Census 2027 में 1931 के बाद पहली बार सभी भारतीयों की जाति दर्ज की जाएगी। लेकिन Question नंबर 10 को लेकर विवाद छिड़ गया है। OBC के अलग कॉलम और जातियों की तैयार सूची की मांग क्यों हो रही है? जानिए पूरी बहस और इसका महत्व।
भारत की अगली जनगणना में 40 सवाल पूछे जाएंगे, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा एक सवाल की है—नंबर 10। Census 2027 में पहली बार 1931 के बाद सभी भारतीयों की जाति दर्ज करने की तैयारी है। लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं कि जाति पूछी जाएगी, बल्कि असली विवाद इस बात पर है कि आखिर जाति का नाम दर्ज कैसे किया जाएगा। यही तरीका भविष्य में आरक्षण, OBC आबादी और सामाजिक न्याय से जुड़े फैसलों के लिए आंकड़ों की विश्वसनीयता तय कर सकता है।
Census Form में आखिर क्या पूछा जाएगा?
14 अगस्त को अधिसूचित दूसरे चरण के फॉर्म में Question नंबर 10 को ‘Scheduled Caste (SC)/Scheduled Tribe (ST)/Caste’ के रूप में रखा गया है। SC और ST के अलावा अन्य लोगों के लिए जाति बताने का एक खुला कॉलम है, जिसमें व्यक्ति द्वारा बताई गई जाति दर्ज की जाएगी। सबसे बड़ा विवाद यह है कि 40 सवालों में कहीं भी OBC या Backward Class के लिए अलग कॉलम नहीं दिया गया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ने इसी मुद्दे पर सवाल उठाते हुए पहले से सत्यापित जातियों की सूची और व्यापक चर्चा की मांग की है।
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खुला कॉलम क्यों बन सकता है मुश्किल?
एक ही जाति को अलग-अलग राज्यों और भाषाओं में अलग नामों से जाना जाता है। ऐसे में अगर गणनाकर्मी लोगों के बताए नाम को उसी तरह दर्ज करेंगे, तो एक ही समुदाय कई अलग-अलग एंट्री में बंट सकता है। यह चिंता नई नहीं है। 2011 की Socio-Economic and Caste Census में जाति संबंधी आंकड़ों में भारी जटिलताएं सामने आई थीं। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बताया था कि देशभर में लाखों अलग-अलग जाति नाम दर्ज हुए थे, जिनमें उपजातियां, गोत्र, उपनाम और अलग-अलग स्थानीय नाम शामिल थे।
बिहार और तेलंगाना मॉडल की क्यों हो रही चर्चा?
विपक्ष का तर्क है कि Census 2027 में पहले से तैयार सूची और कोडिंग सिस्टम अपनाया जाना चाहिए। बिहार के 2023 जाति सर्वे में 214 जातियों की सूची और एक अतिरिक्त कोड का इस्तेमाल किया गया था। वहीं तेलंगाना के सर्वे में जातियों को BC/OBC, SC, ST और अन्य समूहों में वर्गीकृत कर सूचीबद्ध किया गया था। इन उदाहरणों के आधार पर विपक्ष कह रहा है कि डिजिटल Census में भी ड्रॉपडाउन या कोड आधारित व्यवस्था अपनाई जा सकती है।
1931 के बाद क्यों नहीं हुई पूरी जाति गणना?
ब्रिटिश शासन के दौरान 1881 से 1931 तक जनगणना में जाति दर्ज की जाती थी। आजादी के बाद 1951 से स्वतंत्र भारत की जनगणना में SC और ST के अलावा अन्य जातियों की पूरी गणना बंद कर दी गई। बाद में OBC आरक्षण और मंडल आयोग के दौर में जातिगत आंकड़ों की जरूरत लगातार महसूस की गई। मंडल आयोग ने उपलब्ध आंकड़ों और अनुमानों के आधार पर OBC आबादी करीब 52 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया था, लेकिन इसे लेकर आज भी बहस जारी है।
अब सबसे बड़ा सवाल क्या है?
जाति गणना का फैसला हो चुका है, लेकिन डेटा इकट्ठा करने का तरीका अभी राजनीतिक और तकनीकी बहस के केंद्र में है। एक खुला कॉलम रखा जाए या पहले से तय सूची बनाई जाए—यही फैसला तय करेगा कि Census 2027 से मिलने वाले आंकड़े भविष्य की नीतियों के लिए कितने उपयोगी साबित होंगे। लद्दाख और बर्फीले इलाकों में गणना सितंबर से शुरू होने की योजना है, जबकि देश के बाकी हिस्सों में प्रक्रिया फरवरी 2027 से शुरू होगी। ऐसे में Question नंबर 10 अब सिर्फ एक Census सवाल नहीं, बल्कि भारत की राजनीति और सामाजिक न्याय की सबसे बड़ी बहस बन चुका है।
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