Published: Thursday, October 8, 2026, 14:00 [IST]
Nana Patekar Secrets: बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 साल की उम्र में निधन हो गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, गुरुवार (8 अक्टूबर) सुबह गोवा के डोना पाउला स्थित उनके घर पर वह बेहोश मिले थे। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने करीब 45 मिनट तक CPR देकर उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका।
करीब पांच दशक लंबे फिल्मी करियर में नाना पाटेकर ने अभिनय की ऐसी छाप छोड़ी, जिसे हिंदी सिनेमा में लंबे समय तक याद किया जाएगा। 'गमन', 'अंकुश', 'परिंदा', 'क्रांतिवीर', 'तिरंगा', 'अब तक छप्पन', 'अपहरण' और 'वेलकम' जैसी फिल्मों में उनके अलग-अलग किरदारों ने दर्शकों के बीच खास पहचान बनाई। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस अभिनेता की आवाज और संवाद अदायगी कभी उनकी पहचान बन गई थी, उन्होंने अपना सफर महज 13 साल की उम्र में फिल्मी पोस्टर पेंट करने से शुरू किया था? उस वक्त उनकी महीने की कमाई सिर्फ 35 रुपये थी। आइए आपको रूबरू कराते हैं कि कैसे नाना बने एक्टर?

13 साल की उम्र में शुरू किया काम
नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ गजानन पाटेकर था। उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में हुआ था। उनका बचपन आर्थिक परेशानियों के बीच गुजरा। उनके पिता टेक्सटाइल पेंटिंग का छोटा कारोबार चलाते थे। बताया जाता है कि नाना जब करीब 13 साल के थे, तब उनके पिता के साथ धोखाधड़ी हुई और कारोबार अचानक बंद हो गया। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि संपत्ति तक बेचनी पड़ी। ऐसे समय में नाना ने परिवार की मदद के लिए कम उम्र में काम करना शुरू किया। वह दिन में स्कूल जाते और शाम को मुंबई में फिल्मी पोस्टर पेंट करते थे।
नाना ने एक इंटरव्यू में बताया था कि इस काम के लिए उन्हें करीब 35 रुपये महीने मिलते थे। पोस्टर पेंट करने की जगह उनके घर से लगभग 8 किलोमीटर दूर थी। यानी रोज आने-जाने में करीब 16 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। हालात ऐसे थे कि कई बार खाने तक के पैसे नहीं होते थे। नाना ने अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताया था कि वह कभी-कभी लंच या डिनर के समय दोस्तों के घर इस उम्मीद में पहुंच जाते थे कि कोई उन्हें खाना खाने के लिए पूछ ले।
जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में पढ़ाई
नाना ने मुंबई के जेजे. स्कूल ऑफ आर्ट्स से कमर्शियल आर्ट्स की पढ़ाई की। पढ़ाई के बाद उन्होंने एक विज्ञापन कंपनी में नौकरी भी की, लेकिन उनका मन थिएटर में ज्यादा लगता था। इसी दौरान उन्होंने नौकरी छोड़कर थिएटर का रुख किया। कला और अभिनय के प्रति उनका झुकाव धीरे-धीरे मजबूत होता गया। बताया जाता है कि कॉलेज के दिनों में उनके डीन उन्हें सरकारी विज्ञापनों और पेंटिंग से जुड़े काम देते थे। यहां तक कि जेब्रा क्रॉसिंग पेंट करने के बदले भी उन्हें पैसे मिलते थे। नाना के मुताबिक, उस समय ऐसे काम से उन्हें करीब 15 रुपये मिल जाते थे, जो उनके लिए काफी मायने रखते थे।
बचपन से ही था बगावती तेवर
नाना पाटेकर के व्यक्तित्व में बगावती तेवर बचपन से दिखाई देते थे। वह शरारती भी थे। उनकी शरारतों से परेशान होकर उनकी मां ने उन्हें छठी कक्षा के बाद अपनी बहन के गांव भेज दिया था। नाना कुछ समय मौसी के घर रहे, लेकिन बाद में उन्हें वापस मुंबई भेज दिया गया। बचपन में नाना खुद को अपने भाइयों से कमतर समझते थे। उन्हें लगता था कि उनके पिता दूसरे भाइयों को ज्यादा महत्व देते हैं। लेकिन गांव में होने वाले नाटकों में जब नाना हिस्सा लेते थे, तो उनके पिता उन्हें देखने मुंबई से गांव तक पहुंचे। यही वह मौका था जब नाना को महसूस हुआ कि उनके पिता भी उनकी कला और प्रतिभा को समझते हैं।

पिता के लिए कुछ नहीं कर पाने का रहा मलाल
नाना पाटेकर ने अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए कई बार पिता का जिक्र किया था। उन्हें इस बात का अफसोस था कि वह अपनी कमाई का एक रुपया भी अपने पिता के हाथ पर नहीं रख पाए। नाना के मुताबिक, उनके पिता का निधन मुंबई के म्युनिसिपल कॉरपोरेशन अस्पताल में हुआ था। उस समय उनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि पिता की दवाइयों के लिए भी पैसे नहीं थे। मुश्किल वक्त में उनके दोस्तों ने उनकी मदद की थी।यही संघर्ष आगे चलकर नाना के व्यक्तित्व और अभिनय का हिस्सा बन गया।
रेपिस्ट का मिला बड़ा किरदार, गुस्सा गए थे नाना पाटेकर
थिएटर में अपनी पहचान बनाने के बाद नाना पाटेकर के लिए फिल्मों के दरवाजे खुलने लगे। अभिनेत्री स्मिता पाटिल ने उन्हें बीआर चोपड़ा के बेटे रवि चोपड़ा से मिलने के लिए भेजा था। रवि चोपड़ा उस समय फिल्म 'आज की आवाज' बना रहे थे। उन्होंने नाना को एक रेपिस्ट का किरदार ऑफर किया। यह प्रस्ताव सुनकर नाना नाराज हो गए। उन्होंने साफ कह दिया कि वह ऐसा किरदार नहीं करेंगे। हालांकि, बाद में स्मिता पाटिल ने दोनों के बीच बातचीत कराई और रवि चोपड़ा ने उन्हें फिल्म में मुख्य विलेन का रोल ऑफर किया। नाना ने इस रोल के लिए भी अपनी शर्त रख दी। उन्होंने कहा कि वह किरदार करेंगे, लेकिन उसे अपने तरीके से निभाएंगे और अपने किरदार को खुद तैयार करेंगे। यहीं से फिल्मों में उनकी अलग पहचान बनने की शुरुआत हुई।
'परिंदा' के सेट पर डायरेक्टर से हुआ झगड़ा
नाना पाटेकर के करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक 'परिंदा' थी। 1989 में रिलीज हुई इस फिल्म में उन्होंने खतरनाक विलेन अन्ना का किरदार निभाया था। फिल्म की शूटिंग के दौरान नाना और निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा के बीच विवाद भी हुआ था। विधु विनोद चोपड़ा ने बाद में एक टीवी कार्यक्रम में इस घटना का जिक्र किया था। बताया गया कि एक सीन में नाना लगातार गालियां दे रहे थे। इसी बात को लेकर दोनों के बीच बहस बढ़ गई। मामला इतना बढ़ा कि दोनों के बीच हाथापाई जैसी स्थिति बन गई। लेकिन इसी विवाद के तुरंत बाद शूट किया गया एक सीन फिल्म के यादगार दृश्यों में शामिल हो गया। बाद में दोनों के बीच सुलह हो गई।
'परिंदा' के क्लाइमैक्स में सच में झुलस गए थे नाना
'परिंदा' का क्लाइमैक्स नाना पाटेकर के करियर के सबसे खतरनाक शूटिंग अनुभवों में से एक था। इस सीन में उनके किरदार को आग में जलते हुए दिखाया गया था। उस दौर में आज की तरह विजुअल इफेक्ट्स और आर्टिफिशियल फायर का इस्तेमाल आम नहीं था। शूटिंग में वास्तविक आग का इस्तेमाल किया गया था। निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा ने नाना को सुरक्षा के लिए शरीर ढकने को कहा था। लेकिन नाना का मानना था कि इससे अभिनय स्वाभाविक नहीं लगेगा। शूटिंग के दौरान आग की लपटें उनके शरीर तक पहुंच गईं और वह गंभीर रूप से झुलस गए। उनके हाथ-पैर की त्वचा तक बुरी तरह प्रभावित हुई। उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस हादसे के बाद नाना कुछ समय तक फिल्मों से दूर रहे।
₹35 से शुरू हुआ सफर, करोड़ों की फीस तक पहुंचा
नाना पाटेकर की कहानी सिर्फ एक अभिनेता के संघर्ष की कहानी नहीं है। यह उस दौर के एक ऐसे कलाकार की कहानी है, जिसने आर्थिक तंगी, छोटे-मोटे काम और लगातार संघर्ष से निकलकर हिंदी सिनेमा में अपनी जगह बनाई। कभी परिवार का पेट पालने के लिए ₹35 महीने में फिल्मी पोस्टर पेंट करने वाले नाना आगे चलकर ऐसे अभिनेता बने जिनकी अदाकारी के लिए निर्माता बड़ी रकम खर्च करने को तैयार रहते थे। उनकी आवाज, संवाद बोलने का अंदाज और तीखे तेवर उनकी पहचान बन गए। 'क्रांतिवीर', 'तिरंगा', 'परिंदा', 'अब तक छप्पन', 'अपहरण' और 'वेलकम' जैसी फिल्मों ने उनके स्टारडम को और मजबूत किया। नाना पाटेकर ने साबित किया कि बॉलीवुड में पहचान सिर्फ ग्लैमर से नहीं बनती। कई बार संघर्ष, प्रतिभा और अपने काम के प्रति जुनून किसी कलाकार को ऐसी जगह पहुंचा देता है, जहां उसकी पहचान किसी फिल्म या किरदार से कहीं बड़ी हो जाती है।