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ऋषि पंचमी 2026: स्नान, सप्तऋषि पूजन मुहूर्त टाइम और दोषमुक्ति हेतु पूजा विधि, उद्यापन नियम

September 14, 2026

धर्म एवं ज्योतिष न्यूज डेस्क, 14 सितंबर 2026: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि सनातन परंपरा में विशेष स्थान रखती है। इसे ऋषि पंचमी के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन व्रत मंगलवार, 15 सितंबर को मनाया जा रहा है। साधारणतः व्रत-त्योहार किसी सांसारिक मनोकामना, धन, वैभव या संतान प्राप्ति के लिए किए जाते हैं, परंतु ऋषि पंचमी का व्रत इनसे पूर्णतः भिन्न है। यह व्रत आत्म-शुद्धि, अनजाने में हुए पापों के प्रायश्चित्त, दोष निवारण और कृतज्ञता ज्ञापित करने का एक अध्यात्मिक माध्यम है।

15 सितंबर 2026 ऋषि पंचमी: तिथि एवं मध्याह्न पूजा मुहूर्त

शास्त्रों के अनुसार ऋषि पंचमी की पूजा मध्याह्न काल (दोपहर) में करने का विधान है।

• ऋषि पंचमी तिथि: मंगलवार, १५ सितंबर २०२६

• पंचमी तिथि प्रारंभ: १५ सितंबर २०२६ को प्रातः ०७:४४ बजे से

• पंचमी तिथि समाप्त: १६ सितंबर २०२६ को प्रातः ०८:५९ बजे तक

• सप्तऋषि पूजन (मध्याह्न) मुहूर्त: दोपहर ११:०७ बजे से दोपहर ०१:३३ बजे तक (अवधि: लगभग २ घंटे २६ मिनट) 

ऋषि पंचमी का धार्मिक व आध्यात्मिक महत्व

1. रजस्वला दोष व स्पर्श दोष का प्रायश्चित्त: सनातन मान्यताओं के अनुसार, महिलाओं द्वारा मासिक धर्म (रजस्वला अवस्था) के दौरान जाने-अनजाने में हुए स्पर्श दोष और धार्मिक मर्यादाओं के उल्लंघन के निवारण के लिए यह व्रत मुख्य रूप से किया जाता है।

2. सप्तऋषियों और माता अरुंधती के प्रति कृतज्ञता: इस दिन सनातन ज्ञान और संस्कृति के आधार स्तंभ सप्तऋषियों (कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ) तथा देवी अरुंधती की पूजा की जाती है।

भोजन और आहार के विशेष नियम (हल-रहित अन्न का नियम)

ऋषि पंचमी व्रत के आहार नियम अत्यंत कठोर और अनूठे हैं:

• बिना हल से जुते अन्न का सेवन: इस दिन बैल या हल द्वारा जोती गई भूमि पर उगाए गए अनाज (जैसे गेहूँ, साधारण चावल, दालें आदि) का सेवन वर्जित होता है।

• फलाहार व प्राकृतिक खाद्य पदार्थ: स्वतः उगने वाले या बिना हल जुते उगाए जाने वाले खाद्य पदार्थ ग्रहण किए जाते हैं - जैसे समा के चावल (तिन्नी/मोरायो), कुट्टू, सिंघाड़ा, कंदमूल (अरबी, शकरकंद), दूध, दही, घी और फल।

• नमक का नियम: केवल सेंधा नमक प्रयोग करें या पूर्ण निराहार/फलाहार रखें।

• एकभुक्त नियम: मध्याह्न में पूजा संपन्न करने के बाद दिन में केवल एक बार ही सात्विक आहार ग्रहण किया जाता है।

ऋषि पंचमी की पूजा विधि-विधान 

1. प्रातःकाल स्नान: सूर्योदय से पूर्व उठकर अपामार्ग (चिरचिटा/आघेड़ी) की दातुन से मुख साफ करें। इसके बाद मिट्टी, गाय के गोबर और तिल युक्त जल (अथवा गंगाजल) से पवित्र स्नान करें।

2. पूजा स्थान की तैयारी: पूजा गृह को स्वच्छ कर लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं। उस पर हल्दी व कुमकुम से अष्टदल कमल या चौक बनाएं।

3. सप्तऋषि स्थापना: चौक पर सात ऋषियों और देवी अरुंधती के प्रतीक रूप में ७ सुपारियाँ, कुश के कुर्च अथवा उनकी प्रतिमा/चित्र स्थापित करें।

4. षोडशोपचार पूजन: जल, दूध, दही, घी, शहद व शर्करा (पंचामृत) से प्रतीकात्मक स्नान कराकर चंदन, रोली, अक्षत, पुष्प, दूर्वा, धूप और दीप अर्पित करें।

a. सप्तऋषि अर्घ्य मंत्र: दोपहर के शुभ मुहूर्त (११:०७ AM - ०१:३३ PM) में हाथ में जल, चंदन और पुष्प लेकर ऋषियों को अर्घ्य दें:

कश्यपोऽत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ गौतमः।

जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः॥

दहन्तु पापं मे सर्वं गृह्णन्त्वर्घ्यं नमो नमः॥

Kashyapo 'trir bharadwajo vishwamitro 'tha gautamah।

Jamadagnir vasishthash cha saptaite rishayah smritah॥

Dahantu papam me sarvam grihnantvarghyam namo namah॥

5. क्षमा प्रार्थना: व्रत कथा का श्रवण करें और वर्षभर जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए नम्रतापूर्वक क्षमा याचना करें। 

ऋषि पंचमी की पौराणिक व्रत कथा (उत्तंक ब्राह्मण कथा)

पौराणिक कथा के अनुसार, विदर्भ देश में उत्तंक नाम के एक धार्मिक ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नी सुशीला और पुत्री के साथ रहते थे। उनकी पुत्री अल्पायु में ही विधवा हो गई और कुछ समय पश्चात उसके शरीर में कीड़े पड़ने लगे।

दुखी होकर उत्तंक ब्राह्मण ने ध्यान लगाकर देखा तो ज्ञात हुआ कि पूर्वजन्म में उनकी पुत्री ने मासिक धर्म के दौरान घर के बर्तनों व सामग्रियों को स्पर्श कर दिया था और बाद में ऋषि पंचमी व्रत का पालन भी नहीं किया था।

पिता के आदेश पर पुत्री ने भाद्रपद शुक्ल पंचमी को विधि-विधान से सप्तऋषियों का पूजन और ऋषि पंचमी व्रत किया। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से वह समस्त पापों, शारीरिक कष्टों व दोषों से मुक्त हो गई।

उद्यापन नियम

जब व्रत की निश्चित अवधि (जैसे ७, १४ या २१ वर्ष) पूर्ण हो जाती है, तब भाद्रपद शुक्ल पंचमी के दिन ही विधिपूर्वक हवन करवाकर, सप्तऋषियों का पूजन कर एवं ब्राह्मणों को भोजन व दान देकर व्रत का उद्यापन किया जाता है। प्रस्तुति: श्री गीतांजलि ज्योतिष केंद्र, इंदौर।