंबी भूख हड़ताल करने वालों में दर्ज है। उन्होंने यह लड़ाई अपने लिए नहीं बल्कि मणिपुर के आम लोगों के अधिकारों के लिए लड़ी।उन्होंने 5 नवंबर 2000 से लगातार करीब 16 साल तक भूख हड़ताल की। इस दौरान उन्होंने अपनी इच्छा से मुंह से एक निवाला तक नहीं खाया। 

इरोम शर्मिला फोटो साभार: डाउन टु अर्थ                                             

सरकार ने उन्हें कई बार गिरफ्तार किया और अस्पताल में नाक के जरिए ट्यूब लगाकर तरल आहार दिया जाता रहा लेकिन उन्होंने अपना आंदोलन नहीं छोड़ा। उनका कहना था कि जब तक मणिपुर के लोगों को इस कानून से राहत नहीं मिलेगी तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा। इरोम शर्मिला का यह आंदोलन सिर्फ एक कानून को हटाने की मांग नहीं था न्याय, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक विरोध की एक मजबूत मिसाल बन गया। उन्होंने यह साबित किया कि एक महिला का शांतिपूर्ण लेकिन अडिग संघर्ष भी सत्ता को लंबे समय तक जवाब देने के लिए मजबूर कर सकता है। आज भी उनका नाम भारत की उन महिलाओं में लिया जाता है जिन्होंने अपने साहस, धैर्य और संकल्प से आंदोलन की एक नई पहचान बनाई।

नर्मदा बचाओ आंदोलन 

महिलाओं के नेतृत्व वाले आंदोलनों में नर्मदा बचाओ आंदोलन भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसकी शुरुआत वर्ष 1985 में सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने नर्मदा नदी पर बन रहे बड़े बांधों के विरोध में की थी। इस आंदोलन में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के हजारों विस्थापित परिवार शामिल हुए जिनमें बड़ी संख्या महिलाओं की थी। उन्होंने अपने घर, खेत, जंगल और आजीविका को बचाने के लिए लंबे समय तक शांतिपूर्ण तरीके से संघर्ष किया। महिलाएं धरनों पर बैठीं, भूख हड़ताल की और कई बार पानी में घंटों खड़े होकर ‘जल सत्याग्रह’ भी किया। उनका कहना था कि विकास के नाम पर लोगों को उनकी जमीन और पहचान से बेघर नहीं किया जा सकता। इस आंदोलन ने देश और दुनिया का ध्यान विस्थापन और पुनर्वास के मुद्दे की ओर खींचा और यह आज भी महिलाओं के साहस, धैर्य और अधिकारों की लड़ाई का एक मजबूत उदाहरण माना जाता है।

मेधा पाटकर फोटो साभार: हिंदुस्तान टाइम्स

तमिलनाडु का परमाणु विरोध प्रदर्शन 

महिलाओं के नेतृत्व वाले आंदोलनों में कुडनकुलम परमाणु विरोधी आंदोलन भी एक अहम उदाहरण है। तमिलनाडु के इदिंथकारई गांव की मछुआरा समुदाय की महिलाएं 1980 के दशक से कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र का विरोध कर रही हैं। उनका मानना था कि इस परियोजना से समुद्र, पर्यावरण, आजीविका और लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। साल 2011 में जापान के फुकुशिमा परमाणु हादसे के बाद यह आंदोलन और तेज हुआ। इस संघर्ष में अलग-अलग धर्मों की महिलाओं ने एकजुट होकर अहिंसक तरीके से अपनी आवाज उठाई। आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि महिलाओं ने अपने परिवार, बच्चों और भविष्य की सुरक्षा के लिए इस लड़ाई को मजबूती से आगे बढ़ाया और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। 

चिपको आंदोलन 

अब अगर थोड़ा और इतिहास की ओर जाएँ और भारत में महिलाओं के नेतृत्व वाले आंदोलनों की बात हो तो चिपको आंदोलन का नाम सबसे पहले लिया जाता है। साल 1973 में उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) के हिमालयी इलाकों में जब जंगलों की कटाई शुरू हुई तब गांव की महिलाओं ने पेड़ों को बचाने के लिए उन्हें अपनी बाहों में लपेट लिया। ‘चिपको’ का अर्थ ही है गले लगाना। महिलाएं लगातार कई दिनों तक पेड़ों से चिपकी रहीं ताकि कोई उन्हें काट न सके। यह आंदोलन जंगल बचाने के साथ-साथ अपनी जमीन, पानी, जंगल और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने की लड़ाई भी थी। महिलाओं के इस शांतिपूर्ण लेकिन मजबूत विरोध ने पूरे देश का ध्यान खींचा और धीरे-धीरे यह आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर फैल गया। इस आंदोलन के दबाव का ही असर था कि 1980 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उत्तर प्रदेश के हिमालयी क्षेत्रों में व्यावसायिक पेड़ों की कटाई पर 15 वर्षों के लिए प्रतिबंध लगा दिया। चिपको आंदोलन आज भी इस बात की मिसाल माना जाता है कि जब महिलाएं किसी जनहित के मुद्दे पर एकजुट होकर खड़ी होती हैं तो उनका संघर्ष बड़े से बड़ा फैसला बदलने की ताकत रखता है।

चिपको आंदोलन में पेड़ों से चिपकी महिलाएं फोटो साभार: द प्रिंट                                                                                                                                       

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब किसी आंदोलन में महिलाओं ने सबसे आगे खड़े होकर इतिहास लिखा हो। भारत का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। चाहे स्वतंत्रता आंदोलन हो उत्तराखंड का चिपको आंदोलन, 2012 का निर्भया आंदोलन, नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ प्रदर्शन, किसान आंदोलन, जंतर-मंतर के अलग-अलग धरने हों या हाल के कई जन आंदोलन हर दौर में महिलाओं ने सिर्फ भागीदारी नहीं निभाई हैं वे आंदोलनों को दिशा और मजबूती भी दी है। सच तो यह है कि घर संभालने वाली यही महिलाएं जब सड़क पर उतरती हैं तो आंदोलन का स्वर बदल जाता है। वे सिर्फ अपने अधिकारों के लिए नहीं लड़तीं वे आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए भी आवाज़ उठाती हैं। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज तक महिलाओं ने बार-बार साबित किया है कि साहस किसी एक लिंग की पहचान नहीं होता। आने वाले वर्षों में जब इस संघर्ष को याद किया जाएगा तो सिर्फ नारे, भाषण या पुलिस कार्रवाई ही याद नहीं आएगी। उन लड़कियों और महिलाओं की तस्वीरें भी याद आएंगी जिन्होंने डर के बावजूद सड़क पर खड़े होकर यह संदेश दिया कि जब न्याय की लड़ाई होती है तो महिलाएं सिर्फ दर्शक नहीं होतीं वे हमेशा उस लड़ाई की सबसे मजबूत आवाज बनकर सामने आती हैं।

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