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Mental Health Myths: मानसिक पीड़ा को लेकर 5 बड़ी गलतफहमियां, जानिए मिथक और तथ्य में क्या है अंतर

September 9, 2026

September 9, 2026

Mental Health Myths: मानसिक पीड़ा को लेकर 5 बड़ी गलतफहमियां, जानिए मिथक और तथ्य में क्या है अंतर

Mental Health: किसी व्यक्ति की सेहत का आकलन केवल उसकी शारीरिक स्थिति से नहीं किया जा सकता, क्योंकि मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य भी उतना ही अहम है। मानसिक परेशानियों को लेकर लोगों के बीच बनी गलत धारणाएं कई बार समस्या को समझने में बाधा बनती हैं। आत्महत्या जैसे नाजुक विषय पर बातचीत से बचना स्थिति को और गंभीर बना सकता है, क्योंकि परेशान व्यक्ति अपनी भावनाएं किसी के सामने रखने में हिचक सकता है। ऐसे में सही जानकारी फैलाना और मुश्किल दौर से गुजर रहे व्यक्ति के साथ संवेदनशील व्यवहार करना जरूरी हो जाता है।

आत्महत्या को लेकर एक आम सोच है कि इसके बारे में बोलने वाला व्यक्ति केवल दूसरों का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहता है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, उत्तर प्रदेश ने एक्स पर जारी जानकारी में इस धारणा को गलत बताया है। भावनात्मक संकट में मौजूद व्यक्ति अपने मन में चल रहे आत्महत्या के विचारों का खुलकर जिक्र कर सकता है या फिर उसके व्यवहार में इसके संकेत नजर आ सकते हैं। इसलिए ऐसी बात सुनने या संकेत मिलने पर उसे नजरअंदाज करने के बजाय तुरंत गंभीरता से लेना चाहिए।

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एक दूसरी धारणा यह है कि आत्महत्या के बारे में सवाल करने से व्यक्ति के मन में खुदकुशी का विचार आ सकता है। हालांकि, संवेदनशील और शांत तरीके से इस मुद्दे पर बात करना व्यक्ति को अपनी परेशानी साझा करने में मदद कर सकता है। बातचीत के दौरान दोष देने या फैसला सुनाने के बजाय उसकी भावनाओं को समझने की कोशिश करनी चाहिए। कई बार संकट से जूझ रहे इंसान को तत्काल किसी समाधान की तुलना में पहले ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है, जो उसकी पूरी बात बिना टोके सुन सके।

यह सोच भी सही नहीं है कि आत्महत्या के विचार रखने वाला हर व्यक्ति अपनी जिंदगी खत्म करने का पक्का फैसला कर चुका होता है। अत्यधिक भावनात्मक पीड़ा के बीच व्यक्ति के मन में जीवन और मृत्यु को लेकर विरोधाभासी भावनाएं पैदा हो सकती हैं। ऐसी परिस्थिति में मिला सही सहयोग उसके लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। भरोसेमंद व्यक्ति का साथ और समय पर मिलने वाली विशेषज्ञ सहायता संकट को कम करने में मदद कर सकती है।

आत्महत्या के बारे में एक और मिथक यह है कि ऐसी घटना हमेशा अचानक होती है और उससे पहले व्यक्ति कोई संकेत नहीं देता। कई परिस्थितियों में परेशानी व्यक्ति के व्यवहार में पहले ही दिखाई देने लगती है। लगातार मायूस रहना, सामाजिक संपर्क कम करना, जरूरत से ज्यादा गुस्सा या चिड़चिड़ापन दिखाना, अचानक व्यवहार बदलना और मौत से संबंधित बातें करना ऐसे संकेत हो सकते हैं जिन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए। इसके अलावा आत्महत्या का संबंध केवल मानसिक बीमारी से जोड़ना भी सही नहीं है, क्योंकि इसके पीछे व्यक्तिगत, सामाजिक, जैविक, मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक और परिस्थितियों से जुड़े कई कारण हो सकते हैं।

किसी व्यक्ति के व्यवहार में ऐसे बदलाव दिखाई दें तो उसकी परेशानी को नजरअंदाज करने के बजाय उसके करीब रहना और बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहिए। उसकी बात सुनते समय आलोचना या आरोप लगाने से बचें और जरूरत पड़ने पर उसे मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ तक पहुंचने के लिए प्रोत्साहित करें। अगर तत्काल आत्म-हानि का खतरा महसूस हो, तो व्यक्ति को अकेला न छोड़ें और तुरंत स्थानीय आपातकालीन सहायता या नजदीकी स्वास्थ्य सेवा से संपर्क करें। मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए टोल-फ्री नंबर 14416 पर भी मदद ली जा सकती है।