
जम्मू-कश्मीर में बाढ़ का खतरा.
नेपाल त्रासदी के बाद जम्मू-कश्मीर के लिए यह चिंता काल्पनिक नहीं है. ‘जर्नल ऑफ ग्लेशियोलॉजी’ में प्रकाशित कश्मीर यूनिवर्सिटी की एक स्टडी में 1992 से 2024 तक के सैटेलाइट डेटा का इस्तेमाल करके 155 ग्लेशियल झीलों का अध्ययन किया गया. ब्रमसार, चिरसार, नंडकोल, गंगाबल और भाग को ऐसे झीलों के रूप में पहचान की गई, जो सबसे ज्यादा जोखिम वाली 5 ग्लेशियल झीलें हैं. इन पांच झीलों का अचानक फटने का “बहुत ज्यादा खतरा” है.
ये झीलें ऊंचाई पर मौजूद ‘टिकिंग टाइम बम’ की तरह हैं, जिनसे नीचे की घाटियों को खतरा है. आइए जानें वे झीलें कौन हैं.
- ब्रामसर (कुलगाम जिला): पीछे हटते ग्लेशियर के बहुत पास होने के कारण तेजी से फैल रही है.
- चिरसर (कुलगाम जिला): इससे दक्षिण कश्मीर में निचले इलाकों में बसी आबादी को सीधा खतरा है.
- नंडकोल (गांदरबल जिला): यह पानी के बहाव से जुड़ी एक ऐसी नेटवर्क प्रणाली का हिस्सा है, जिससे कई झीलों में एक साथ बाढ़ आ सकती है.
- गंगाबल (गांदरबल जिला): क्षेत्रफल और पानी की मात्रा के हिसाब से सबसे बड़ी झील, इससे नीचे की ओर मौजूद पनबिजली परियोजनाओं को बड़ा खतरा है.
- भागसर (शोपियां जिला): यह झील अहम संचार लाइनों, पुलों और बुनियादी ढांचे के ठीक ऊपर स्थित है.
कश्मीर में कौन-कौन सी झीलें
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के इलाकों में हजारों ऊंचाई वाली ग्लेशियल झीलें (बर्फ पिघलने से बनी झीलें) हैं. ये झीलें ग्रेटर हिमालय, काराकोरम, जंस्कार और पीर पंजाल पर्वतमालाओं में पीछे हटते ग्लेशियरों के पिघले पानी से बनी हैं. कश्मीर में ज्यादातर ग्लेशियल झीलें बहुत ऊंचाई (3,000 मीटर से ज्यादा) पर हैं और वहां मुख्य रूप से ट्रेकिंग रास्तों, जैसे ‘कश्मीर ग्रेट लेक्स ट्रेक’, से पहुंचा जा सकता है.
गंगबल और नंदकोल झीलें: गांदरबल जिले में माउंट हरमुख की तलहटी में स्थित ये झीलें सीधे हरमुख ग्लेशियर सिस्टम से पानी पाती हैं.
तरसर और मारसर झीलें: पहलगाम (अनंतनाग जिला) के पास स्थित जुड़वां ग्लेशियल झीलें, जिन्हें ऊंचे पहाड़ी इलाकों की बर्फ और ग्लेशियरों से पानी मिलता है.
विशनसर और कृष्णसर झीलें: सोनमर्ग के पास ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियर से पानी पाने वाली झीलें, जिनका पानी किशनगंगा/नीलम नदी बेसिन में जाता है.
शेषनाग झील: अमरनाथ गुफा मंदिर के रास्ते में पड़ने वाली एक प्रो-ग्लेशियल झील (ग्लेशियर के सामने बनी झील), जो पिघलते ग्लेशियरों और पहाड़ों से बहने वाले पानी से बनी है.
लद्दाख में कौन-कौन सी झीलें
केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख में 3,000 से ज़्यादा ग्लेशियल जलाशय और ऐसी झीलें हैं जिनका पानी बाहर नहीं बहता (एंडोरेइक झीलें). ये झीलें सूखे ट्रांस-हिमालयी इकोसिस्टम में ग्लेशियर के पिघलने से बनी हैं या बनी हुई हैं.
पैंगोंग त्सो और त्सो मोरीरी: ऊंचाई पर स्थित खारे पानी की झीलें, जिन्हें कुछ हद तक आस-पास के ग्लेशियरों की बर्फ़ पिघलने से बनी धाराओं से पानी मिलता है.
द्रांग-द्रुंग ग्लेशियल झीलें: जंस्कार में पेन्सी ला दर्रे के पास द्रांग-द्रुंग ग्लेशियर के आखिरी छोर पर बनी गतिशील प्रो-ग्लेशियल और मोरेन-डैम वाली झीलें (ग्लेशियर के मलबे से बनी झीलें).
रुम्बक और क्यागर त्सो झीलें: लद्दाख और ज़ंस्कार पर्वतमालाओं में ऊंचाई पर स्थित जलाशय, जिन्हें ग्लेशियर पिघलने से बनी धाराओं से पानी मिलता है.
जम्मू क्षेत्र पुंछ और राजौरी की सात झीलें (पीर पंजाल पर्वतमाला): इसमें नंदन सर, सुख सर और चंदन सर जैसी पहाड़ी ग्लेशियल झीलें शामिल हैं, जो पीर पंजाल पर्वतमाला में 3,500 मीटर से ज्यादा ऊंचाई पर स्थित हैं.
जानकारों के अनुसार कश्मीर में दोहरा खतरा हैं कि यह ग्लेशियल लेक्स जहां मौजूद हैं. वहीं यह क्षेत्र भूकंप के लिए भी संवेदनशील हैं यानी किसी भी ते तीव्रता वाले से इनकी बाउंड्री वॉल, जोकि कंकर, पत्थर, मिट्टी से बनी होती हैं, टूट सकती हैं और फिर इनके नीचे स्थित आबादी और निर्माण को खतरा पैदा कर सकती हैं.
पर्यावरण जानकार एजाज रसूल के अनुसार यह ग्लेशियर ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से अपनी रफ्तार से ज्यादा पिघल रहे हैं और इसका सीधा मतलब हैं कि पानी में ज्यादा जमा होता है और यही पानी जब अचानक से किसी क्षेत्र की तरफ पूरी तेज रफ्तार से बढ़ता हैं तो नेपाल जैसी त्रासदी देखने को मिलती है.
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मेहराज अहमद
पत्रकारिता में 12 से अधिक साल से कार्यरत. शुरुआत रिजिनल चैनल के बाद इंडिया न्यूज, टीवी9 नेटवर्क, न्यूज़18 आईबीएन खबर, अमर उजाला, ईटीवी भारत वर्तमान में tv9 Bharatvatsh (tv9 hindi.com) का हिस्सा हूं. मानवाधिकार, आतंकवाद-रोधी जैसे मुद्दों पर रिपोर्टिंग करना पसंद है.
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