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हिंदी में MBBS का प्रयोग कितना सफल? 4 साल बाद गोदामों में धूल खा रहीं ₹9 करोड़ की किताबें; 90% छात्रों ने चुनी अंग्रेजी

September 14, 2026

हिंदी दिवस आते ही हिंदी के सम्मान, उसके प्रचार और उसे बढ़ावा देने की बातें तेज हो जाती हैं. लेकिन मध्य प्रदेश में हिंदी को उच्च शिक्षा की भाषा बनाने के प्रयोग की जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कह रही है. साल 2022 में मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बना था, जहां MBBS की पढ़ाई हिंदी में शुरू करने का बड़ा ऐलान हुआ. हिंदी में मेडिकल की किताबें तैयार हुईं, उनका विमोचन हुआ और इसे हिंदी को उच्च शिक्षा से जोड़ने की दिशा में बड़ा कदम बताया गया. लेकिन चार साल बाद सवाल है, इन किताबों का हुआ क्या?

आज जिन किताबों को मेडिकल कॉलेजों और लाइब्रेरी में छात्रों के हाथों में होना चाहिए था, उनमें से बड़ी संख्या गोदामों में धूल खा रही है. अंग्रेजी की टेक्निकल किताबों का हिंदी में अनुवाद कराया गया. विशेषज्ञों को भुगतान किया गया. प्रिंटिंग पर खर्च हुआ. प्रकाशकों ने बड़े निवेश के साथ किताबें तैयार कीं. लेकिन किताबें तैयार होने के बाद सबसे बड़ा सवाल सामने आया इन्हें पढ़ेगा कौन? मांग नहीं बनी और प्रकाशकों का पैसा स्टॉक में फंस गया.

₹12-13 करोड़ लगाए, ₹9 करोड़ का स्टॉक अब भी गोदाम में

भोपाल के प्रकाशक मनीष जैन का परिवार 1962 से किताबों के कारोबार में है. साल 2022 में जब सरकार की ओर से हिंदी में मेडिकल की किताबें प्रकाशित करने का काम मिला तो उन्होंने इसे हिंदी तकनीकी शिक्षा के नए बाजार की शुरुआत माना. उन्होंने करीब ₹12 से ₹13 करोड़ का निवेश किया और लगभग 5 हजार किताबें प्रकाशित कीं. लेकिन चार साल बाद तस्वीर उलट है.

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मनीष जैन के मुताबिक, करीब ₹9 करोड़ की लगभग 2500 किताबें अब भी बिना बिके गोदाम में पड़ी हैं. मेडिकल कॉलेजों से किताबों की मांग कम होने के बाद नया स्टॉक छापना भी मुश्किल हो गया. जिस कारोबार को हिंदी मेडिकल शिक्षा के विस्तार से बढ़ने की उम्मीद थी, उसी प्रकाशक को अब फिर अंग्रेजी की पाठ्यपुस्तकों के कारोबार पर लौटना पड़ रहा है. यानी हिंदी में मेडिकल शिक्षा का सपना तो बड़ा था, लेकिन किताबों का बाजार तैयार नहीं हो पाया. देखें VIDEO:- 

सिर्फ किताबें नहीं, छात्र भी नहीं!

मामला सिर्फ प्रकाशकों के फंसे हुए पैसे तक सीमित नहीं है. हिंदी माध्यम से इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई शुरू करने के दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल छात्रों की पसंद को लेकर है. छात्रों के सामने सिर्फ डिग्री हासिल करने का सवाल नहीं है. उन्हें आगे की पढ़ाई, नौकरी और करियर की चिंता है. पोस्ट ग्रेजुएशन, रिसर्च, मेडिकल साइंस की किताबें, इंटरनेशनल जर्नल्स और ग्लोबल अकादमिक दुनिया, इन सभी जगहों पर अंग्रेजी का दबदबा कायम है. ऐसे में छात्र के सामने सवाल है आज हिंदी में पढ़ें या उस भाषा में पढ़ें जिसमें कल अपना करियर बनाना है?

मध्य प्रदेश में हिंदी माध्यम से MBBS पढ़ाई को लेकर उपलब्ध आंकड़े भी इस प्रयोग के सामने बड़ी चुनौती दिखाते हैं.

2022: मध्य प्रदेश में हिंदी में मेडिकल शिक्षा की शुरुआत
2024-25: हिंदी में MBBS कोर्स के बावजूद एक भी छात्र ने हिंदी में परीक्षा नहीं दी
2025-26: कुल मेडिकल छात्रों में महज 10 फीसदी ने हिंदी में परीक्षा दी

यानी जिस प्रयोग को उच्च शिक्षा में हिंदी की बड़ी क्रांति के तौर पर पेश किया गया था, उसमें छात्रों की भागीदारी अभी भी बेहद सीमित है.

क्या हिंदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती ‘करियर’ है?
छात्र संगठनों का कहना है कि छात्र भाषा के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन वे अपने भविष्य को लेकर व्यावहारिक फैसला लेते हैं. अगर हिंदी माध्यम से पढ़ने के बाद आगे की पढ़ाई और प्रतियोगिता के बड़े मंचों पर अंग्रेजी की जरूरत पड़ती है, तो छात्र शुरुआत से ही अंग्रेजी माध्यम को प्राथमिकता देते हैं. यही वजह है कि हिंदी में मेडिकल और इंजीनियरिंग शिक्षा के सामने सिर्फ किताबों की कमी नहीं, बल्कि पूरे इकोसिस्टम का सवाल खड़ा है.

कुलपति भी मानते हैं 'हिंदी का मेडिकल साहित्य अभी कमजोर'
मध्यप्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर के कुलपति प्रोफेसर डॉ. अशोक खंडेलवाल भी मानते हैं कि मेडिकल का साहित्य अंग्रेजी में बेहद मजबूत है, जबकि हिंदी में अभी उतना मजबूत आधार तैयार नहीं हुआ है. हालांकि उनका कहना है कि हिंदी मेडिकल साहित्य धीरे-धीरे विकसित हो रहा है और आने वाले समय में इसमें सुधार होगा. उनका तर्क है कि मेडिकल साहित्य की शुरुआत कभी ग्रीक भाषा में हुई थी और जब अंग्रेजी में इसका विस्तार हुआ, तब भी चुनौतियां सामने आई थीं. आज हिंदी भी उसी तरह के संक्रमण के दौर से गुजर रही है.

हिंदी दिवस पर सबसे बड़ा सवाल
हिंदी दिवस पर हिंदी के सम्मान की बात जरूर होनी चाहिए. लेकिन मध्य प्रदेश की ये तस्वीर एक ज्यादा बड़ा सवाल पूछती है क्या हिंदी को सिर्फ भाषणों, नारों और सरकारी योजनाओं की भाषा बनाना है? या फिर उसे वास्तव में रोजगार की भाषा, मेडिकल शिक्षा की भाषा, इंजीनियरिंग की भाषा, रिसर्च की भाषा और ग्लोबल प्रतियोगिता में टिकने वाली भाषा बनाना है? क्योंकि किताब छाप देना हिंदी को उच्च शिक्षा की भाषा नहीं बनाता. जब तक छात्र उसे पढ़ना न चाहें, शिक्षक उसमें सहज न हों, उच्च शिक्षा का पूरा साहित्य उपलब्ध न हो और आगे रोजगार व रिसर्च के रास्ते साफ न हों तब तक हिंदी माध्यम का प्रयोग अधूरा ही रहेगा. 2022 में लॉन्च हुई किताबें अगर 2026 में गोदाम में धूल खा रही हैं, तो हिंदी दिवस पर जश्न के साथ इस सवाल का जवाब भी जरूरी है आखिर हिंदी उच्च शिक्षा के इस प्रयोग को छात्र क्यों नहीं मिल रहे?

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