आगरा: थाना ताजगंज क्षेत्र के अंतर्गत हाल ही में पकड़े गए फर्जी कॉल सेंटर के मामले में पुलिस ने रविवार को एक बहुत बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा किया है। सिक्योरिटी कंपनी में अच्छी नौकरी दिलाने का झांसा देकर चलाए जा रहे इस बड़े फर्जीवाड़े के तहत सोशल मीडिया पर आकर्षक विज्ञापन जारी किए जाते थे, जिसके जरिए देश भर के बेरोजगार युवाओं को अपने जाल में फंसाया जाता था।
पुलिस की पूछताछ और अब तक की तफ्तीश में सामने आया है कि ये शातिर आरोपी कुल तीन चरणों में पहले रजिस्ट्रेशन के नाम पर, फिर पद के हिसाब से शुल्क के रूप में और अंत में फाइनल ज्वाइनिंग लेटर देने के बहाने मोटा पैसा वसूलते थे। इस तरह महज दो सालों के भीतर इस गिरोह ने करीब 3200 से अधिक लोगों को अपना शिकार बनाकर दो करोड़ रुपये से भी ज्यादा की भारी-भरकम रकम ठग ली है।
पुलिस ने मौके से तलाशी के दौरान 32 बैंक पासबुक, 28 एटीएम कार्ड, 8 सिम कार्ड और 12 क्यूआर कोड सहित कई महत्वपूर्ण साक्ष्य बरामद किए हैं।
पुलिस विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, इस फर्जी कॉल सेंटर को संचालित करने वाले मुख्य आरोपी मूल रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर और पड़ोसी राज्य बिहार के रहने वाले हैं, लेकिन उन्होंने अपनी ठगी के काले कारोबार को अंजाम देने के लिए ताजनगरी आगरा को अपना सुरक्षित ठिकाना बनाया हुआ था। ये दोनों आरोपी पिछले करीब दो साल से थाना ताजगंज क्षेत्र के एक पॉश इलाके में सक्रिय रहकर इस गोरखधंध को अंजाम दे रहे थे।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फर्जी और लुभावनी कंपनियों के नाम से सिक्योरिटी गार्ड तथा अन्य महत्वपूर्ण पदों पर बंपर नौकरियों के विज्ञापन प्रसारित किए जाते थे। जैसे ही कोई बेरोजगार युवा विज्ञापन देखकर इनसे संपर्क करता, तो उन्हें नौकरी मिलने का पूरा भरोसा दिलाया जाता और फिर धीरे-धीरे अलग-अलग बहानों से उनके खातों से रकम ट्रांसफर करा ली जाती थी।
तीन चरणों में तैयार किया गया था ठगी का पूरा सिस्टम
इन शातिर ठगों ने भोले-भाले नौकरी की तलाश करने वाले लोगों को ठगने के लिए एक बेहद शातिर और चरणबद्ध सिस्टम बना रखा था ।
पहला चरण (रजिस्टर्ड फीस): संपर्क करने वाले हर नए अभ्यर्थी से सबसे पहले प्रक्रिया शुरू करने के नाम पर रजिस्ट्रेशन फीस के रूप में कुछ हजार रुपये लिए जाते थे।
दूसरा चरण (पद के अनुसार शुल्क): इसके बाद अभ्यर्थी को यह झांसा दिया जाता था कि उसका चयन एक अच्छे पद पर हो गया है, जिसके एवज में अब उसे पद के अनुसार अलग से शुल्क जमा करना होगा।
तीसरा चरण (ज्वाइनिंग लेटर): इन दोनों भुगतानों के बाद भी ठगी का यह सिलसिला यहां थमता नहीं था। अंत में अभ्यर्थी को फाइनल ज्वाइनिंग लेटर हाथ में थमाने के नाम पर भी भारी रकम वसूली जाती थी। इस प्रकार, गिरोह एक ही व्यक्ति से अलग-अलग चरणों में कई बार पैसे ऐंठ लेता था।
देशभर में फैला रखा था फर्जी नौकरी का जाल
पुलिस की गहन जांच में यह बात खुलकर सामने आई है कि इस ठग गिरोह के निशाने पर केवल आगरा या उत्तर प्रदेश के स्थानीय युवा ही नहीं थे, बल्कि देश के अलग-अलग राज्यों में रोजगार की तलाश कर रहे दूर-दराज के लोग भी सोशल मीडिया के माध्यम से इनके संपर्क में आते थे। पुलिस के अनुसार, इस पूरे मामले में अब तक देश के विभिन्न हिस्सों से 100 से अधिक लिखित शिकायतें मिलने की बात सामने आ चुकी है। शुरुआती जांच में जहां 2500 लोगों को ठगने की बात सामने आ रही थी, वहीं आरोपियों के पास से मिले डेटा और पुलिस की पूछताछ के आधार पर यह आंकड़ा बढ़कर करीब 3200 लोगों तक पहुंच चुका है।
दो करोड़ से अधिक की अवैध कमाई का दावा
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इस फर्जी कॉल सेंटर के जरिए अब तक दो करोड़ रुपये से अधिक की रकम की ठगी किए जाने का पुख्ता खुलासा हुआ है। आरोपियों ने देश के युवाओं की बेरोजगारी और उनकी मजबूरी का भरपूर फायदा उठाया। उन्हें अपने झांसे में लेकर विश्वास में लिया और अलग-अलग बहानों से अपने खातों में पैसे मंगवाए।
जौनपुर और बिहार के युवकों ने बनाया था आगरा को अड्डा
डीसीपी (DCP) द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, गिरफ्तार किए गए मुख्य आरोपियों में एक आरोपी अजय मूल रूप से जौनपुर का रहने वाला है, जबकि दूसरा आरोपी तरुण बिहार राज्य का निवासी है। इन दोनों ने मिलकर आगरा में एक फर्जी कॉल सेंटर स्थापित किया और पूरे देश में ठगी का एक बड़ा नेटवर्क संचालित कर रहे थे।
फिलहाल पुलिस इस बात की गहराई से छानबीन कर रही है कि इस नेटवर्क से और कौन-कौन लोग पर्दे के पीछे से जुड़े हुए थे तथा ठगी की यह पूरी रकम निकालकर किन-किन बैंक खातों में पहुंचाई जाती थी।
दो युवतियों से कराई जाती थी कॉलिंग और कस्टमर हैंडलिंग
इस फर्जी कॉल सेंटर के भीतर आरोपियों ने अपने काम को और अधिक पेशेवर रूप देने के लिए दो युवतियों को भी काम पर रख छोड़ा था। ये दोनों युवतियां ऑफिस में बैठकर कॉलिंग और कस्टमर हैंडलिंग का पूरा काम संभालती थीं।
सोशल मीडिया के विज्ञापनों के जरिए जब कोई बेरोजगार युवक इनसे संपर्क करता था, तो ये युवतियां उनसे फोन पर बात करके पूरी प्रक्रिया समझाती थीं और उन्हें अलग-अलग चरणों में ऑनलाइन भुगतान करने के लिए राजी करती थीं। पुलिस अब इन दोनों युवतियों की भूमिका और संलिप्तता की भी बारीकी से जांच कर रही है।
बरामदगी और डिजिटल साक्ष्यों की जांच
पुलिस द्वारा की गई इस बड़ी छापेमारी और कार्रवाई के दौरान मौके से कई ऐसे अहम दस्तावेज और डिजिटल उपकरण मिले हैं, जो इस ठगी के बड़े नेटवर्क की पूरी पोल खोलते हैं। इनमें मुख्य रूप से एक विस्तृत रजिस्टर, 32 अलग-अलग बैंकों की पासबुक, 28 एटीएम कार्ड, 8 सिम कार्ड और 12 क्यूआर कोड शामिल हैं। इन तमाम बरामद दस्तावेजों और डिजिटल माध्यमों की फॉरेंसिक व तकनीकी जांच के जरिए पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कुल कितनी रकम का लेनदेन हुआ है और इस गिरोह के बाकी फरार सदस्यों तक कैसे पहुंचा जाए।
फिलहाल, पुलिस बरामद किए गए सभी रजिस्टरों, बैंक खातों और उपकरणों की सत्यता परखने में जुटी है, जिससे आने वाले दिनों में ठगी के शिकार हुए अन्य लोगों की सही संख्या और इस पूरे काले कारोबार की पूरी परतें जनता के सामने आ सकेंगी।