साल 2014 में भाजपा के घनश्याम ओझा मेयर… साल 2020 में दो नगर निगम में से एक मेयर भाजपा का और अब साल 2026 में एक बार फिर भाजपा ने बहुमत के साथ जोधपुर के नगर निगम में बोर्ड बनाया। प्रसन्नचंद मेहता जोधपुर नगर निगम के मेयर बने। इस पूरे निकाय में भाजपा ने
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वोटिंग के तुरंत बाद भाजपा ने निर्दलीयों को साधा और बागियों को मनाया। इसके बाद रिजल्ट जारी होने के बाद बीजेपी जीते हुए निर्दलीय पार्षदों को भी अपने साथ लेने में कामयाब हुई। इधर, कांग्रेस की चुनावी रणनीति कहीं न कहीं पीछे रही। बताया जा रहा है कि बागियों पर हुए एक्शन से अंदरखाने काफी नाराजगी थी। वहीं टिकट वितरण की नाराजगी की वजह से कांग्रेस पिछड़ती गई। तीन कारण से कांग्रेस का मैनेजमेंट फेल हो गया।
पढ़ें भाजपा के बोर्ड बनने की इनसाइड स्टोरी…

नगर निगम में मेयर का पदभार ग्रहण करने से पहले प्रसन्नचंद मेहता ने सीढ़ियों को प्रणाम किया और फिर अंदर आए।
चार कारण जिनकी वजह से भाजपा को मिला बहुमत और बनाया बोर्ड
पहला: बाड़ेबंदी- इन चुनाव में भाजपा का सबसे बड़ा मैनेजमेंट बाड़ेबंदी रहा। दो फेस में ये बाड़ेबंदी हुई थी। वोटिंग के तुरंत बाद भाजपा ने अपने पार्षदों की बाड़ेबंदी करना शुरू कर दी थी। इस दौरान 3 से 4 निर्दलीयों को भी अपने साथ ले लिया था।
बाड़ेबंदी का दूसरा फेस रिजल्ट के बाद हुआ। इनमें से 10 निर्दलीय और 1 आरएलपी के प्रत्याशियों ने जीत हासिल की थी। इनमें भाजपा समर्थित चार निर्दलीय और तीन कांग्रेस समर्थित पार्षद थे।
रिजल्ट के तुरंत बाद भाजपा ने अपने समर्थित पार्षदों के साथ कांग्रेस के बागी पार्षदों को मनाया और रिजल्ट वाले दिन ही उन्हें अपने साथ बाड़ेबंदी में ले गई। इनमें चेतन गहलोत, विशाल सांखला और कांग्रेस के पूर्व पार्षद लक्ष्मण नायक की बहू निर्मला नायक भी थीं।
साथ ही बाड़ेबंदी के दौरान सभी पार्षदों को एक ही मैसेज दिया गया कि संगठन जो कहेगा, वो ही फाइनल होगा। क्रॉस वोटिंग रोकने के लिए भाजपा के बड़े नेताओं ने लगातार बाड़ेबंदी में ट्रेनिंग दी।
दूसरा: कांग्रेस के एक्शन को बनाया ताकत- इन चुनाव में कांग्रेस के टिकट वितरण से नाराज पार्टी के पार्षदों ने बागी चुनाव लड़ा। हालांकि भाजपा के भी बागी थे, लेकिन कांग्रेस ने इन बागी पार्षदों के साथ ही उन्हें समर्थन करने वालों पर एक्शन लेना शुरू किया। एक के बाद एक सभी को पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित किया।
कांग्रेस निष्कासन वाले एक्शन को भाजपा ने भांपा। रिजल्ट के बाद कांग्रेस समर्थित पार्षद जो बागी चुनाव लड़े थे, उन्हें अपने खेमे में लिया।
तीसरा: बागियों को मनाया- बागियों से मनाने को लेकर पूरा चुनावी मैनेजमेंट बड़े नेताओं को सौंपी गई। ताकि भाजपा के खेमे की वोटिंग में किसी तरह की सेंधमारी न हो। इसमें प्रमुख जिलाध्यक्ष राजेंद्र पालीवाल और राज्यमंत्री केके विश्नोई की भूमिका रही। बागियों को मनाने के लिए रोजाना मॉनिटरिंग हुई और व्यक्तिगत कॉन्टैक्ट किया गया।
साथ ही संगठन में पर्दे के पीछे काम करने वाले सीनियर नेताओं को दो-दो बागियों को मनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसी का नतीजा रहा कि 51 बहुमत के बाद दो एक्स्ट्रा वोट प्रसन्नचंद मेहता को मिले।
नॉमिनेशन के बाद से ही भाजपा ने अपने सीनियर नेताओं को फील्ड में उतारा। इनमें केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, घनश्याम ओझा और महेंद्र राठौड़ जैसे नेताओं के साथ सबसे बड़ी भूमिका राजेंद्र पालीवाल की रही।
चौथा: मेयर नॉमिनेशन से पहले पार्टी की सदस्यता- निकाय चुनाव में भाजपा के 45 पार्षद थे। बहुमत के लिए 6 और पार्षदों की जरूरत थी। निकाय चुनाव संभाग प्रभारी भूपेंद्र सैनी और जिलाध्यक्ष राजेंद्र पालीवाल ने इन सभी को मेयर चुनाव के नॉमिनेशन से पहले पार्टी की सदस्यता दिलाई और मैसेज दिया कि संगठन के पास बोर्ड बनाने के लिए बहुमत है।

जीत की खुशी में भाजपा जिलाध्यक्ष भावुक हो गए। प्रसन्नचंद मेहता ने उन्हें गले लगाकर पीठ थपथपाई।

तीन कारणों से समझें कैसे फेल हुई कांग्रेस
पहला: बड़े नेताओं की सक्रियता कम- इन निकाय चुनाव में कांग्रेस के बड़े नेताओं की सक्रियता कम देखने को मिली। नॉमिनेशन से लेकर चुनाव प्रचार तक में दूरी बनाई। हालांकि चुनावी मैनेजमेंट के लिए तीन लेयर का पूरा प्रोसेस तैयार किया गया था। इसमें सामने आई कमियों को समय पर पूरा नहीं किया गया।

फोटो मेयर पद की वोटिंग से पहले का है। कांग्रेस प्रत्याशी राजेंद्र सोलंकी निगम पहुंचे थे।
दूसरा: टिकट बांटने और पार्टी के एक्शन से नाराजगी: दूसरा कारण रहा कि टिकट बांटने और पार्टी की ओर से लिए एक्शन का। टिकट वितरण को लेकर भी पार्टी में अंदरूनी खींचतान रही। बताया जा रहा है कि निष्कासन के एक्शन प्लान को दो से तीन दिन होल्ड किया गया था, लेकिन आखिर में पार्टी ने एक्शन लिया। इसके बाद पार्टी समर्थित कार्यकर्ताओं में इसे लेकर नाराजगी भी बढ़ी।
तीसरा: बाड़ेबंदी के लिए रिजल्ट तक का इंतजार: कांग्रेस ने बाड़ेबंदी को लेकर इंतजार किया। वोटिंग के बाद संगठन निर्णय नहीं ले पाया। रिजल्ट के एक दिन पहले बाड़ेबंदी की गई और कांग्रेस समर्थित पार्षदों को अपने खेमे में लिया। तब तक भाजपा 6 निर्दलीयों को अपने बाड़ेबंदी में ले चुकी थी।