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सरप्राइज धरने से Gen-Z तक: राहुल गांधी की राजनीति का बदल गया अंदाज - rahul gandhis new aggressive street politics strategy news in hindi

August 24, 2026

कभी राजनीतिक गलियारों में 'पार्ट-टाइम राजनेता' के रूप में आलोचना झेलने वाले लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की कार्यशैली में अब बड़ा बदलाव आया है।

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी।

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी।

HighLights

  1. राहुल गांधी की राजनीतिक शैली में आया बड़ा बदलाव।

  2. अचानक धरने, प्रशासनिक कार्यालयों पर विरोध प्रदर्शन।

  3. युवाओं से सीधा संवाद, मुद्दों पर आक्रामक रुख।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की राजनीतिक कार्यशैली में अब बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है।

कभी राजनीतिक गलियारों में 'पार्ट-टाइम पॉलिटिशियन' या केवल दूर से मुद्दे उठाने वाले नेता के तौर पर आलोचना झेलने वाले राहुल गांधी अब एक आक्रामक और सड़क पर उतरकर सीधे संघर्ष करने वाले नेता के रूप में उभर रहे हैं।

राहुल की नई रणनीति- 'सड़क की राजनीति'

बीते हफ्तों का उदाहरण ले तो ऐसा लग रहा है कि पारंपरिक राजनीति से हटकर राहुल गांधी अब बिना किसी पूर्व सूचना के सीधे प्रशासनिक और सरकारी दफ्तरों के सामने मोर्चा खोल रहे हैं। पिछले कुछ हफ्तों में उनके इस नए तेवर ने न सिर्फ प्रशासन बल्कि कई बार उनकी अपनी पार्टी को भी हैरान कर दिया है। 

सबसे ताजा मामला साहिल लोचब का

उदाहरण के तौर पर, हाल ही में जुलाई के छात्र आंदोलन के दौरान पेलेट गन लगने से गंभीर रूप से घायल हुए 19 वर्षीय छात्र साहिल लोचब की FIR दर्ज करवाने के लिए राहुल गांधी अचानक दिल्ली के डीसीपी कार्यालय पहुंचे।

Rahul Gandhi (9)

पुलिस के हीला-हवाली करने पर वे वहीं धरने पर बैठ गए। करीब 6 घंटे चले इस हाई-वोल्टेज ड्रामे और प्रियंका गांधी के साथ आने के बाद आखिरकार पुलिस को मजबूरन FIR दर्ज करनी पड़ी।

इससे पहले पीएम आवास के पास भी किया था प्रदर्शन

अब इससे पहले पहले नीट (NEET) परीक्षा और पेपर लीक के विरोध में हुए छात्रों के प्रदर्शन के दौरान भी राहुल गांधी ने सुरक्षा एजेंसियों को चौंकाते हुए सीधे प्रधानमंत्री आवास (लोक कल्याण मार्ग) के पास विरोध प्रदर्शन किया था।

Rahul Gandhi (2)

सिर्फ मुद्दा उठाना नहीं, बल्कि उस पर टिके रहना भी

राहुल गांधी के इन अचनाक से आए बदलाव को देखते हुए राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी की रणनीति में आया यह बदलाव इस बात का प्रमाण है कि वे अब किसी मुद्दे को उठाकर बीच में छोड़ने के बजाय उसके अंत तक उसके साथ बने रहना चाहते हैं।

भारत जोड़ो यात्रा का भी असर

अच्छा, इस बात में कोई दोहराई नहीं है कि साल 2022 की कन्याकुमारी से कश्मीर तक की 'भारत जोड़ो यात्रा' ने उनकी छवि को पूरी तरह बदल दिया। इस लंबी पैदल यात्रा ने लोगों के बीच यह संदेश दिया कि वे शारीरिक मेहनत और जनता के साथ सीधे जुड़ाव से पीछे हटने वाले नहीं हैं।

संसद से सड़क तक आक्रामकता

इसके अलावा गौर करने वाली बात यह भी है कि 2024 में लोकसभा में विपक्ष के नेता बनने के बाद से वे संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह बेहद मुखर और आक्रामक नजर आ रहे हैं। चुनाव आयोग की मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया या अन्य राष्ट्रीय मुद्दों पर वे लगातार आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं।

जनरेशन-जेड तक सीधी पहुंच की योजना

खास बात यह भी है कि राहुल गांधी अपनी नई रणनीति के तहत देश के युवाओं और नई पीढ़ी जेन-जेड को साधने की कोशिश कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर कोटा और पुणे जैसे शैक्षणिक केंद्रों में युवाओं के बीच जाकर उनकी समस्याएं सुनना, परीक्षा में देरी, कोचिंग के दबाव और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर सीधे संवाद करना इस रणनीति का अहम हिस्सा है।

Rahul Gandhi (7)

इसके साथ ही पुणे के एक कार्यक्रम में महिलाओं और शिक्षा से जुड़े विषयों पर खुलकर बोलना तथा 'मनुस्मृति' जैसे विषयों पर तीखी टिप्पणी कर भाजपा-आरएसएस की वैचारिकी को चुनौती देना उनकी नई सियासी शैली का हिस्सा बन चुका है।

सत्ता पक्ष की प्रतिक्रिया और चुनौतियां भी समझिए

हालांकि सबसे अहम बात यह है कि राहुल गांधी के लिए समय इतना आसान भी नहीं रहने वाला है। इस बात को ऐसे समझिए कि सत्तारूढ़ भाजपा ने राहुल गांधी के इन तेवरों पर तीखा हमला बोला है। भाजपा का कहना है कि पुलिस प्रक्रिया और कानूनी मामलों को राजनीतिक तमाशा बनाना 'अराजकता की राजनीति' है।

अब गठबंधन सरकारों की पेचीदगियां भी 

जब कांग्रेस पार्टी राज्यों में विपक्ष की भूमिका में होती है, तब सरकार को घेरना आसान होता है, लेकिन जब झारखंड जैसे राज्यों में सहयोगी दलों की सरकार के दौरान छात्र आंदोलन या भर्ती गड़बड़ियों के मुद्दे सामने आते हैं, तो कांग्रेस के लिए संतुलन बनाना एक बड़ी राजनीतिक चुनौती भी बन जाता है।

कुल मिलाकर, राहुल गांधी की यह नई राजनीतिक शैली यह साफ दर्शाती है कि वे अब केवल सदन के भीतर बयान देने वाले नेता तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि जमीन पर उतरकर राजनीतिक जमीन मजबूत करने की जुगत में हैं।