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अलीगढ़ की कोल सीट पर अभी से सियासी घमासान: भाजपा-सपा में सबसे ज्यादा दावेदार; 5,527 वोट की जीत ने बढ़ाई दिलचस्पी - Aligarh News

September 4, 2026

विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन अलीगढ़ की कोल सीट पर सियासी तैयारियां जोर पकड़ने लगी हैं। जिले में सबसे ज्यादा दावेदार इसी सीट पर नजर आ रहे हैं। संभावित प्रत्याशी क्षेत्र में जनसंपर्क बढ़ाने के साथ सामाजिक और धार्मिक आयोजनों में सक्रिय दिख रहे हैं।

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कोल सीट किसी एक राजनीतिक परिवार या नेता के प्रभाव वाली सीट नहीं रही है। यही वजह है कि यहां हर चुनाव में कई चेहरे टिकट की दौड़ में शामिल होते हैं। इस बार भाजपा और सपा में दावेदारों की संख्या सबसे ज्यादा बताई जा रही है। 2022 में भाजपा ने लगातार दूसरी बार सीट जीती थी, लेकिन सपा प्रत्याशी से जीत का अंतर महज 5,527 वोट रहा। करीबी मुकाबले ने 2027 के चुनाव के लिए दोनों दलों की सक्रियता बढ़ा दी है।

भाजपा में विधायक के साथ संगठन के कई चेहरे

भाजपा में मौजूदा विधायक अनिल पाराशर के अलावा कई नाम टिकट की चर्चा में हैं। इनमें जिला महामंत्री शिवनारायण शर्मा, पूर्व महानगर अध्यक्ष विवेक सारस्वत, महानगर अध्यक्ष इंजीनियर राजीव शर्मा, एबीवीपी से जुड़े डॉ. पुष्पेंद्र पचौरी, चंद्रमणि कौशिक, दीपक शर्मा अन्नू आजाद, राजेश भारद्वाज, डॉ. दिनेश शर्मा और रामकुमार भारद्वाज के नाम शामिल हैं।

मौजूदा विधायक लगातार दो चुनाव जीत चुके हैं। ऐसे में पार्टी के सामने एक तरफ जीत की हैट्रिक के लिए मजबूत चेहरे को मैदान में उतारने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ संगठन के भीतर टिकट की उम्मीद लगाए बैठे नेताओं को साधने की भी चुनौती रहेगी।

सपा में पुराने चेहरे के साथ कई नए दावेदार

सपा में पूर्व महानगर अध्यक्ष अज्जू इशहाक सबसे प्रमुख दावेदारों में माने जा रहे हैं। वह लगातार दो बार कोल से चुनाव लड़ चुके हैं। 2022 में भाजपा के अनिल पाराशर से उन्हें 5,527 वोट से हार मिली थी।

इसके अलावा काशिफ आब्दी, ख्वाजा जिबरान, उस्मान खान और ट्रांसपोर्टर मो. सगीर के नाम भी चर्चा में हैं। बदायूं के पूर्व सांसद और केंद्रीय मंत्री सलीम शेरवानी भी अपने बेटे के लिए कोल में राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश में बताए जा रहे हैं। समाजसेवी राकेश सिंह उर्फ मुन्ना ठाकुर और खैर क्षेत्र के नेता अजीत गौड़ भी दावेदारों की दौड़ में हैं।

बसपा-कांग्रेस में दावेदार कम

बसपा में पूर्व सपा नेता और मेयर प्रत्याशी रहे सलमान शाहिद का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। कांग्रेस में पूर्व विधायक विवेक बंसल और पूर्व महानगर अध्यक्ष अजय शर्मा प्रमुख दावेदार माने जा रहे हैं।

कोल सीट का 2022 का चुनाव इस बार की सियासी तस्वीर को समझने के लिए अहम है। भाजपा के अनिल पाराशर ने सपा के अज्जू इशहाक को 5,527 वोट से हराया था। भाजपा लगातार दो चुनाव जीत चुकी है, लेकिन जीत का अंतर इतना बड़ा नहीं था कि विपक्ष की चुनौती को नजरअंदाज किया जा सके।

यही वजह है कि भाजपा के सामने सीट बचाने की चुनौती है, जबकि सपा इस बार वापसी की रणनीति बनाने में जुटी है। दोनों दलों के लिए टिकट का फैसला पहला और सबसे अहम पड़ाव होगा।

शहर और गांव का मिश्रण, जातीय समीकरण भी अहम

कोल सीट का बड़ा हिस्सा शहरी क्षेत्र में है, जबकि इसका करीब आधा हिस्सा शहर से सटे ग्रामीण इलाकों से जुड़ा है। ऐसे में यहां शहरी मुद्दों के साथ ग्रामीण क्षेत्रों के सामाजिक समीकरण भी चुनावी नतीजों पर असर डालते हैं।

सीट अनारक्षित होने के बाद से ब्राह्मण, मुस्लिम, अनुसूचित जाति और क्षत्रिय मतदाताओं के समीकरण अहम रहे हैं। अलीगढ़ की शहरी राजनीति में धार्मिक ध्रुवीकरण का असर भी इस सीट पर दिखाई देता है। ऐसे में पार्टी का संगठन और जातीय समीकरण जितने महत्वपूर्ण होंगे, उतना ही प्रत्याशी का व्यक्तिगत प्रभाव और सामाजिक स्वीकार्यता भी मायने रखेगी।

1952 में बनी सीट, 50 साल रही आरक्षित

कोल विधानसभा सीट 1952 में अस्तित्व में आई थी। 1962 से 2012 तक यह सीट आरक्षित रही। इस दौरान कांग्रेस और भाजपा के अलावा बसपा और सपा भी यहां जीत दर्ज कर चुकी हैं। 2012 में सीट अनारक्षित होने के बाद राजनीतिक समीकरण बदले। इसके बाद 2017 और 2022 में भाजपा ने लगातार दो चुनाव जीते।

कोल में अभी किसी भी दल ने प्रत्याशी घोषित नहीं किया है, लेकिन दावेदारों की बढ़ती सक्रियता ने चुनावी माहौल जरूर गर्म कर दिया है। जनसंपर्क, सामाजिक-धार्मिक कार्यक्रमों में मौजूदगी और तेजी से लगाए जा रहे होर्डिंग-बैनर नेताओं के शक्ति प्रदर्शन का संकेत दे रहे हैं।

इस बार कोल में मुकाबला सिर्फ भाजपा और सपा के बीच नहीं होगा। असली सियासी लड़ाई दोनों दलों के भीतर भी है-टिकट किसे मिलेगा? 2022 में महज 5,527 वोट की जीत और इस बार दावेदारों की लंबी कतार ने कोल को चुनाव से पहले ही अलीगढ़ की सबसे चर्चित सीटों में शामिल कर दिया है।