
नेशनल मेडिकल कमीशन के चेयरपर्सन डॉ. अभिजात चंद्रकांत सेठ
भारत में मेडिकल शिक्षा का तेजी से विस्तार हुआ है. देश में अब 820 से अधिक मेडिकल कॉलेज हैं. हर साल करीब एक लाख MBBS सीटें उपलब्ध हैं लेकिन सवाल सिर्फ यह नहीं है कि देश में कितने डॉक्टर तैयार हो रहे हैं, बल्कि यह है कि कैसे डॉक्टर तैयार हो रहे हैं. मेडिकल शिक्षा के विस्तार के साथ गुणवत्ता पीछे न छूटे, इसके लिए फैकल्टी की तैयारी, व्यावहारिक प्रशिक्षण, क्षमता-आधारित मेडिकल एजुकेशन (CBME) का सही क्रियान्वयन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की जिम्मेदार समझ को प्राथमिकता देनी होगी.
यह बात नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के चेयरपर्सन डॉ. अभिजात चंद्रकांत सेठ ने बुधवार को 2nd Edition of ICC Medical Education Forum में कही. इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स (ICC) ने मेडिकल स्टूडेंट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (MSAI) के साथ मिलकर इस फोरम का आयोजन किया. कार्यक्रम में मेडिकल शिक्षा के नियामकों, शिक्षकों, नर्सिंग क्षेत्र के विशेषज्ञों और छात्रों ने मेडिकल शिक्षा में हो रहे बदलावों पर चर्चा की.
डॉ. सेठ ने कहा कि मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाना उपलब्धि का अंतिम पैमाना नहीं हो सकता. देश की असली जिम्मेदारी अब मानकों को ऊपर उठाने की है. उनके मुताबिक, सफलता इस बात से तय होगी कि हम कितने डॉक्टर बना रहे हैं, इससे नहीं बल्कि ऐसे कितने डॉक्टर तैयार कर रहे हैं जो समाज की बेहतर सेवा कर सकें.
उन्होंने मेडिकल शिक्षा में किसी भी तरह की दो-स्तरीय व्यवस्था के प्रति भी आगाह किया. उनका कहना था कि ऐसा नहीं होना चाहिए कि कुछ मेडिकल कॉलेजों में छात्रों को अच्छे शिक्षक, बेहतर मेडिकल सामग्री, सिमुलेशन सुविधाएं और रिसर्च के मौके मिलें, जबकि दूसरे संस्थानों के छात्रों को इन सुविधाओं से काफी कम अवसर मिले.
AI आएगा लेकिन डॉक्टर की जिम्मेदारी खत्म नहीं होगी
मेडिकल शिक्षा में AI की बढ़ती भूमिका पर डॉ. सेठ ने कहा कि छात्रों को सिर्फ AI का इस्तेमाल करना नहीं, बल्कि AI को समझना भी सिखाना होगा. इलाज में AI मददगार हो सकता है लेकिन मरीज के संबंध में लिए गए फैसलों की पेशेवर जिम्मेदारी और जवाबदेही डॉक्टर की ही रहेगी.
उन्होंने कहा, भविष्य के डॉक्टर के पास मेडिकल ज्ञान और क्लिनिकल स्किल के साथ डेटा को समझने, तकनीक का चिकित्सकीय मूल्यांकन करने और सही नैतिक निर्णय लेने की क्षमता भी होनी चाहिए. AI को मेडिकल शिक्षा का विकल्प नहीं, बल्कि एक सहयोगी तकनीक के रूप में देखा जाना चाहिए.
AI को लेकर NBEMS के स्तर पर किए जा रहे प्रयासों का भी जिक्र हुआ. डॉ. सेठ के अनुसार 2026 में करीब 50 हजार डॉक्टर व्यवस्थित ऑनलाइन AI प्रशिक्षण पूरी कर चुके हैं. इसके अलावा NBEMS के CPR कार्यक्रम के जरिए 2023 में लगभग 20 लाख हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स को CPR प्रशिक्षण दिया गया.
CBME में इरादा अच्छा, जमीन पर लागू करना चुनौती
मेडिकल शिक्षा में 2019 से लागू CBME का उद्देश्य रटने वाली पढ़ाई से हटकर छात्रों को वास्तविक क्लिनिकल स्थितियों के लिए तैयार करना है. लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज की मेडिसिन की प्रोफ़ेसर डॉ. रितिका सूद ने बताया कि सीबीएमई में एमबीबीएस पाठ्यक्रम के तहत 2,600 से अधिक Competencies तय की गई हैं. इसमें DOAP (Demonstrate-Observe-Assist-Perform) तरीका और एटीट्यूड, एथिक्स और कम्युनिकेशन (AETCOM) जैसे मॉड्यूल भी शामिल हैं.
लेकिन यहां सबसे बड़ी चुनौती फैकल्टी की तैयारी है. एजुकेशन टाइम्स की रिपोर्ट में भी फोरम के दौरान शिक्षकों की कमी और तैयारी, दस्तावेज़ीकरण के बढ़ते बोझ, सिमुलेशन लैब के प्रभावी इस्तेमाल और AI को जमीन पर लागू करने की चुनौतियों को प्रमुख मुद्दों के रूप में सामने रखा गया.
डॉ. सूद ने भी कहा कि नई व्यवस्था लागू होने के बावजूद फैकल्टी को उसी सिस्टम के तहत पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिला है. आकलन और दस्तावेज़ीकरण का बोझ बढ़ना तथा पारंपरिक यूनिवर्सिटी एग्जामिनेशन कल्चर से क्लीनिकल स्किल आधारित मूल्यांकन की ओर बढ़ना भी बड़ी चुनौती है.
सिर्फ सिमुलेशन लैब बनाना काफी नहीं
इंडियन नर्सिंग काउंसिल के अध्यक्ष डॉ. टी. दिलीप कुमार ने सिमुलेशन-बेस्ड ट्रेनिंग को मरीजों की सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि जैसे पायलट को असली उड़ान से पहले सिम्युलेटर पर प्रशिक्षित किया जाता है, वैसे ही डॉक्टरों और नर्सों को भी वास्तविक मरीजों पर काम करने से पहले सिमुलेशन का पर्याप्त अनुभव मिलना चाहिए.
उन्होंने खास तौर पर कहा कि सिर्फ हार्डवेयर खरीद लेने से समस्या हल नहीं होगी. असली जरूरत ऐसे शिक्षकों की है जो सिमुलेशन को पढ़ाई का प्रभावी हिस्सा बना सकें. INC अब तक करीब 2,000 नर्सिंग फैकल्टी को व्यवस्थित सिमुलेशन प्रोग्राम में प्रशिक्षित कर चुका है और छह महीने के एआई नर्सिंग कोर्स की शुरुआत की दिशा में भी काम कर रहा है.
छात्रों की थकान भी शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़ी
फोरम में मेडिकल छात्रों ने भी अपनी समस्याएं सामने रखीं. MSAI की प्रेसिडेंट डॉ. चैत्रा बी.ए. ने कहा कि बड़े वर्कफोर्स का मतलब अपने आप मजबूत वर्कफोर्स नहीं होता. यह देखना भी जरूरी है कि छात्र और युवा डॉक्टर किन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं और उन्हें वास्तविक प्रशिक्षण कितना मिल रहा है. उन्होंने मेडिकल शिक्षा में छात्रों की पाठ्यक्रम डिज़ाइन और मूल्यांकन में ज्यादा भागीदारी की मांग की.
उनका जोर इस बात पर था कि थकान को काबिलियत नहीं मानी जा सकती और बर्नआउट को वर्कफोर्स स्ट्रेटेजी नहीं बनाया जाना चाहिए. AI के दौर में छात्रों को केवल टेक्नोलॉजी यूज़र्स बनाने के बजाय उन्हें एल्गोरिद्मिक बायस, पेशेंट प्राइवेसी और तकनीक की सीमाओं को समझने के लिए भी तैयार करना होगा.
फोरम की चर्चा से यह साफ है कि भारत ने मेडिकल कॉलेजों, सीटों और संस्थागत ढांचे के विस्तार में लंबी दूरी तय कर ली है. अब अगली चुनौती फैकल्टी, पाठ्यक्रम, व्यावहारिक प्रशिक्षण और AI-एकीकृत चिकित्सा शिक्षा को मजबूत करने की है. यानी मेडिकल शिक्षा का अगला दौर संख्या बढ़ाने से ज्यादा गुणवत्ता, कौशल, तकनीक, नैतिकता और मानवीय संवेदनशीलता पर निर्भर करेगा.

प्रशांत द्विवेदी
प्रशांत कुमार द्विवेदी ने साल 2017 में अमर उजाला कानपुर से करियर की शुरुआत की. अगस्त 2019 से अक्टूबर 2021 तक अमर उजाला जम्मू कश्मीर में काम किया. इसके बाद एक साल अमर उजाला नोएडा में काम करने का मौका मिला. साल 2022 में आज तक डिजिटल में बतौर चीफ सब एडिटर ज्वाइन किया. सीएसजेएमयू कानपुर से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री हासिल कर चुके प्रशांत सुरक्षा, कश्मीर मामले, क्राइम और पॉलिटिक्स की खबरों पर काम करते हैं. वर्तमान में TV9 डिजिटल में चीफ सब एडिटर हैं. नौकरी के अलावा खेल-कूद और किताबें पढ़ने में दिलचस्पी है. विशेष रूप से फिलासफी. इसके साथ ही ट्रेवलिंग पसंद है, खासतौर पर माउंटेन एरियाज में समय बिताना बहुत पसंद है. इन सबके बीच गांव, बेजुबानों और बुजुर्गों से विशेष लगाव रखते हैं.
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