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IDBI बैंक की बिक्री को लेकर भाजपा सरकार पर बरसे डॉ. राजीव नारायण प्रसाद

October 16, 2026

Ranchi News: केंद्र की भाजपा सरकार पर आर्थिक मोर्चे पर विफल रहने और सरकारी संपत्तियों का निजीकरण करने का आरोप लगाते हुए मीडिया पैनलिस्ट डॉ. राजीव नारायण प्रसाद ने आईडीबीआई बैंक की प्रस्तावित बिक्री पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि सरकार देश की महत्वपूर्ण सरकारी संपत्तियों को निजी हाथों में सौंप रही है और इसके लिए निजीकरण के फायदे गिनाए जा रहे हैं.

डॉ. प्रसाद ने कहा कि आईडीबीआई बैंक की स्थापना 1 जुलाई 1964 को देश में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने और औद्योगिक इकाइयों को दीर्घकालीन ऋण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई थी. उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की हिस्सेदारी बेचने का फैसला सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियों को निजी हाथों में सौंपने की नीति का हिस्सा है. उन्होंने प्रस्तावित सौदे की कीमत करीब 52,878 करोड़ रुपये बताते हुए इस पर चिंता जताई.

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उन्होंने कहा कि निजीकरण से रोजगार के अवसरों पर संकट, नौकरी की असुरक्षा, आर्थिक असमानता में वृद्धि और बुनियादी सुविधाओं के महंगे होने जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं. इसका सबसे ज्यादा असर आम लोगों और कमजोर आर्थिक वर्ग पर पड़ता है. सरकार निजीकरण के जरिए होने वाले फायदे गिना रही है, लेकिन इसके संभावित नुकसान पर पर्याप्त चर्चा नहीं हो रही है.

डॉ. प्रसाद ने कनाडा की फेयरफैक्स समूह से जुड़ी कंपनी को लेकर भी सवाल उठाए. उन्होंने कंपनी की वित्तीय पारदर्शिता और लेखा-जोखा से संबंधित कथित आरोपों का जिक्र करते हुए कहा कि बैंक की बिक्री से पहले सभी पहलुओं की गंभीरता से जांच होनी चाहिए. उन्होंने बैंक ग्राहकों की जमा राशि की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई.

उन्होंने कहा कि बैंक के दिवालिया होने की स्थिति में जमा बीमा के तहत पात्र जमाकर्ताओं को अधिकतम पांच लाख रुपये तक की सुरक्षा मिलती है. ऐसे में ग्राहकों की जमा राशि की सुरक्षा से जुड़े नियमों और जोखिमों को लेकर स्पष्ट जानकारी देना जरूरी है.

डॉ. प्रसाद ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार अपनी आर्थिक नीतियों की विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए निजीकरण को बढ़ावा दे रही है. उन्होंने कहा कि सरकारी कंपनियों और संस्थानों को बेचने के बजाय उनकी कार्यक्षमता और वित्तीय स्थिति सुधारने पर ध्यान दिया जाना चाहिए.

उन्होंने भाजपा सरकार से सरकारी संपत्तियों के निजीकरण पर रोक लगाने की मांग करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आर्थिक मोर्चे पर विफल रहने का आरोप लगाते हुए इस्तीफा देने की मांग की.

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