भारतीय रेलवे ने अपनी पहली हाइड्रोजन ट्रेन के 10 महीने बाद अब पहली तरल प्राकृतिक गैस (LNG) ट्रेन शुरू की है।

हाइड्रोजन ट्रेन की तुलना में LNG ट्रेन कितनी अलग?

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
संक्षेप में पढ़ें
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अपनी पहली हाइड्रोजन ट्रेन शुरू करने के 10 महीनों बाद, भारतीय रेलवे ने अब अपनी पहली तरल प्राकृतिक गैस (LNG) ट्रेन भी शुरू कर दी है।
रविवार को गृह मंत्री अमित शाह ने गुजरात के साबरमती स्टेशन से भारत की पहली LNG ट्रेन को हरी झंडी दिखाई। यह कदम कार्बन उत्सर्जन को कम करने और डीजल पर से अपनी निर्भरता को कम करने की दिशा में रेलवे की बड़ी कामयाबी है।
LNG ट्रेन के साथ कुल मिलाकर 1500 करोड़ रुपये से ज्यादा के कई रेलवे प्रोजेक्ट्स देश को समर्पित किए गए। इनमें रेलवे लाइन को डबल करने के प्रोजेक्ट, कवच ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम, ऑटोमैटिक सिग्नलिंग का काम और WAG-12 इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव के लिए मेंटेनेंस शेड शामिल थे।
भारत की पहली LNG ट्रेन
भारत की पहली LNG से चलने वाली ट्रेन आने वाले सालों में पर्यावरण संरक्षण में अहम योगदान देगी। LNG से चलने वाली यह ट्रेन डुअल-फ्यूल (डीजल और LNG) सिस्टम पर चलती है, जिसे इसके ड्राइविंग पावर कारों (DPCs) के लिए विकसित किया गया है।
साबरमती इंटीग्रेटेड कोचिंग डिपो में, 1400 HP की क्षमता वाली दो DPCs को डुअल-फ्यूल टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके चलाने के लिए मॉडिफाई किया गया है। यह सिस्टम लोकोमोटिव को डीजल के साथ-साथ LNG का इस्तेमाल करने की सुविधा देता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, टेक्नोलॉजी की परफॉर्मेंस और भरोसेमंदता को असल हालात में परखने के लिए दो बदले हुए DPC का 2000 km से ज्यादा फील्ड ट्रायल किया गया है।
40 प्रतिशत तक डीजल की खपत होगी कम
डुअल-फ्यूल सिस्टम से LNG का इस्तेमाल करके डीजल की खपत को लगभग 40% तक कम किया जा सकता है। रेलवे के जारी किए गए ट्रायल डेटा से पता चलता है कि यह टेक्नोलॉजी फ्यूल की लागत और कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर जैसे एमिशन को कम कर सकती है।
यह टेक्नोलॉजी इंजन को फ़्यूल की उपलब्धता के आधार पर LNG या डीजल पर चलने की सुविधा भी देती है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इससे ट्रेन किसी एक फ्यूल सोर्स पर निर्भर हुए बिना चलती रह सकती है।
डीजल की जरूरत के कुछ हिस्से को LNG से बदलने के साथ-साथ, इस सिस्टम को पारंपरिक डीजल इंजन की पावर और काम करने की क्षमता को बनाए रखने के लिए डिजाइन किया गया है। हर बदले हुए DPC में लगभग 2200 लीटर क्षमता वाला LNG टैंक लगा है।
इस टैंक में लगभग 850-900 kg इस्तेमाल लायक LNG आ सकती है। LNG का एक पूरा टैंक लगभग 1,600 km तक ट्रेन चलाने में मदद कर सकता है, जिससे ट्रेन में बार-बार फ़्यूल भरने की जरूरत नहीं होगी। इंडियन रेलवे का लक्ष्य नेट जीरो का है।
किस रूट पर चलेगी LNG ट्रेन?
अपनी यात्रा के दौरान, पहली LNG-डीजल ड्यूल-फ्यूल डीईएमयू ट्रेन साबरमती और महेसाणा जंक्शन के बीच चल रही है। यह 8 डिब्बों वाली नॉन-एसी चेयर कार ट्रेन है। इसका नियमित रूट अभी तक तय नहीं हुआ है और मार्ग की पुष्टि होने के बाद इसकी एलान किया जाएगा।
हाइड्रोजन और LNG ट्रेनों में क्या अंतर है?
दोनों ट्रेनें अलग-अलग वैकल्पिक-ईंधन तकनीकों का इस्तेमाल करती हैं। हाइड्रोजन ट्रेन हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का इस्तेमाल करके फ्यूल-सेल सिस्टम के ज़रिए ट्रेन में ही बिजली बनाती है।
वहीं, LNG ट्रेन एक ऐसे इंटरनल-कंबशन इंजन का इस्तेमाल करती है जिसे डुअल-फ्यूल LNG-डीजल सिस्टम में बदला जाता है। LNG मौजूदा सिस्टम में डीजल के इस्तेमाल को लगभग 40 प्रतिशत तक कम कर सकती है।
आसान शब्दों में कहें तो, हाइड्रोजन ट्रेन एक फ्यूल-सेल आधारित प्रोपल्शन सिस्टम है, जबकि LNG ट्रेन एक वैकल्पिक-ईंधन सिस्टम है जो डीजल के साथ काम करती है।
भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन
भारतीय रेलवे ने 17 जुलाई, 2026 को हरियाणा के जींद और सोनीपत के बीच अपनी पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाई थी। रेल मंत्रालय के अनुसार, इस हाइड्रोजन ट्रेन ने 25 जुलाई तक 1200 किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय किया और 3200 लीटर से ज्यादा डीजल की बचत की।
पारंपरिक डीजल ट्रेन के उलट, हाइड्रोजन ट्रेन हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच केमिकल रिएक्शन से ट्रेन के अंदर ही बिजली बनाती है। इससे निकलने वाली एकमात्र चीज जल-वाष्प है; इसमें न तो धुआं निकलता है और न ही टेलपाइप से सीधे कार्बन का उत्सर्जन होता है।
इस ट्रेन में 10 कोच हैं, जिनमें दो हाइड्रोजन ड्राइविंग पावर कारें शामिल हैं, और यह कुल 2,400 kW की पावर देती है। इसमें लिथियम आयरन फॉस्फेट बैटरी और हाइड्रोजन स्टोरेज सिलेंडर का भी इस्तेमाल किया गया है।
LNG या हाइड्रोजन पर्यावरण के लिहाज से अधिक फायदेमंद कौन?
पर्यावरण के लिहाज से हाइड्रोजन ट्रेन, एलएनजी (LNG) ट्रेन की तुलना में अधिक फायदेमंद और स्वच्छ है। ऐसा इसलिए क्योंकि हाइड्रोजन ट्रेन के बाई-प्रोडक्ट के रूप में सिर्फ जल-वाष्प निकलती है।