आज सुबह से Moral Policing जबरदस्त trend कर रही है.
भई, हो भी क्यों न?
आखिर Jamui के एक incident ने social media पर हलचल जो मचा दी है.
खासकर मर्द Moral Policing पर अपनी बेबाक राय रख रहे हैं. लंबे-लंबे posts, tweets और moral policing पर लंबी-लंबी बयानबाजी चल रही है. अरे मर्द ही क्यों बिहार की रोल मॉडल रहीं विधायक श्रेयसी सिंह ने भी क्या कमाल की बात कही है कि भई मर्यादा में रहकर moral policing करनी चाहिए.
मैंने सुबह अपनी coffee उठाई तो office के male colleagues भी इस मुद्दे पर बेहद ‘गंभीर’ चर्चा करते दिखाई दिए.
मुझसे भी किसी ने मेरी राय जानने की कोशिश की.
मेरा एक दो-टूक जवाब था-
“Relax guys... हंगामा क्यों है बरपा? बस moral policing ही तो हुई है...!! Chill करो.”
हां, सुनने में यह बात जितनी बेहूदा लगती है, शायद उतनी ही जरूरी है.
क्योंकि आज जो लोग Jamui की सड़क पर खड़ी भीड़ पर गुस्सा कर रहे हैं, उनमें से कितनों ने कभी अपनी जिंदगी में किसी लड़की को रोकते हुए यह सोचा है कि वे भी उसी सोच का छोटा-सा हिस्सा बन रहे हैं?
इसलिए आज Jamui की भीड़ पर उंगली उठाने से पहले...
जरा एक बार अपनी तरफ भी देखिए.
ईमानदारी से खुद से सवाल कीजिए-
क्या आपने अपनी जिंदगी में कभी किसी की Moral Policing नहीं की?
जरा गौर से याद कीजिए.
बचपन में थे तो बहन से कभी नहीं कहा?
“ऐसे मत बैठो.”
“उस लड़के से बात मत करो.”
“इतनी देर बाहर मत रहो.”
“लोग क्या कहेंगे?”
चलो, बचपन था.
समझ कम थी.
कॉलेज पहुंचे तो?
किसी female friend की dress पर टिप्पणी नहीं की?
उसकी दोस्ती, रिश्ते या रात में बाहर रहने पर नसीहत नहीं दी?
“इतना modern होने की जरूरत नहीं.”
“लड़कों से इतनी दोस्ती ठीक नहीं.”
“घरवालों को पता चला तो?”
अच्छा, कॉलेज भी छोड़ देते हैं.
शादी के बाद?
बीवी से कभी नहीं कहा-
“ये मत पहनो.”
“वहां मत जाओ.”
“इतनी रात तक बाहर मत रहो.”
“अब तुम शादीशुदा हो.”
“लोग क्या कहेंगे?”
अच्छा, तब भी नहीं?
बच्चे हुए उसके बाद?
तब तो शायद कोई “सलाह” निकली ही होगी-
“अब मां हो, थोड़ा संभलकर रहो.”
“बच्चों पर असर पड़ेगा.”
“अब ये सब अच्छा नहीं लगता.”
नहीं?
तो चलिए, अगला सवाल.
ऑफिस में किसी महिला colleague के कपड़े, दोस्ती या personal life को लेकर कभी कोई टिप्पणी नहीं की?
किसी दोस्त की पत्नी, बहन या बेटी के पहनावे, रिश्ते या lifestyle पर कभी राय नहीं दी?
कभी नहीं?
तो फिर सचमुच खुद को शाबाशी दीजिए.
आपने कम से कम उस सोच का हिस्सा बनने से खुद को बचाए रखा.
लेकिन अगर कभी किसी बहन को, किसी female friend को, किसी पत्नी को, किसी colleague को यह बताया है कि उसे क्या पहनना चाहिए, किससे मिलना चाहिए, कहां जाना चाहिए, कितनी रात तक बाहर रहना चाहिए या अपनी जिंदगी कैसे जीनी चाहिए...
तो जरा ठहरिए.
क्योंकि Moral Policing सिर्फ सड़क पर किसी लड़की को घेर लेने का नाम नहीं है.
कई बार यह एक छोटी-सी “नसीहत” से शुरू होती है.
और उस नसीहत के पीछे छिपा संदेश बहुत साफ होता है-
“तुम्हारी जिंदगी में मेरी राय सिर्फ राय नहीं, नियम है.”
यहीं से असली समस्या शुरू होती है.
क्योंकि Moral Policing हमेशा भीड़ बनकर नहीं आती.
कभी वह पिता की आवाज में आती है.
कभी भाई की हिदायत बनकर.
कभी दोस्त की “फिक्र” बनकर.
कभी पति की “इज्जत” बनकर.
कभी colleague के “मजाक” बनकर.
और कभी सिर्फ चार शब्दों में पूरी जिंदगी का पहरा लगा देती है-
“लोग क्या कहेंगे?”
यही तो विडंबना है.
Jamui में सड़क पर लड़की को घेरना हमें भयावह लगता है.
लेकिन उसी लड़की की जिंदगी पर रोज छोटे-छोटे फैसले थोपना हमें अक्सर सामान्य लगता है.
क्यों?
क्योंकि सड़क वाली Moral Policing दिखाई देती है.
घर वाली Moral Policing रिश्तों के पीछे छिपी होती है.
इसलिए Jamui की सड़क पर खड़ी भीड़ को देखकर सिर्फ यह मत पूछिए-
“ये लोग कैसे हैं?”
एक बार खुद से भी पूछिए-
“क्या कभी मैंने किसी की आजादी पर अपनी सुविधा, अपनी सोच या अपनी तथाकथित इज्जत का पहरा लगाया है?”
अगर जवाब नहीं है, तो सचमुच खुद को शाबाशी दीजिए.
लेकिन अगर जवाब हां है...
तो फिर Jamui की भीड़ को सिर्फ सड़क पर मत खोजिए.
उस कटघरे में थोड़ा-सा खुद को भी खड़ा कीजिए.
क्योंकि सड़क पर लड़की को घेरने वाली मानसिकता अचानक पैदा नहीं होती.
उसे सालों तक घर, मोहल्ला, रिश्तेदार और समाज मिलकर पालते हैं.
बस फर्क इतना है कि घर में लाठी नहीं होती.
वहां ताने होते हैं.
नसीहतें होती हैं.
शर्म होती है.
चरित्र का सर्टिफिकेट होता है.
और एक अदृश्य पहरा होता है.
लड़की पैदा होते ही समाज उसके लिए नियमों की किताब खोल देता है.
ऐसे मत बैठो.
ऐसे मत हंसो.
इतना मत बोलो.
लड़कों से दोस्ती मत करो.
रात में बाहर मत रहो.
ये कपड़े मत पहनो.
अकेले मत जाओ.
बहुत ज्यादा महत्वाकांक्षी मत बनो.
करियर हो गया?
अब शादी कर लो.
शादी हो गई?
अब बच्चा कब करोगी?
एक बच्चा हो गया?
दूसरा कब?
बच्चा नहीं चाहिए?
फिर शादी क्यों की?
यानी लड़की की जिंदगी में एक ऐसा दिन भी नहीं आता जब समाज उससे कहे-
अब तुम अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जी सकती हो.
नहीं.
उसका शरीर भी सार्वजनिक बहस है.
उसके कपड़े भी.
उसका करियर भी.
उसकी शादी भी.
उसकी कोख भी.
उसकी दोस्ती भी.
उसकी आवाज भी.
और सबसे दिलचस्प बात?
इस पूरे नियंत्रण को प्यार, संस्कार और सुरक्षा का नाम दे दिया जाता है.
वाह.
लड़की को कैद करो और उसे सुरक्षा कहो.
उसकी आवाज दबाओ और उसे संस्कार कहो.
उसकी इच्छाओं पर ताला लगाओ और उसे परिवार की इज्जत कहो.
उसकी जिंदगी के फैसले खुद लो और उसे चिंता कहो.
और अगर वह सवाल पूछ दे?
“बदतमीज लड़की.”
यही Moral Policing का असली चेहरा है.
और इसका सबसे बड़ा पाखंड यह है कि इसके नियम अक्सर सिर्फ लड़की के लिए होते हैं.
लड़का देर रात घर आए?
लड़का है.
लड़की देर रात घर आए?
चरित्र पर सवाल.
लड़का कई लड़कियों से बात करे?
Smart है.
लड़की दो लड़कों की दोस्त हो?
कुछ तो गड़बड़ है.
लड़का अपनी जिंदगी के फैसले खुद ले?
Independent.
लड़की अपनी जिंदगी के फैसले खुद ले?
हाथ से निकल गई है.
लड़का शादी में देर करे?
Career बना रहा है.
लड़की शादी में देर करे?
उम्र निकल रही है.
लड़का बच्चा नहीं चाहता?
उसकी choice.
लड़की बच्चा नहीं चाहती?
फिर शादी क्यों की?
ये सिर्फ double standard नहीं है.
यह उस सोच का हिस्सा है, जिसमें लड़की को इंसान से पहले किसी की जिम्मेदारी, किसी की इज्जत और किसी के नियंत्रण का विषय मान लिया जाता है.
और सबसे कड़वी बात?
हम लड़कियों को यह नहीं सिखाते कि तुम्हें अपनी जिंदगी पर अधिकार है.
हम उन्हें सिखाते हैं-
खुद को बचाकर रखना.
किससे?
अक्सर उसी समाज से, जो यह शिक्षा दे रहा होता है.
हम बेटी को बताते हैं कि लड़कों से सावधान रहना.
लेकिन बेटों को कितनी बार बताते हैं कि लड़की तुम्हारी संपत्ति नहीं है?
हम बेटी से कहते हैं कि कपड़े संभालकर पहनना.
लेकिन बेटे से कितनी बार कहते हैं कि किसी के कपड़े तुम्हें कोई अधिकार नहीं देते?
हम बेटी से कहते हैं कि अकेले मत जाना.
लेकिन बेटे से कितनी बार कहते हैं कि किसी लड़की को असहज करना उसका अधिकार नहीं है?
हम लड़की को बचाने में लगे रहते हैं.
लड़कों की सोच बदलने में नहीं.
क्योंकि आसान क्या है?
लड़की पर पहरा लगाना.
मुश्किल क्या है?
लड़के को जिम्मेदार इंसान बनाना.
और फिर किसी दिन Jamui में सड़क पर भीड़ एक लड़की को घेर लेती है.
हम हैरान होकर पूछते हैं-
“ये लोग ऐसे कैसे हो सकते हैं?”
लेकिन सवाल यह भी होना चाहिए-
“हमने उन्हें यह अधिकार महसूस करना सिखाया कैसे?”
क्योंकि Jamui की सड़क पर जो दिखा, वह कोई नई मानसिकता नहीं थी.
फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार वही सोच घर की दीवारों से निकलकर सड़क पर दिखाई दे गई.
Jamui इसलिए सिर्फ Jamui नहीं है.
वह हमारे उस सामूहिक पाखंड का एक्स-रे है, जिसे हम रोजमर्रा की जिंदगी में normal मानकर चलते हैं.
सड़क पर किसी लड़की को घेरना गलत है.
लेकिन घर में उसकी जिंदगी को घेर लेना भी कोई संस्कार नहीं.
उसके कपड़ों पर पहरा.
उसकी दोस्ती पर पहरा.
उसके करियर पर पहरा.
उसकी शादी पर पहरा.
उसकी कोख पर पहरा.
उसकी आवाज पर पहरा.
और फिर उम्मीद कि वह बड़ी होकर आत्मनिर्भर और बेखौफ महिला बनेगी.
कैसे?
क्योंकि मैं एक महिला हूं.
और यह भीड़ मुझे सिर्फ Jamui की सड़क पर दिखाई नहीं देती.
मैंने इसे घरों में भी देखा है.
कभी “ऐसे मत बैठो” में.
कभी “इतनी रात को बाहर क्यों थी?” में.
कभी “लोग क्या कहेंगे?” में.
कभी मेरे कपड़ों पर.
कभी मेरी दोस्ती पर.
कभी मेरी पसंद पर.
और कभी सिर्फ इसलिए कि मैंने अपनी जिंदगी का फैसला खुद लेने की कोशिश की.
हमें बचपन से बताया जाता है-
दुनिया से बचकर रहना.
लेकिन कोई यह नहीं बताता कि दुनिया को हमारे पीछे पड़ने का हक किसने दिया?
हमें बताया जाता है-
अपनी इज्जत संभालकर रखना.
लेकिन यह सवाल कोई नहीं पूछता कि हमारी इज्जत का ठेका आखिर किसके पास है?
हमें बताया जाता है-
लड़की को अपनी सीमाएं पता होनी चाहिए.
लेकिन उन सीमाओं की लकीर खींचने वाला कौन है?
Moral Policing हमेशा सड़क पर शोर करती हुई भीड़ बनकर नहीं आती.
कभी वह बहुत शांत आवाज में आती है-
“बेटा, हमारी बात मान लो.”
“तुम्हारे भले के लिए कह रहे हैं.”
“कल को लोग क्या कहेंगे?”
और यहीं से लड़की धीरे-धीरे अपनी जिंदगी की मालकिन से अपनी जिंदगी की चौकीदार बन जाती है.
वह खुद अपने कपड़े जांचती है.
खुद अपनी आवाज धीमी करती है.
खुद अपनी दोस्ती पर सवाल करती है.
खुद समय देखकर घर लौटती है.
खुद अपनी इच्छाओं को काटती है.
क्योंकि उसे डर होता है कि कहीं कोई उसे “अच्छी लड़की” की सीमा से बाहर न कर दे.
यही Moral Policing की सबसे बड़ी कामयाबी है.
लड़की को रोकना नहीं...
उसे इतना डरा देना कि वह खुद को रोकने लगे.
और शायद इसीलिए Jamui की उस लड़की को देखकर मेरा गुस्सा सिर्फ सड़क की उस भीड़ पर नहीं है.
गुस्सा उस सोच पर है, जो लड़की को आज भी एक इंसान नहीं, किसी की इज्जत समझती है.
गुस्सा उस संस्कार पर है, जो बेटे को अधिकार और बेटी को सावधानी सिखाता है.
गुस्सा उन चार शब्दों पर है, जिनसे जाने कितनी लड़कियों ने अपनी इच्छाएं दफना दीं-
“लोग क्या कहेंगे?”
मैं नहीं जानती उस लड़की के साथ उस दिन क्या बीता.
लेकिन एक महिला होने के नाते इतना जरूर जानती हूं-
सड़क पर घेर लिया जाना डरावना है.
लेकिन पूरी जिंदगी इस डर में जीना कि कहीं कोई हमें गलत न समझ ले...
उससे भी ज्यादा डरावना है.
इसलिए अगली बार Jamui की तस्वीर देखकर सिर्फ सड़क पर खड़ी भीड़ को मत कोसिए.
एक बार अपने घर के अंदर भी देखिए.
कहीं वही भीड़ वहां तो नहीं बैठी?
जो बेटी के कपड़ों पर फैसला सुनाती है.
उसकी दोस्ती पर शक करती है.
उसके करियर की सीमा तय करती है.
उसकी शादी की तारीख तय करती है.
उसकी कोख पर अधिकार जताती है.
और हर विरोध के जवाब में सिर्फ एक शब्द उछालती है-
“इज्जत.”
कमाल है.
लड़की की जिंदगी पर पहरा लगाने के लिए समाज के पास हजार नियम हैं.
लेकिन यह मानने के लिए कि उसकी जिंदगी उसकी अपनी है, आज भी समाज को भरोसा नहीं.
अब शायद हमें अपनी बेटियों से यह कहना बंद करना होगा-
“लोग क्या कहेंगे?”
उन्हें यह कहना होगा-
“तुम क्या चाहती हो?”
क्योंकि लड़की की आजादी यह नहीं कि समाज उसे जीने की अनुमति दे.
लड़की की आजादी यह है कि उसे अपनी जिंदगी जीने के लिए किसी की अनुमति मांगनी ही न पड़े.
और Jamui की उस सड़क से हमारे घर तक आने वाला सबसे जरूरी सवाल यही है-
“हम लड़की को भीड़ से बचाना चाहते हैं, या सचमुच उसे इतना आजाद देखना चाहते हैं कि उसे किसी भीड़, किसी परिवार, किसी समाज और किसी ‘लोग क्या कहेंगे’ से डरना ही न पड़े?”
क्योंकि सड़क की भीड़ दिखाई देती है.
घर की भीड़ अक्सर दिखाई नहीं देती.
लेकिन लड़की दोनों को पहचानती है.
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