Published: Sunday, September 13, 2026, 17:55 [IST]
Ganesh Chaturthi Puja: गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की पूजा खास तरीके से की जाती है। भक्त बप्पा को मोदक, दूर्वा और लाल फूल चढ़ाकर उनकी पूजा करते हैं। मान्यता है कि गणेश जी को दूर्वा बेहद प्रिय है। वहीं, एक ऐसा पत्ता भी है जिसे गणेश जी की पूजा में चढ़ाना शुभ नहीं माना जाता और वह है तुलसी दल। आखिर भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को प्रिय मानी जाने वाली तुलसी गणेश जी की पूजा में क्यों नहीं चढ़ाई जाती?
इस सवाल का जवाब एक पुरानी पौराणिक कथा में मिलता है। मोतिहारी के पंडित उमाशंकर पाठक जी के अनुसार, मान्यताओं और पौराणिक कथाओं में गणेश जी और तुलसी से जुड़ा एक प्रसंग बताया गया है, जिसे गणेश पूजा में तुलसी के इस्तेमाल से जोड़ा जाता है।
गंगा किनारे तप कर रहे थे गणेश जी
पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय भगवान गणेश गंगा नदी के किनारे तपस्या कर रहे थे। उसी दौरान धर्मात्मज की बेटी तुलसी विवाह की इच्छा लेकर तीर्थ यात्रा पर निकली थीं। कई तीर्थों की यात्रा करते हुए तुलसी गंगा तट पर पहुंचीं। वहां उनकी नजर तपस्या में बैठे भगवान गणेश पर पड़ी। कथा में गणेश जी के दिव्य रूप का भी वर्णन किया गया है। कहा जाता है कि वह रत्नों से सजे सिंहासन पर बैठे थे और उनके शरीर पर चंदन लगा हुआ था।
गणेश जी के रूप से प्रभावित हुईं तुलसी
भगवान गणेश के रूप को देखकर तुलसी उनके प्रति आकर्षित हो गईं। उनके मन में गणेश जी से विवाह करने की इच्छा पैदा हुई। तुलसी ने विवाह का प्रस्ताव रखने के लिए गणेश जी की तपस्या भंग कर दी। जब गणेश जी तपस्या से उठे तो उन्होंने तुलसी को समझाया कि उनका ध्यान भंग करना ठीक नहीं था। गणेश जी ने खुद को ब्रह्मचारी बताते हुए तुलसी के विवाह प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
तुलसी ने दिया गणेश जी को श्राप
गणेश जी के विवाह प्रस्ताव को ठुकराने से तुलसी दुखी हो गईं। कथा के अनुसार, गुस्से में उन्होंने गणेश जी को दो विवाह होने का श्राप दे दिया। तुलसी के इस श्राप से गणेश जी भी नाराज हो गए। उन्होंने तुलसी को श्राप दिया कि उनका विवाह एक असुर से होगा और उन्हें राक्षस की पत्नी बनना पड़ेगा। अपने भविष्य के बारे में यह सुनकर तुलसी को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने गणेश जी से माफी मांगी।
शंखचूर से होगा तुलसी का विवाह
मान्यता के अनुसार, तुलसी के माफी मांगने के बाद गणेश जी ने उन्हें बताया कि उनका विवाह शंखचूर नाम के असुर से होगा। इसके साथ ही गणेश जी ने तुलसी के भविष्य को लेकर एक और बात कही। उन्होंने बताया कि आगे चलकर तुलसी भगवान विष्णु और भगवान श्रीकृष्ण को बहुत प्रिय होंगी। कथा के अनुसार गणेश जी ने कहा कि कलयुग में तुलसी का विशेष महत्व होगा और उन्हें जीवन देने वाली तथा मोक्ष से जुड़ी पवित्र वनस्पति के रूप में सम्मान मिलेगा।
गणेश पूजा में तुलसी क्यों हुई वर्जित?
कथा के मुताबिक, भगवान गणेश ने कहा था कि तुलसी भले ही भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को प्रिय होंगी, लेकिन उनकी पूजा में तुलसी दल चढ़ाना शुभ नहीं माना जाएगा। धार्मिक परंपरा में इसी प्रसंग को गणेश पूजा में तुलसी के इस्तेमाल पर रोक से जोड़कर देखा जाता है।
इसी वजह से गणेश चतुर्थी के दिन भक्त गणेश जी को तुलसी की जगह दूर्वा चढ़ाते हैं। सामान्य दिनों में होने वाली गणेश पूजा में भी तुलसी दल की जगह दूर्वा अर्पित करने की परंपरा है।
बप्पा को प्रिय है दूर्वा
धार्मिक मान्यता के अनुसार, दूर्वा भगवान गणेश को बेहद प्रिय है। इसलिए गणेश चतुर्थी की पूजा में दूर्वा का खास महत्व माना जाता है। भक्त मोदक, लाल फूल और दूर्वा जैसी चीजें अर्पित करके भगवान गणेश की पूजा करते हैं। तुलसी को भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा में विशेष स्थान प्राप्त है, लेकिन गणेश पूजा में इससे जुड़ी अलग धार्मिक मान्यता बताई गई है।
Disclaimer: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथा पर आधारित है। इसमें बताई गई बातें आस्था और परंपराओं से जुड़ी हैं, इन्हें वैज्ञानिक या ऐतिहासिक तथ्य के रूप में नहीं लेना चाहिए। अलग-अलग ग्रंथों और क्षेत्रों में इस कथा के विवरण में अंतर हो सकता है।