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नीम कोटेड यूरिया से पैदावार 8.25% बढ़ी, लेकिन क्यों नहीं रुक रही इसकी कालाबाजारी

August 9, 2026

नीम कोटेड यूरिया से पैदावार 8.25% बढ़ी, लेकिन क्यों नहीं रुक रही इसकी कालाबाजारी

नीम कोटेड की कालाबाजारी पर कार्रवाई

देश में यूरिया की कालाबाजारी और गैर-कृषि इस्तेमाल के लिए इसकी अवैध डायवर्जन रोकने के मकसद से लाई गई नीम कोटेड यूरिया (NCU) नीति को लेकर सरकार ने संसद में विस्तृत जानकारी दी है. लोकसभा में 7 अगस्त 2026 को डॉ. संजय जायसवाल और श्रीमती अनीता नागरसिंह चौहान के प्रश्न के जवाब में रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने बताया कि 2015 से देश के सभी घरेलू उत्पादकों और आयातकों के लिए 100 प्रतिशत नीम कोटेड यूरिया की आपूर्ति करना अनिवार्य कर दिया गया था और बीते सालों में इसकी पैदावार भी बढ़ी है. मगर सदन में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि इस बीच यूरिया की कालाबाजारी को लेकर भी कई शिकायतें मिली हैं. सरकार ने अप्रैल 2026 से लेकर अब तक 2,868 लाइसेंस रद्द किए हैं. आइए इस खबर में इसी तस्वीर को समझने की कोशिश करते हैं कि असल में किस राज्य में यूरिया की पैदावारी कितनी हुई और कालाबाजारी के मामले कहां पर ज्यादा मिले हैं और सरकार उनको रोकने के लिए क्या अहम कदम उठा रही है.

क्या हैं नीम कोटिंग के फायदे

सरकार के जवाब के अनुसार नीम कोटिंग की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इससे यूरिया धीरे-धीरे घुलता है, जिससे इसका इस्तेमाल सामान्य यूरिया के मुकाबले कम हो जाता है और फसल में नाइट्रोजन का अवशोषण बेहतर होता है. शोध के मुताबिक NCU के इस्तेमाल से पैदावार में औसतन 8.25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, वहीं नाइट्रोजन के नुकसान में भी 10 से 15 प्रतिशत तक की कमी आई है.

जवाब में यह भी कहा गया कि NCU एक प्रभावी नाइट्रिफिकेशन इनहिबिटर की तरह काम करता है, जिससे मिट्टी में अमोनियम नाइट्रोजन का स्तर बढ़ता है और नाइट्राइट नाइट्रोजन घटता है, हालांकि इसका असर मिट्टी की किस्म, फसल और क्षेत्र के आधार पर अलग-अलग हो सकता है. कई अध्ययनों में यह भी सामने आया कि इससे नाइट्रेट के रिसाव और अमोनिया के वाष्पीकरण जैसे नुकसान भी कम होते हैं.

Neem Coated Urea

कालाबाजारी रोकने के लिए क्या हो रहा है

सरकार यूरिया की जमाखोरी, कालाबाजारी, घटिया गुणवत्ता और डायवर्जन के मामलों पर राज्य सरकारों के साथ मिलकर हर हफ्ते निगरानी कर रही है. अप्रैल 2026 से अब तक देशभर में 1,69,031 छापे मारे जा चुके हैं, जिनमें 9,127 कारण बताओ नोटिस जारी किए गए, 2,868 लाइसेंस निलंबित या रद्द किए गए और 270 मामलों में FIR दर्ज हुई. इसके अलावा सिर्फ डायवर्जन के मामलों में 414 कारण बताओ नोटिस, 113 लाइसेंस रद्द और 46 FIR दर्ज की गई हैं. यानी बड़े पैमाने पर कार्रवाई जारी है, हालांकि इतनी बड़ी संख्या में मामले सामने आना यह भी दिखाता है कि जमाखोरी और डायवर्जन की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.

किस राज्य में कितना उत्पादन

सरकार ने पिछले तीन वर्षों का राज्यवार उत्पादन डेटा भी सदन में रखा. 2025-26 में देश में कुल 293.2 लाख मीट्रिक टन (LMT) नीम कोटेड यूरिया का उत्पादन हुआ, जो 2024-25 के 306.4 LMT और 2023-24 के 314.1 LMT से कम है. राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश 89.4 LMT उत्पादन के साथ सबसे आगे रहा. हालांकि, यह पिछले साल के 97.0 LMT से घटा है. इसके बाद गुजरात में 36.8 LMT, राजस्थान में 37.7 LMT, महाराष्ट्र में 21.1 LMT और मध्य प्रदेश में 19.7 LMT उत्पादन दर्ज हुआ. इसके अलावा तमिलनाडु में 12.1 LMT, झारखंड में 13.8 LMT, बिहार में 12.0 LMT, पश्चिम बंगाल में 14.5 LMT और पंजाब में 11.2 LMT उत्पादन हुआ. वहीं, आंध्र प्रदेश में उत्पादन घटकर लगभग शून्य पर आ गया, जो 2023-24 में 13.1 LMT था.

सरकार की ओर से पेश आंकड़ों के मुताबिक 2025-26 में देशभर में यूरिया की मांग 381.45 LMT थी, जबकि उपलब्धता 450.79 LMT और बिक्री 396.60 LMT रही. यानी उपलब्धता, मांग और बिक्री दोनों से ज्यादा रही, जिसे सरकार ‘उपलब्धता के आरामदायक स्तर’ का संकेतक बताती है. पिछले तीन वर्षों के आंकड़े देखें तो हर साल उपलब्धता मांग से अधिक रही है. 2023-24 में मांग 356.08 LMT के मुकाबले उपलब्धता 437.47 LMT थी, तो 2024-25 में 364.01 LMT मांग के मुकाबले 443.83 LMT उपलब्धता दर्ज हुई.

किस राज्य में कितना नीम कोटेड यूरिया बना?

राज्य उत्पादन 2025-26
उत्तर प्रदेश 89.4 LMT
राजस्थान 37.7 LMT
गुजरात 36.8 LMT
महाराष्ट्र 21.1 LMT
मध्य प्रदेश 19.7 LMT
पश्चिम बंगाल 14.5 LMT
झारखंड 13.8 LMT
तमिलनाडु 12.1 LMT
बिहार 12.0 LMT
पंजाब 11.2 LMT

आगे की रणनीति

सरकार ने बताया कि हर फसल सीजन से पहले कृषि एवं किसान कल्याण विभाग राज्यों के साथ मिलकर राज्यवार और महीनेवार जरूरत का आकलन करता है, जिसके आधार पर उर्वरक विभाग आपूर्ति योजना जारी करता है. पूरे देश में उर्वरकों की आवाजाही पर नजर रखने के लिए इंटीग्रेटेड फर्टिलाइजर मैनेजमेंट सिस्टम (iFMS) का इस्तेमाल किया जा रहा है. मांग और उत्पादन के बीच के अंतर को आयात के जरिए पूरा किया जाता है और रेलवे मंत्रालय के साथ समन्वय कर उर्वरकों की ढुलाई के लिए प्राथमिकता के आधार पर रेक उपलब्ध कराए जाते हैं. राज्य स्तर पर वितरण की जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकारों की होती है.

कुल मिलाकर सरकार का दावा है कि पिछले तीन वित्त वर्षों के दौरान देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यूरिया की उपलब्धता पर्याप्त बनी रही है, लेकिन कालाबाजारी और डायवर्जन के खिलाफ लगातार बड़े पैमाने पर चल रही कार्रवाई यह भी बताती है कि यह चुनौती अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.

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देवेश कुमार पांडेय

देवेश कुमार पांडेय

देवेश कुमार पांडेय TV9 Hindi में बतौर सब-एडिटर काम कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के अमेठी के रहने वाले देवेश को राजनीति के अलावा इतिहास, साहित्य में दिलचस्पी है.  साल 2024 में भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) के अमरावती कैंपस से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. देवेश को घूमना, लिखना, पढ़ना और पॉडकास्ट सुनना पसंद है.

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