
CoBRA यूनिट का पूरा नाम है- कमांडो बटालियन फॉर रिजोल्यूट एक्शन.
असम-मेघालय कैडर की IPS अफसर संजुक्ता पराशर को केन्द्रीय रिजर्व सुरक्षा बल की खास यूनिट कोबरा का आईजी बनाया गया है. वह इस यूनिट में इंचार्ज के रूप में तैनात होने वाली पहली महिला अफसर हैं. इस तैनाती के औपचारिक आदेश के सामने आने के बाद से जितनी चर्चा इस अफसर की हो रही है, उतनी ही सीआरपीएफ की कोबरा यूनिट की भी. आइए, इसी चर्चा के बहाने जानते हैं कि सीआरपीएफ की कोबरा यूनिट क्या-क्या काम करती है? कैसे बनते हैं कोबरा कमांडो? कौन-कौन से मिशन में हिस्सा लिया? इस खास यूनिट का गठन कब हुआ? सरकार के इरादे क्या थे?
सीआरपीएफ यानी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की कोबरा यूनिट भारत का एक बेहद घातक विशेष बल है. इसका पूरा नाम कमांडो बटालियन फॉर रिजोल्यूट एक्शन (Commando Battalion for Resolute Action) है. वर्तमान में कोबरा की 10 बटालियन हैं. हर बटालियन में एक हजार जवान होते हैं. इस यूनिट को खासतौर पर घने जंगलों में छिपे दुश्मनों और नक्सलियों से निपटने के लिए तैयार किया गया है. कोबरा के जवान जंगल युद्ध कला में पूरी तरह माहिर होते हैं. इन्हें भारत के सबसे कुशल और साहसी सुरक्षा बलों में गिना जाता है.

कोबरा यूनिट के गठन का मुख्य उद्देश्य क्या था?
कोबरा यूनिट का मुख्य इरादा जंगल में छिपे नक्सलियों के नेटवर्क को जड़ से खत्म करना था. नक्सली छिपकर हमला करते थे और घने जंगलों में गायब हो जाते थे. सरकार चाहती थी कि हमारे जवानों की रणनीति भी नक्सलियों जैसी ही तेज और गुप्त हो. कोबरा का सिद्धांत है जंगल में घुसकर दुश्मन को उसी की शैली में मात देना. इसका उद्देश्य नक्सली नेताओं के ठिकानों को ढूंढना, उनके हथियारों के जखीरे को नष्ट करना और दुर्गम इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाना था.

IPS अफसर संजुक्ता पराशर.
क्या हैं कोबरा कमांडो की मुख्य जिम्मेदारियां?
कोबरा यूनिट के कार्य अन्य सुरक्षा बलों से काफी अलग और जोखिम भरे होते हैं. यह यूनिट मुख्य रूप से निम्न कार्यों को अंजाम देती है.
- यूनिट घने और दुर्गम जंगलों में कई दिनों तक पैदल गश्त करती है. जवान जंगलों में कई हफ्तों तक बिना किसी बाहरी मदद के जीवित रहने में सक्षम होते हैं.
- खुफिया जानकारी मिलते ही कोबरा कमांडो बिना किसी को भनक लगे दुश्मन के कैंप पर अचानक हमला कर देते हैं. इनकी फुर्ती दुश्मन को संभलने का मौका भी नहीं देती.
- नक्सली अक्सर सुरक्षा बलों को नुकसान पहुंचाने के लिए कच्चे रास्तों पर बारूदी सुरंगें बिछाते हैं. कोबरा के जवान इन खतरनाक आईईडी का पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने में माहिर होते हैं.
- सुरक्षा बलों के शिविरों पर होने वाले किसी भी बड़े हमले का तुरंत जवाब देने के लिए कोबरा की टीमें हमेशा तैयार रहती हैं. यह यूनिट त्वरित कार्रवाई दल के रूप में भी काम करती है.
- जंगलों के अंदर सड़क निर्माण या सुरक्षा चौकियों की स्थापना के समय कोबरा यूनिट निर्माण दलों को सुरक्षा घेरा प्रदान करती है.

कोबरा यूनिट.
कैसे बनते हैं कोबरा कमांडो?
कोबरा यूनिट का हिस्सा बनना किसी भी जवान के लिए बहुत गर्व और कठिन परिश्रम की बात होती है. इसमें केवल वही जवान शामिल हो सकते हैं जो पहले से सीआरपीएफ में सेवा दे रहे हों. चयन के लिए जवानों को अत्यंत कठिन शारीरिक और मानसिक परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है. चयनित जवानों को कई महीनों के विशेष प्रशिक्षण के लिए भेजा जाता है. प्रशिक्षण के दौरान जवानों को जंगल सर्वाइवल, रॉक क्लाइंबिंग और नदी पार करने के गुर सिखाए जाते हैं. जवानों को आधुनिक हथियारों को चलाने, मार्शल आर्ट्स, और विस्फोटक निष्क्रिय करने की विशेष ट्रेनिंग दी जाती है.
आधुनिक हथियार और विशेष उपकरणों से लैस हैं जवान
कोबरा कमांडो को दुनिया के बेहतरीन हथियारों और गैजेट्स से लैस किया जाता है. इनके पास इंसास राइफल के अलावा एके-47, एक्स-95, और आधुनिक स्नाइपर राइफलें होती हैं. रात के अंधेरे में ऑपरेशन चलाने के लिए जवानों को नाइट विजन गॉगल्स दिए जाते हैं. घने जंगलों में संपर्क बनाए रखने के लिए इनके पास अत्याधुनिक सैटेलाइट संचार उपकरण होते हैं. ये जवान हल्के और मजबूत बुलेटप्रूफ जैकेट पहनते हैं ताकि जंगल में तेजी से दौड़ सकें.

कोबरा कमांडो को दुनिया के बेहतरीन हथियारों और गैजेट्स से लैस किया जाता है.
किन ऑपरेशनों और मिशनों में शामिल हुई कोबरा यूनिट?
कोबरा यूनिट ने अपने गठन के बाद से देश के कई संवेदनशील इलाकों में ऐतिहासिक मिशनों को अंजाम दिया है.
- छत्तीसगढ़ के बस्तर, सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर जैसे अत्यधिक संवेदनशील नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कोबरा ने अनगिनत सफल ऑपरेशन चलाए हैं. जवानों ने घने जंगलों में घुसकर शीर्ष नक्सली कमांडरों को मार गिराया है.
- झारखंड के पारसनाथ की पहाड़ियों और सारंडा के विशाल जंगलों में नक्सलियों का दबदबा खत्म करने में कोबरा की अहम भूमिका रही है. कोबरा की निरंतर कार्रवाइयों के कारण इन इलाकों से नक्सलियों का प्रभाव काफी कम हुआ.
- ओडिशा, बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में भी कोबरा यूनिट ने राज्य पुलिस के साथ मिलकर कई संयुक्त अभियानों को सफलतापूर्वक पूरा किया.
- दुर्गम इलाकों में चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने और मतदान दलों को सुरक्षित वापस लाने का काम भी इस यूनिट ने कई बार बखूबी निभाया है.
अदम्य साहस और शहादत की लंबी गाथा
कोबरा यूनिट का इतिहास वीरता और सर्वोच्च बलिदान की कहानियों से भरा हुआ है. जंगल के भीतर हर कदम पर जान का खतरा होता है. कई बार जवानों को मलेरिया, जहरीले कीड़ों और पीने के पानी की कमी जैसी विषम परिस्थितियों का भी सामना करना पड़ता है. इसके बावजूद कोबरा के जवानों ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए इस यूनिट के अनेक वीरों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है. उनकी बहादुरी के लिए उन्हें कई बार शौर्य चक्र, कीर्ति चक्र और राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित किया जा चुका है.
इस तरह कहा जा सकता है कि सीआरपीएफ की कोबरा यूनिट आज भारत की आंतरिक सुरक्षा का एक मजबूत स्तंभ है. जिस उद्देश्य के साथ 2008 में इसका गठन हुआ था, उस पर यह पूरी तरह खरी उतरी है. देश के जिन इलाकों में कभी नक्सलियों का खौफ हुआ करता था, आज वहां सुरक्षा और शांति लौट रही है. इस बदलाव के पीछे कोबरा कमांडो के अनुशासन, साहस और कठिन परिश्रम का बहुत बड़ा योगदान है. यह बल हर परिस्थिति में देश की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहता है.
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दिनेश पाठक
मूलतः पाठक. पेशे से लेखक. कबीर की धरती पर जन्म. मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की धरती अयोध्या में लालन-पालन, पढ़ाई-लिखाई. करियर की शुरुआत आदि गंगा के तट लखनऊ से. संगम तीरे प्रयागराज, मोहब्बत की निशानी ताजमहल के साये से लेकर देवभूमि उत्तराखंड, उद्योगनगरी के रूप में मशहूर रहे कानपुर और बाबा गोरखनाथ की धरती पर काम करते हुए विद्वतजन से कुछ न कुछ सीखा, करंट अफ़ेयर्स, यूथ, पैरेंटिंग, राजनीति, प्रशासन, गाँव, खेत-किसान पसंदीदा टॉपिक. स्कूल, कॉलेज युनिवर्सिटी में यूथ से गपशप करना एनर्जी का अतिरिक्त स्रोत. साल 1992 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुई इस पाठक की लेखन यात्रा कलम, डेस्कटॉप, लैपटॉप के की-बोर्ड से होते हुए स्मार्ट फोन तक पहुंच गयी. ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ रही है, सीखने, पढ़ने, लिखने की भूख भी बढ़ रही है. हिंदुस्तान अखबार में पांच केंद्रों पर एडिटर रहे. यूथ, पैरेंटिंग पर पाँच किताबें. एक किताब 'बस थोड़ा सा' पर दूरदर्शन ने धारावाहिक बनाया.
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