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- Edited by: शिव शुक्ला
- Updated Aug 17, 2026, 07:22 PM IST
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जम्मू-कश्मीर प्रशासन को 1953 में पुलिस थाने के निर्माण के लिए कथित तौर पर जबरन ली गई जमीन के बदले एक किसान के वंशज को मुआवजा और जमीन के इस्तेमाल का किराया देने का निर्देश दिया।
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सुप्रीम कोर्ट
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टाइम्स नाउ डिजिटल
जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा 1953 पहले किसान की जमीन कब्जा करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है। शीर्ष कोर्ट ने सोमवार को इस मामले में किसान के वंशज को मुआवजा और इतने सालों तक का किराया देने का निर्देश दिया है। यह जमीन बिना किसी औपचारिक अधिग्रहण प्रक्रिया और मुआवजा दिए करीब 73 साल पहले कब्जे में ली गई थी।
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने 73 साल पुराने मामले में ये फैसला दिया। उन्होंने कहा कि लगभग सात दशक की देरी के कारण अब नए सिरे से भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू करने का निर्देश देना संभव नहीं है। हालांकि, पीठ ने राहत देते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण अधिकारी उस तारीख से अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू मानेगा, जब याचिकाकर्ता ने 2021 में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट का रुख किया था।
क्या है मामला?
ये मामला गांदरबल जिले के कंगन क्षेत्र में स्थित सात कनाल और 18 मरला जमीन का है। याचिकाकर्ता अब्दुल राशिद वानी का दावा है कि उसके पूर्वज इस जमीन के मालिक थे और 1953 में पुलिस स्टेशन बनाने के लिए प्रशासन ने बिना जमीन अधिग्रहित किए और बिना कोई मुआवजा दिए उस पर कब्जा कर लिया था। वानी ने वकील महफूज अहसन नाजकी के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। उन्होंने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट के 2022 के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी।
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने खारिज कर दी थी याचिका
हाई कोर्ट ने वानी की याचिका खारिज कर दी थी। साथ ही कहा था कि जमीन पर कब्जे के करीब 68 साल बाद याचिका दायर की गई और इतनी लंबी तथा अस्पष्ट देरी के बाद इस मामले में राहत नहीं दी जा सकती। हाई कोर्ट ने इसे प्रभावी रूप से एक ऐसा मामला बताया था, जिसका कानूनी आधार इतने लंबे समय के बाद समाप्त हो चुका है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनी ये दलील
वहीं, सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने वानी की इस दलील पर विचार किया कि याचिका में देरी जरूर हुई, लेकिन सरकार की कथित अवैध कार्रवाई का खामियाजा उन्हें नहीं भुगतना चाहिए। पीठ ने कहा कि वह अब 1953 से नई भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू करने का आदेश नहीं दे सकती। हालांकि, उसने निर्देश दिया कि भूमि अधिग्रहण अधिकारी 2021 से अधिग्रहण की कार्यवाही के आधार पर मुआवजे की गणना करे।
सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही भूमि अधिग्रहण अधिकारी को निर्देश दिया कि 1953 से लेकर अब तक पुलिस स्टेशन के लिए जमीन के इस्तेमाल के बदले वानी को देय किराये की राशि की भी गणना की जाए। साथ ही पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि जमीन अधिग्रहण के लिए देय अंतिम मुआवजा और किराये की अंतिम राशि का निर्धारण हाई कोर्ट करेगा।
28 जून, 2022 को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट की खंडपीठ ने दिया था फैसला
गौरतलब है कि 28 जून, 2022 को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इस मामले में अपनी असाधारण अधिकार-क्षेत्र की शक्तियों का इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया था। अदालत ने कहा था कि याचिकाकर्ता को इतने लंबे समय बाद एक ऐसे मामले को फिर से उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जो व्यवहारिक रूप से ‘‘समाप्त’’ हो चुका है।
वानी के अनुसार, उनके पूर्वज गांदरबल जिले के मौजा कंगन में सर्वे नंबर 525 वाली सात कनाल और 18 मरला जमीन के मालिक थे। याचिका में कहा गया था कि 1953 में इस जमीन को पुलिस स्टेशन के लिए ले लिया गया, लेकिन न तो इसका औपचारिक अधिग्रहण किया गया और न ही कोई मुआवजा दिया गया। उन्होंने अदालत से जमीन का कब्जा वापस दिलाने या फिर अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर उचित मुआवजा देने की मांग की थी। साथ ही, 1953 से अब तक जमीन के इस्तेमाल और कब्जे के बदले किराये या किराया-मुआवजा देने की भी मांग की गई थी।
उनकी इस याचिका पर हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि कथित तौर पर जमीन पर कब्जा याचिका दाखिल होने से करीब 68 साल पहले हुआ था। अदालत ने यह भी नोट किया था कि करीब 42 वर्षीय याचिकाकर्ता यह स्पष्ट नहीं कर पाए कि उन्होंने इतने लंबे समय तक कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की।
वानी ने दलील दी थी कि उनके पिता अशिक्षित थे और इस कारण वह पहले अदालत का रुख नहीं कर सके। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया था। अदालत ने कहा था कि याचिकाकर्ता खुद दो दशक से अधिक समय पहले वयस्क हो चुके थे, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने कानूनी उपाय के लिए समय पर कदम नहीं उठाया। याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया था कि पिछले करीब 20 वर्षों में उन्होंने कई बार अधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन इसके समर्थन में कोई दस्तावेज पेश नहीं कर सके। उन्होंने कहा था कि 2014 की बाढ़ में सरकारी रिकॉर्ड नष्ट हो गए।
जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन ने याचिका का विरोध करते हुए इसे अत्यधिक विलंब से दायर बताया था। प्रशासन का कहना था कि पुलिस विभाग 1953 से इस जमीन पर शांतिपूर्ण कब्जे में है और इतने लंबे समय बाद संपत्ति से जुड़े रिकॉर्ड उपलब्ध कराना मुश्किल है।
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शिव शुक्लाauthor
शिव शुक्ला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में कार्यरत एक अनुभवी न्यूज राइटर हैं। छह वर्षों के पेशेवर अनुभव के साथ वे डिजिटल पत्रकारिता में तेज, सटीक और प्रभावी कंटेंट तैयार करने के लिए पहचाने जाते हैं। वह राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों, राजनीतिक घटनाक्रमों और गहन विश्लेषण पर विशेष पकड़ रखते हैं। ब्रेकिंग न्यूज कवरेज, लाइव ब्लॉग, एक्सप्लेनर और एनालिसिस आर्टिकल तैयार करने में उन्हें विशेषज्ञता हासिल है। शिव शुक्ला 8,000 से अधिक न्यूज रिपोर्ट प्रकाशित कर चुके हैं। मजबूत न्यूज सेंस, विश्लेषण क्षमता और स्पष्ट लेखन शैली उनकी खासियत है। उन्हें नए स्थानों की यात्रा करना और किताबें पढ़ने का शौक है, जो उनकी लेखन शैली एवं दृष्टिकोण को और समृद्ध बनाता है।
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