Sudivya Kumar Sonu Untold Story: झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के दिवंगत नेता और झारखंड के उच्च तकनीकी शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनके सार्वजनिक जीवन से जुड़ी कई अनकही कहानियां आज भी चर्चा में हैं. इनमें सबसे हैरान करने वाली कहानी 1991 के झारखंड आंदोलन से जुड़ी है. अलग झारखंड राज्य की मांग के दौरान उन्होंने गिरिडीह में मधुपुर-बनियाडीह-कोडरमा रेलवे लाइन को डेटोनेटर से उड़ाकर क्षतिग्रस्त कर दिया था. दिलचस्प बात यह है कि जिस रेलवे लाइन को उन्होंने उड़ाया, उसे बनवाने में उनके अपने ही दादा की अहम भूमिका रही थी.
शिबू सोरेन के आह्वान पर आंदोलन में उतरे सुदिव्य
सुदिव्य कुमार सोनू 1989 में पढ़ाई के दौरान ही दिशोम गुरु पद्म भूषण शिबू सोरेन के आह्वान पर झारखंड मुक्ति मोर्चा के आंदोलन से जुड़ गए थे. उस समय संयुक्त बिहार में अलग झारखंड राज्य की मांग तेज हो रही थी और आंदोलन उग्र रूप ले रहा था. दो साल बाद 1991 में उन्होंने गिरिडीह में रेलवे ट्रैक को विस्फोट से क्षतिग्रस्त करने की कार्रवाई में नेतृत्व किया. उस समय शायद उन्हें भी यह अंदाजा नहीं रहा होगा कि जिस रेललाइन को निशाना बनाया जा रहा है, उसकी नींव उनके अपने परिवार के इतिहास से जुड़ी हुई है.
1919 में दादा को अंग्रेजों ने गिरिडीह बुलाया
इस कहानी की शुरुआत 1919 से होती है. उस समय अंग्रेजी हुकूमत कोयले की ढुलाई के लिए मधुपुर से बनियाडीह तक रेलवे लाइन बिछाने की योजना पर काम कर रही थी. पारिवारिक जानकारी के अनुसार सुदिव्य के दादा उसी वर्ष मुंगेर से गिरिडीह पहुंचे थे. लोहे के काम और रेलवे ट्रैक निर्माण में उनकी दक्षता के कारण अंग्रेजों ने उन्हें विशेष रूप से बुलाया था. वे अपने साथ बड़ी संख्या में मजदूरों को लेकर आए और रेलवे ट्रैक निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया. बाद में परिवार ने गिरिडीह को अपना स्थायी घर बना लिया.
कोयला परिवहन के लिए बनी थी यह रेललाइन
उस दौर में गिरिडीह में बंगाल कोल कंपनी बड़े पैमाने पर कोयला खनन कर रही थी. खदानों से कोयला बाहर पहुंचाने के लिए बनियाडीह से मधुपुर तक रेल संपर्क जरूरी माना गया. इसी जरूरत को पूरा करने के लिए रेलवे ट्रैक बनाया गया. इस रूट पर उसरी नदी के ऊपर बना ओल्ड रेलवे ब्रिज, जिसे रेलवे ब्रिज नंबर-37 भी कहा जाता है, ब्रिटिश काल की इंजीनियरिंग का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है. यही पुल और यही रेलवे लाइन आगे चलकर झारखंड आंदोलन के दौरान ऐतिहासिक घटना का केंद्र बनी.
इंजीनियर पिता, अलग-अलग शहरों में बीता बचपन
सुदिव्य कुमार सोनू के पिता शंभूनाथ विश्वकर्मा पीएचईडी विभाग में इंजीनियर थे. उन्होंने सहरसा से इंजीनियर पद से सेवानिवृत्ति ली. नौकरी के दौरान उनका तबादला पूर्णिया, सहरसा, मधेपुरा, तिलैया, दुमका और पटना जैसे कई शहरों में हुआ. इसी कारण सुदिव्य का बचपन और शुरुआती शिक्षा बिहार और झारखंड के अलग-अलग जिलों में हुई. बाद में झारखंड आंदोलन के दौरान शिबू सोरेन ने शंभूनाथ विश्वकर्मा से सुदिव्य को आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए अपने साथ जोड़ा.
गोमिया से जूते में छिपाकर लाया गया डेटोनेटर
बताया जाता है कि 1991 में रेलवे ट्रैक को क्षतिग्रस्त करने की योजना बेहद गोपनीय तरीके से बनाई गई थी. इस योजना के लिए जरूरी डेटोनेटर और वायर गोमिया से लाने में उनके मित्र सुरेंद्र बर्मन ने सहयोग किया था. पुलिस की नजरों से बचने के लिए डेटोनेटर को जूते में छिपाकर लाने की बात भी सामने आती है. इसके बाद उसरी नदी के रेलवे पुल के पास रेलवे ट्रैक पर विस्फोटक लगाया गया और उसे सक्रिय करने के लिए कुछ दूरी पर बैटरियां रखी गईं.
ट्रेन गुजर गई, बड़ा हादसा टल गया
उस समय मधुपुर से गिरिडीह आने वाली पैसेंजर ट्रेन रात करीब 10 बजे उसरी नदी के पुल से गुजरती थी. निर्धारित समय के आसपास ट्रेन की रोशनी दिखाई देने पर रेलवे ट्रैक पर विस्फोट किया गया. धमाके से पटरी क्षतिग्रस्त हुई, लेकिन ट्रेन बिना किसी बड़े नुकसान के पुल पार कर गई. इस घटना में यात्रियों के सुरक्षित बच जाने की बात कही जाती है. आंदोलनकारियों का उद्देश्य ट्रेन परिचालन बाधित करना बताया गया था, लेकिन परिणाम कहीं अधिक गंभीर हो सकते थे.
घटना के बाद सुदिव्य सोनू हुए विचलित
बताया जाता है कि विस्फोट के बाद सुदिव्य कुमार सोनू संभावित नुकसान को लेकर काफी परेशान हो गए थे. उन्हें एहसास हुआ कि यदि ट्रेन दुर्घटनाग्रस्त हो जाती, तो बड़ी संख्या में यात्रियों की जान जा सकती थी. बाद में उन्होंने यह भी महसूस किया कि ऐसी घटना का सबसे अधिक नुकसान गिरिडीह के आम लोगों को उठाना पड़ता. इस घटना ने आंदोलन के दौरान अपनाए गए उग्र तरीकों के संभावित परिणामों पर भी गंभीर सवाल खड़े किए.
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पुलिस ने तेज की जांच, हुई गिरफ्तारी
घटना के बाद पुलिस ने जांच तेज कर दी और व्यापक अभियान चलाया. इसी क्रम में इस मामले में शामिल होने के आरोप में बैजू राणा को गिरफ्तार किए जाने की बात सामने आती है. यह घटना झारखंड आंदोलन के उन अध्यायों में शामिल है, जहां राजनीतिक संघर्ष, व्यक्तिगत इतिहास और नैतिक द्वंद्व एक साथ दिखाई देते हैं. यही वजह है कि सुदिव्य कुमार सोनू की यह कहानी आज भी झारखंड के आंदोलनकारी इतिहास की सबसे अनोखी और चर्चित घटनाओं में गिनी जाती है.
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